उत्तर प्रदेश के आगामी 2027 विधानसभा चुनावों को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अपनी रणनीति साफ कर दी है. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने एक निजी चैनल को दिए इंटरव्यू में यह साफ कर दिया है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही पार्टी का चेहरा होंगे और उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाएगा. इस बड़े फैसले के बाद यूपी की सियासत में हलचल तेज हो गई है और अब सबकी नजरें समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव पर टिकी हैं.
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बीजेपी ने खत्म किया सस्पेंस
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने एक निजी टीवी चैनल से बातचीत के दौरान साफ कर दिया कि 2027 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही पार्टी को लीड करेंगे. उन्होंने कहा कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश 'उत्तम प्रदेश' और 'विकसित प्रदेश' की ओर बढ़ रहा है. उनके शासन में लॉ एंड ऑर्डर को लेकर जो निर्णायक छवि बनी है, वही पार्टी की जीत का आधार बनेगी. इस ऐलान के साथ ही पिछले कुछ महीनों से पार्टी के भीतर चल रही तमाम सुगबुगाहटों और बदलाव की चर्चाओं पर पूरी तरह से विराम लग गया है.
अखिलेश यादव की 'पीडीए' रणनीति और योगी का चेहरा
समाजवादी पार्टी के लिए यह खबर एक दिलचस्प मोड़ लेकर आई है. अखिलेश यादव ने अपना पूरा ध्यान 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) पर केंद्रित कर रखा है. माना जा रहा है कि अखिलेश यादव के लिए योगी आदित्यनाथ का चेहरा सामने होना एक फायदेमंद स्थिति हो सकती है. सपा की रणनीति योगी आदित्यनाथ को एक साधु-संन्यासी के बजाय एक 'क्षत्रिय' चेहरे के रूप में पेश करने की है, ताकि राज्य की राजनीति को 'बैकवर्ड बनाम फॉरवर्ड' की धुरी पर घुमाया जा सके. अखिलेश को लगता है कि अगर बीजेपी किसी ओबीसी चेहरे को आगे करती, तो उनके लिए अपनी जातिगत राजनीति साधना मुश्किल होता.
क्या योगी का चेहरा बनेगा बीजेपी की ताकत?
बीजेपी को भरोसा है कि योगी आदित्यनाथ का लॉ एंड ऑर्डर का मॉडल न केवल यूपी में बल्कि पूरे देश में लोकप्रिय है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में कानून व्यवस्था आज भी एक बड़ा मुद्दा है. पार्टी को लगता है कि पिछले 10 वर्षों के काम, एक्सप्रेसवे का जाल और विकास के मुद्दों को भुनाने के लिए योगी से बड़ा कोई दूसरा चेहरा नहीं है. हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनावों में ओबीसी और दलित मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी से छिटका था, लेकिन पार्टी को उम्मीद है कि विधानसभा चुनाव के समीकरण अलग होंगे और हिंदुत्व व विकास का कार्ड फिर से काम करेगा.
ब्राह्मणों की 'नाराजगी' और जातिगत नैरेटिव
राजनीतिक गलियारों में एक चर्चा यह भी रही है कि यूपी में ब्राह्मण मतदाताओं का एक वर्ग मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर नाराज है. बीजेपी के भीतर भी कुछ लोग मानते थे कि योगी के चेहरे के साथ चुनाव में उतरने से जातिगत ध्रुवीकरण हो सकता है. लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने अब यह स्पष्ट कर दिया है कि वे योगी आदित्यनाथ की निर्णायक नेतृत्व शैली पर ही दांव लगाएंगे. अब देखना यह है कि क्या अखिलेश यादव इस जातिगत नैरेटिव को भुना पाएंगे या योगी का 'कड़क' प्रशासन एक बार फिर सब पर भारी पड़ेगा.
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