ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के अधिकारी, इन दिनों दोनों चर्चा में हैं और दोनों ही आमने-सामने हो गए है. एक तरफ शंकराचार्य नाराज होकर धरना दे रहे तो वहीं, दूसरी तरफ अधिकार भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सफाई पर सफाई दे रहे हैं. शंकराचार्य इस बात पर अड़े हैं कि प्रशासन माफी मांगे. उनका कहना है कि माफी के बिना वो अपने आश्रम में प्रवेश नहीं करेंगे. तो उधर मेला प्रशासन ने उन्हें एक नोटिस जारी किया. इसमें उनसे यह साबित करने को कहा गया है कि वो ही शंकराचार्य हैं. इस नोटिस में सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक मामले का जिक्र है.
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इस विवाद को देखते हुए दो सवाल सामने आ रहे हैं कि शंकराचार्य आखिर बनते कैसे हैं? जिसे साबित करने करने की बात हुई है. औरअविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस भेजा गया है ये साबित करने के लिए ही वो ही शंकराचार्य हैं, तो कानून क्या है. आइए विस्तार से समझते हैं पूरी बात.
कौन होते हैं शंकराचार्य?
हिंदू धर्म में गुरु-शिष्य परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है. इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आदि शंकाराचार्य ने ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया था. धार्मिक मतानुसार, आदि शंकाराचार्य ने ही मठों की शुरुआत की और हिंदू धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का काम किया. आदि शंकराचार्य ने चार शिष्य बनाए और उन्हें देश के अलग-अलग कोनों में स्थित मठों की जिम्मेदारी सौंपी. इन मठों के प्रमुख को ही आज के समय में शंकराचार्य का दर्जा प्राप्त होता है.
शंकराचार्य आखिर बनते कैसे हैं?
शंकराचार्य बनने के नियमों के बारे में आदि शंकराचार्य ने महानुशासन ग्रंथ में बताया है. शंकराचार्य बनने की पहली शर्त ये है कि व्यक्ति को संन्यासी होना चाहिए. संन्यासी बनने के लिए गृहस्थ जीवन का त्याग, मुंडन, अपना पिंडदान और रुद्राक्ष धारण करना बेहद जरूरी है. उसे दर्शन, वेद, उपनिषदों और संस्कृत का प्रकांड विद्वान होना चाहिए. चारों वेद और छह वेदांगों का ज्ञाता होना चाहिए.
दूसरी शर्त ये है कि व्यक्ति ने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया हो. इसके अलावा तन मन से पवित्र, जिसने अपनी इंद्रियों को जीत लिया हो. तीसरी शर्त पूर्व शंकराचार्य होने वाले शंकराचार्य का चुनाव करें. पीठासीन शंकराचार्य अपने सबसे योग्य शिष्य का चुनाव शंकराचार्य बनने के लिए करते हैं. शंकराचार्यों के प्रमुखों, आचार्य महामंडलेश्वरों, प्रतिष्ठित संतों की सभा की सहमति और काशी विद्वत परिषद की मुहर के बाद शंकराचार्य की पदवी मिलती है. उत्तराधिकारी के नाम पर काशी विद्वत परिषद और अन्य विद्वान शंकराचार्यों की भी सहमति होनी चाहिए.
भारत में कितने शंकराचार्य हैं?
- ओडिशा के पुरी में गोवर्धन मठ, जिसके शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती हैं.
- गुजरात में द्वारकाधाम में शारदा मठ जिसके शंकराचार्य सदानंद सरस्वती हैं.
- उत्तराखंड के बद्रिकाश्रम में ज्योतिर्मठ, जिसके शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद हैं.
- दक्षिण भारत के रामेश्वरम् में श्रृंगेरी मठ, जिसके शंकराचार्य जगद्गुरु भारती तीर्थ हैं.
केवल कांची कामकोटी में मौजूदा शंकराचार्य पहले से अपने उत्तराधिकारी शंकराचार्य की घोषणा कर देता है लेकिन कांची कामकोटी पीठ खास और पंचभूतत्व स्थल है. इसे चार मठों से अलग खास और प्रमुख पीठ माना जाता है. अन्य मठों में शंकराचार्य तय करने की प्रक्रिया होती है. सनातन धर्म में शंकराचार्य को सर्वोच्च माना जाता है. बता दें कि मठ के पहले मठाधीश आचार्य सुरेश्वराचार्य थे.
अविमुक्तेश्वरानंद और कानूनी विवाद
माघ मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से क्या पूछा है कि उन्होंने अपने नाम के आगे 'शंकराचार्य' क्यों लगाया है? मेला प्राधिकरण के नोटिस में सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन एक मामले का जिक्र है. मेला प्रशासन का कहना है कि अभी तक इस मामले में कोई आदेश पारित नहीं हुआ है, ऐसे में कोई भी धर्माचार्य ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य के रूप में पट्टाभिषेकित नहीं हो सकता. बावजूद इसके स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मेला क्षेत्र में लगे शिविर के बोर्ड पर अपने नाम के आगे 'शंकराचार्य' अंकित किया है.
