UP Panchayat Election: 2026 में नहीं होंगे पंचायत चुनाव? टल सकती है तारीख, जानें क्या है वजह

उत्तर प्रदेश में ओबीसी आरक्षण प्रक्रिया और डेटा रिपोर्ट में देरी के चलते 2026 के पंचायत चुनाव टलने के आसार हैं, जिन्हें अब 2027 विधानसभा चुनाव के बाद कराया जा सकता है. राजनीतिक दल भी विधानसभा चुनाव से पहले स्थानीय स्तर पर आपसी कलह से बचने के लिए फिलहाल चुनाव टालने के पक्ष में दिख रहे हैं.

उत्तर प्रदेश
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कुमार अभिषेक

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उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर बड़ी खबर सामने आ रही है. माना जा रहा है कि 2026 में होने वाले पंचायत चुनाव अब तय समय पर नहीं होंगे और इन्हें 2027 के विधानसभा चुनावों तक टाला जा सकता है. हालांकि अभी आधिकारिक घोषणा होना बाकी है, लेकिन सरकारी गलियारों और राजनीतिक समीकरणों से इसके स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं.

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क्यों टल सकते हैं चुनाव?

ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई, जिला पंचायतों का 11 जुलाई और क्षेत्र पंचायतों का कार्यकाल 19 जुलाई 2026 को समाप्त हो रहा है. चुनाव टलने की मुख्य वजह 'समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग' (Dedicated OBC Commission) का गठन न होना और आरक्षण के लिए आवश्यक जनसंख्या संबंधी आंकड़ों की रिपोर्ट का लंबित होना है. जब तक आयोग अपनी रिपोर्ट नहीं देता, आरक्षण की स्थिति स्पष्ट नहीं होगी और चुनाव प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाएगी.

प्रशासकों की हो सकती है नियुक्ति

यदि चुनाव समय पर नहीं होते हैं, तो सरकार के पास दो विकल्प होंगे. पहला, पंचायतों का कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा दिया जाए. दूसरा, पंचायतों की कमान प्रशासकों (Administrators) को सौंप दी जाए. वर्तमान परिस्थितियों में प्रशासकों की नियुक्ति की संभावना अधिक प्रबल दिखाई दे रही है.

राजनीतिक दलों का रुख

दिलचस्प बात यह है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ही चुनाव टालने के पक्ष में नजर आ रहे हैं. 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक होने के कारण कोई भी दल स्थानीय स्तर पर अपने कार्यकर्ताओं के बीच गुटबाजी या मनमुटाव नहीं चाहता. समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने जहां बीजेपी पर हार के डर से चुनाव टालने का आरोप लगाया है, वहीं कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर का कहना है कि सरकार कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रही है.

अंबेडकर जयंती पर सियासत तेज

पंचायत चुनावों के साथ-साथ यूपी में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की जयंती (14 अप्रैल) को लेकर भी होड़ मची है. बीजेपी जहां मूर्तियों के सौंदर्यीकरण और स्वच्छता अभियान के जरिए दलित वोट बैंक को साधने में जुटी है, वहीं समाजवादी पार्टी बूथ स्तर पर कार्यक्रम आयोजित कर मायावती के कोर वोटर्स में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है.

 

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