शंकराचार्य विवाद में योगी और केशव प्रसाद मौर्य आमने-सामने, माघ मेले से उठी सियासी लपट

Shankaracharya controversy: प्रयागराज माघ मेला 2026 में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और यूपी पुलिस प्रशासन के बीच विवाद अब सियासी रंग ले चुका है. इस मामले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य आमने-सामने नजर आ रहे हैं. योगी के कालनेमि बयान से जहां सनातन धर्म की राजनीति गरमाई है, वहीं केशव मौर्य का शंकराचार्य के समर्थन में दिया गया बयान यूपी बीजेपी के भीतर गुटबाजी की ओर इशारा कर रहा है.

Shankaracharya controversy
शंकराचार्य विवाद में योगी-केशव आए आमने-सामने
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उत्तर प्रदेश के प्रयागराज माघ मेला 2026 में, ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और योगी सरकार की पुलिस प्रशासन दोनों के बीच विवाद का मुद्दा लगातार गरमाता जा रहा है. शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जहां अपने हठ पर हैं तो वहीं, दूसरी तरफ पुलिस प्रशासन नोटिस पर नोटिस भेज रही है. पहला नोटिस अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को शंकराचार्य साबित करने की, दूसरा नोटिस बिना अनुमति के बग्घी पर सवार होकर भीड़ के साथ जाना, पांटून पुल नंबर 2 पर लगे बैरियर को तोड़ना, मेला प्रशासन के काम में दखल देना और मेला में शांति भंग करने का आया है.

अलग-अलग धड़ों में बंटे लोग

विवाद इतना गहरा गया है कि दोनों ही पक्ष के लिए दो अलग से धड़ा खड़ा है. शंकराचार्य के तरफ से अखिलेश-कांग्रेस समेत विपक्ष के तमाम नेता और कथावाचक देवकी नंदन ठाकुर, मथुरा के वृंदावन में ब्रजभूमि के संत समाज, फलाहारी बाबा आदि हैं. महामंडलेश्वर रामदास महाराज का कहना है कि शंकराचार्य की पीठ भगवान शिव की गद्दी मानी जाती है और उसका अपमान पाप के समान है. उन्होंने मुख्यमंत्री योगी से दोषियों पर कार्रवाई की अपील की.

तो दूसरी तरफ पुलिस प्रशासन के लिए सीएम योगी खुद इशारों में बयान दे रहे हैं. सीएम योगी कह रहे हैं एक योगी, संत और सन्यासी के लिए धर्म और राष्ट्र से बढ़कर कुछ नहीं होता. कुछ कालनेमि प्रवृत्ति के लोग धर्म की आड़ में सनातन धर्म को कमजोर करने की साजिश कर सकते हैं, ऐसे लोगों से सतर्क रहने की जरूरत है.

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सीएम योगी और डिप्टी सीएम केशव मौर्या आमने-सामने?

सीएम योगी के बयान पर यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य विरोध में खड़े हो गए हैं. आजमगढ़ पहुंचे उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि मैं ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के चरणों में प्रणाम करता हूं. उनसे प्रार्थना है कि वह स्नान कर इस विषय का समापन करें. केशव मौर्या के इस बयान को अविमुक्तेश्वरानंद के पक्ष में देखा जा रहा है. इससे लगता है कि वे शंकराचार्य की स्थिति को मान्यता दे रहे हैं और विवाद को शांत करने की अपील कर रहे हैं.

लेकिन यूपी की राजनीति को करीब से समझने वाले समझते हैं कि योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य दोनों नेता दो अलग-अलग गुटों में है. कहा जाता है कि केशव मौर्या को योगी आदित्यनाथ पसंद नहीं हैं, जिसकी वजह से यूपी बीजेपी दो खेमों में दिखाई देती है. एक खेमे में योगी समर्थक हैं, तो दूसरे में केशव मौर्या के. हालांकि, दोनों के बीच का यह विवाद कभी खुलकर सामने नहीं आया, लेकिन अब एक बार फिर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े विवाद ने इसे हवा दे दी है. लोग कह रहे हैं कि पहली बार दोनों नेता किसी मुद्दे पर खुलकर एक-दूसरे के सामने आ गए हैं. 

योगी ने जो 'कालनेमि' शब्द कहा उसका मतलब

योगी ने 'कालनेमि' शब्द का इस्तेमाल किया, जो रामायण में रावण का मामा और मारीच का बेटा था. रावण ने उसे हनुमान को रोकने के लिए भेजा था, लेकिन हनुमान ने उसका वध कर दिया. योगी का यह बयान पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है.

दोनों नेताओं के बयानों से यूपी बीजेपी में फिर से दरार साफ नजर आ रही है. योगी का कड़ा रुख सनातन धर्म की रक्षा पर जोर देता है, तो केशव मौर्या का बयान शंकराचार्य के प्रति सम्मान दिखाता है. हालांकि योगी-केशव प्रशाद मौर्य के बीच इनडायरेक्ट टकराव लंबे समय तक चल सकता है.