पत्र में सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन ब्रह्मलीन ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती और स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के लंबित मुकदमे का जिक्र किया गया है. नोटिस प्रयागराज मेला प्राधिकरण के उपाध्यक्ष की ओर से जारी किया गया है. सुप्रीम कोर्ट के प्रार्थना पत्र के उपरोक्त खंड को स्वीकार करते हुए 14 अक्टूबर 2022 को एक आदेश दिया गया था. नोटिस में कहा गया है कि इस अपील संख्या ताजा स्थिति के रूप में कोई अन्य आदेश पारित नहीं हुआ है. ये मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है.
जब तक सुप्रीम कोर्ट की ओर से अपील पर कोई जवाब या आदेश नहीं दिया जाता या कोई अग्रिम आदेश पट्टाभिषेक के मामले में पारित नहीं होता, तब तक कोई भी धर्माचार्य ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य के तौर पर सुशोभित नहीं हो सकता. ये सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना है.
प्रशासन द्वारा भेजे गए नोटिस पर अविमुक्तेश्वरानंद के वकील पीएन मिश्र ने जवाब में कहा कि- सुप्रीम कोर्ट ने पट्टाभिषेक पर रोक लगाई है. ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य लिखने पर रोक नहीं. अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य हैं।.उनके गुरु ने उनके नाम रजिटर्ड वसीयत की है और इसी के आधार पर वह शंकराचार्य लिख रहे हैं.
पट्टाभिषेक क्या है?
पट्टाभिषेक का अर्थ है किसी व्यक्ति को एक विशिष्ट धार्मिक पद पर विधिवत स्थापित करना. यह प्रक्रिया वैदिक मंत्रों, अनुष्ठानों और पवित्र विधियों के साथ संपन्न होती है.
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती कितने पढ़े-लिखे हैं?
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का मूल नाम उमाशंकर उपाध्याय है. 15 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के पट्टी तहसील के ब्राह्मणपुर गांव में उनका जन्म हुआ. ब्राह्मण परिवार, प्राथमिक शिक्षा प्रतापगढ़ में, बाद में धर्म और राजनीति में समान रुचि रखने वाले स्वामी करपात्री जी महाराज के शिष्य ब्रह्मचारी राम चैतन्य के संपर्क में गुजरात चले गए.
ब्रह्मचारी राम चैतन्य के कहने पर उन्होंने संस्कृत की पढ़ाई की. उमाशंकर उपाध्याय ने वाराणसी के मशहूर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की शिक्षा ग्रहण की. BHU से संस्कृत में स्नातक BA और MA की डिग्री हासिल की. पढ़ाई के दौरान वे छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे.1994 में उन्होंने छात्रसंघ का चुनाव जीता. उन्होंने संस्कृत व्याकरण, वेद, पुराण, उपनिषद, आयुर्वेद, वेदांत और अन्य धार्मिक ग्रंथों की गहन पढ़ाई की.
उमाशंकर उपाध्याय कैसे बने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती?
पढ़ाई पूरी करने के बाद 1990 के दशक में संन्यास लिया. स्वामी करपात्री जी के बीमार होने पर वे उनकी सेवा में लगे और उनके निधन तक साथ रहे. इसी दौरान वे ज्योतिष पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के संपर्क में आए. संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से आचार्य की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें 15 अप्रैल 2003 को दंड सन्यास की दीक्षा दी गई. इसके बाद उनका नाम स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती रखा गया.
उनके गुरु जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे. सितंबर 2022 में उनके निधन के बाद उनके दोनों पीठों के नए शंकराचार्य की घोषणा हुई. ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती बने, जबकि शारदा पीठ द्वारका का शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती बने. हालांकि इस नियुक्ति को लेकर विवाद रहा.
संत स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद गहराया विवाद
2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वरूपानंद सरस्वती और वासुदेवानंद सरस्वती दोनों को ही शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया था, कोर्ट ने कहा था- कोई भी योग्य उत्तराधिकारी नहीं है. मामले में सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय का इंतजार किया जाएगा. इस तरह विवाद चलता रहा और 11 सितंबर, 2022 को संत स्वरूपानंद सरस्वती का निधन हो गया. उसके बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अगले दिन खुद को शंकराचार्य घोषित कर दिया. 16 अक्टूबर, 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने अविमुक्तेश्वरानंद पट्टाभिषेक और छत्र चंवर के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी.
माघ मेले का विवाद क्या है?
18 जनवरी 2026, मौनी अमावस्या पर पालकी और भक्तों के साथ स्नान की अनुमति न दिए जाने को लेकर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और पुलिस-प्रशासन के बीच विवाद हुआ. शंकराचार्य के शिष्यों और भक्तों के साथ पुलिस की धक्का-मुक्की हुई. संगम नोज पर भीड़ को देखते हुए पुलिस-प्रशासन ने कम संख्या में पैदल जाकर स्नान करने की पेशकश की. पुलिस-प्रशासन से बात न बनने के चलते संगम नोज वॉच टावर के पास जमकर हंगामा हुआ. इसके बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को पुलिस-प्रशासन ने बैरंग वापस लौटा दिया. आरोप है कि सरकार के इशारे पर उनके साथ ये बर्ताव किया गया, ताकि हमें सबक सिखाया जा सके.
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