उरई सीट पर BJP लगाएगी हैट्रिक या सपा करेगी वापसी? समझें 2027 का सियासी समीकरण

सुषमा पांडेय

• 12:03 PM • 03 Sep 2026

बुंदेलखंड की उरई सुरक्षित सीट पर लगातार दो बार जीत दर्ज कर चुकी बीजेपी 2027 में हैट्रिक लगाने की तैयारी में है, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली बढ़त के दम पर सपा वापसी की कोशिश कर रही है.

उरई सीट
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उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। बुंदेलखंड के जालौन जिले की उरई (सुरक्षित) विधानसभा सीट पर मुकाबला बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है. पिछले दो चुनाव- 2017 और 2022- से इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है और गौरी शंकर वर्मा विधायक हैं. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में विधानसभा वार आए आंकड़ों ने विपक्षी खेमे में नई उम्मीद जगा दी है. 

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लोकसभा चुनाव के दौरान उरई विधानसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी नारायण दास अहिरवार ने बीजेपी प्रत्याशी भानु प्रताप सिंह वर्मा पर बढ़त बनाई थी. ऐसे में अब बड़ा सवाल यह है कि क्या बीजेपी उरई में हैट्रिक लगा पाएगी, या सपा 2024 की बढ़त को 2027 की जीत में बदल देगी?

90 के दशक का बीएसपी गढ़ और बदलता गणित


90 के दशक में जालौन जिले की सीटों पर बहुजन समाज पार्टी (BSP) का मजबूत दबदबा हुआ करता था. हालांकि, 2012 के परिसीमन के बाद सियासी समीकरण बदल गए. 2012 में सपा के दयाशंकर वर्मा ने चुनाव जीतकर बीजेपी और बीएसपी के प्रभाव के बीच सपा की एंट्री कराई. इसके बाद से ही उरई में मुख्य मुकाबला बीजेपी और सपा के बीच सिमटता चला गया, जबकि बीएसपी लगातार कमजोर होती गई. 

पिछले विधानसभा चुनावों का हाल:

  • 2017 चुनाव: बीजेपी के गौरी शंकर वर्मा ने जीत दर्ज की, सपा के महेंद्र सिंह दूसरे नंबर पर रहे.
  • 2022 चुनाव: बीजेपी के गौरी शंकर वर्मा ने दोबारा जीत हासिल की, सपा के दयाल शंकर वर्मा दूसरे स्थान पर रहे.

बीजेपी बनाम सपा: दोनों दलों के दावे

बीजेपी (विधायक गौरी शंकर वर्मा का पक्ष): मौजूदा विधायक गौरी शंकर वर्मा का कहना है कि 2017 से पहले क्षेत्र में सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं की हालत खराब थी. उनके मुताबिक, पिछले 7-8 वर्षों में उरई में सड़कों का नेटवर्क बिछाया गया, मोक्ष धाम व मुख्य द्वारों का सौंदर्यीकरण कराया गया और लगातार चौपालों के जरिए जनसमस्याओं का निपटारा किया गया है. बीजेपी को सीएम योगी आदित्यनाथ के चेहरे, अपनी योजनाओं और संगठन के दम पर हैट्रिक लगाने का पूरा भरोसा है.

समाजवादी पार्टी (जिला अध्यक्ष दीप राज गुर्जर का पक्ष): सपा का मानना है कि 2022 में मामूली अंतर से हारने के बावजूद पार्टी को लगभग 92,000 वोट मिले थे. सपा नेताओं का कहना है कि पार्टी अब गांव-गांव जाकर बूथ स्तर पर जनता से संवाद कर रही है और अखिलेश यादव सरकार की पुरानी जनहितकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार कर रही है. 2024 लोकसभा चुनाव में मिली बढ़त से उत्साहित सपा को भरोसा है कि 2027 में वे जिले की तीनों सीटों पर जीत दर्ज करेंगे. 

उरई का जातीय समीकरण

उरई विधानसभा सीट पर करीब साढ़े तीन लाख से अधिक मतदाता हैं, जिनमें जातीय आंकड़े महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं:

  • अनुसूचित जाति (SC): ~1,15,000 वोटर्स
  • पिछड़ा वर्ग (OBC): ~1,29,000 वोटर्स
  • सवर्ण मतदाता: ~54,700 वोटर्स
  • मुस्लिम मतदाता: ~44,000 वोटर्स
  • अन्य: ~11,000 वोटर्स

क्या कहते हैं स्थानीय पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक?

स्थानीय विश्लेषकों का मानना है कि इस बार उरई विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है.

एंटी-इन्कम्बेंसी और स्थानीय मुद्दे: लगातार दो बार विधायक रहने के कारण स्थानीय नाराजगी और एंटी-इन्कम्बेंसी का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा प्रदेश स्तर के कुछ ज्वलंत मुद्दों का असर भी मतदाताओं पर देखा जा रहा है.

गठबंधन का प्रभाव: यदि सपा और कांग्रेस का गठबंधन बरकरार रहता है, तो दलित और मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा गठबंधन के पाले में जा सकता है. साथ ही, ब्राह्मण मतदाताओं के एक वर्ग का झुकाव भी बदलाव की तरफ दिख रहा है.

बीएसपी की स्थिति: कभी मजबूत गढ़ रही बीएसपी का कोर वोट बैंक अब विकल्प की तलाश में है, जिसका सीधा फायदा सपा-गठबंधन को मिल सकता है. हालांकि, उरई की अंतिम चुनावी तस्वीर दोनों मुख्य दलों- बीजेपी और सपा द्वारा प्रत्याशियों के आधिकारिक ऐलान के बाद ही पूरी तरह साफ होगी.


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