योगी और केशव की सियासी लड़ाई

योगी बनाम केशव प्रसाद मौर्य की जो सियासी लड़ाई देख रहे हैं, इसे समझने के लिए योगी आदित्यनाथ की चुनावी राजनीति को समझना अहम रहेगा. 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी भले ही यूपी में पहले के मुकाबले अच्छा प्रदर्शन ना कर पाई हो, मगर योगी आदित्यनाथ अपने गढ़ गोरखपुर के आस-पास की सीटें बचाने में सफल रहे. बीजेपी गोरखपुर, महाराजगंज, देवरिया, कुशीनगर और बांसगांव सीटें जीतने में सफल रही.

वहीं कौशांबी, प्रयागराज, प्रतापगढ़ में बीजेपी को हार मिली. इन तीनों सीटों पर केशव प्रसाद मौर्य का असर माना जा रहा था. बीजेपी केशव प्रसाद मौर्य को पार्टी के ओबीसी चेहरे के तौर पर पेश करती रही है. मगर इन चुनावों में मौर्य पार्टी को वो सफलता नहीं दिलवा पाए, जिसकी उम्मीद बीजेपी को थी.

हारने के बावजूद के.पी. मौर्य को मिला सम्मान

यूपी और बीजेपी में केशव प्रसाद मौर्य की राजनीतिक हैसियत को इन कुछ सालों की क्रोनोलॉजी से समझा जा सकता है.

- 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में केशव प्रसाद मौर्य सिराथू सीट से हार गए थे. इस चुनावी हार के बाद माना जा रहा था कि केशव प्रसाद मौर्य को योगी आदित्यनाथ की सरकार में जगह नहीं मिलेगी. मगर ऐसा नहीं हुआ. केशव प्रसाद मौर्य राज्य के उप-मुख्यमंत्री बनाए गए. केशव प्रसाद मौर्य को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का करीबी माना जाता है जबकि योगी को अमित शाह के विरोधी के रूप में पेश किया जाता है.

- केशव प्रसाद मौर्य यूपी में चार बार विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं. मगर सिर्फ साल 2012 में वो विधायकी का चुनाव जीत पाए थे.

- 2014 में केशव प्रसाद मौर्य फूलपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़े, तीन लाख से ज्यादा वोटों से ऐतिहासिक जीत हासिल की. इस सीट पर बीजेपी पहली बार जीत सकी थी. फूलपुर सीट पर बीजेपी की ये जीत इतनी अहम रही कि केशव प्रसाद मौर्य को जल्द यूपी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया.

-फिर हुआ 2017 विधानसभा चुनाव और यूपी में बीजेपी की सरकार बन गई. केशव प्रसाद मौर्य तब सीएम पद की रेस में थे, मगर कमान योगी आदित्यनाथ को मिली. योगी सरकार बनने के बाद केशव प्रसाद मौर्य के पास पहले पीडब्ल्यूडी मंत्रालय था. मगर 2022 में केशव से ये मंत्रालय छिन गया. दोनों नेताओं के बीच मतभेद की एक वजह इसे भी बताया जाता है.

केशव प्रसाद मौर्य बीजेपी के लिए क्यों जरूरी?

केशव प्रसाद मौर्य बीजेपी के लिए अहम क्यों हैं क्योंकि वो आरएसएस-बीजेपी का मौर्य चेहरा हैं. इसके साथ वो हिन्दुत्व की राजनीति में बीजेपी की उस रणनीति का हिस्सा हैं, जिसमें गैर-यादव ओबीसी समुदाय को साधने की कोशिश की जा रही है. बीजेपी के भीतर केशव मौर्य क्षेत्रीय सम्न्वयक, पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ और किसान मोर्चा के अध्यक्ष भी रहे. केशव प्रसाद मौर्य की जाति पूरे उत्तर प्रदेश में है. इस जाति की पहचान अलग-अलग नामों से है. जैसे- मौर्य, मोराओ, कुशवाहा, शाक्य, कोइरी, काछी और सैनी. ये सभी मिलाकर उत्तर प्रदेश की कुल आबादी में 8.5 फीसदी हैं.

कभी नरम कभी गरम रहने के बाद एक बार फिर केशव प्रशाद मौर्य की चर्चा तब हुई जब प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान मौनी अमावस्या के स्नान को लेकर ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन आमने सामने आ गए. मेला प्रशासन ने उन्हें पालकी पर सवार होकर स्नान के लिए जाने से रोक दिया. इसके बाद शंकराचार्य समर्थकों और पुलिस के बीच धक्का मुक्की हुई. इस घटना से नाराज होकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने धरना शुरू कर दिया. इसके बाद से ही ये मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है.

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