काशी (बनारस) अपनी संस्कृति, घाटों और जायके के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है. बनारस के इसी अनूठे अंदाज और स्वाभिमान का उदाहरण हैं राजेंद्र चौरसिया. उच्च शिक्षा और खेल के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धियां हासिल करने के बावजूद उन्होंने नौकरी चुनने के बजाय अपनी पारिवारिक विरासत और पिता की पान की दुकान को चुना. आज उनकी दुकान का पान केवल स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी बड़े चाव से खाते हैं.
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BHU के छात्र और कबड्डी के नेशनल प्लेयर रहे राजेंद्र चौरसिया
राजेंद्र चौरसिया ने वर्ष 1978 में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) से सोशियोलॉजी (समाजशास्त्र) में एम.ए. पास आउट किया. पढ़ाई के साथ-साथ वे खेलकूद में भी काफी आगे थे. राजेंद्र कबड्डी के नेशनल प्लेयर और 1975 में यूनिवर्सिटी टीम के कप्तान भी रह चुके हैं. इसके अलावा वे 1976 में स्टेट चैंपियन भी बने. उच्च शिक्षा और खेल में शानदार प्रदर्शन के बावजूद उन्होंने सरकारी या निजी नौकरी करने के बजाय अपने पिता के साथ दुकान पर हाथ बटाना सही समझा. उन्होंने अपने इस पुश्तैनी काम को ही अपना मंदिर माना और भाईयों के साथ मिलकर इसे एक पहचान दी.
चार पीढ़ियों की विरासत और 100% आयुर्वेदिक तरीका
राजेंद्र चौरसिया बताते हैं कि यह उनका खानदानी पेशा है और उनकी परिवार की चौथी पीढ़ी इस काम को संभाल रही है. उनकी दुकान की सबसे बड़ी खासियत स्वच्छता और शुद्धता है.
- आयुर्वेदिक पद्धति: उनके पान में किसी भी प्रकार के केमिकल का इस्तेमाल नहीं होता.
- खास स्वाद: कत्था और चूना मिलाने का खास तरीका और प्राकृतिक फूलों के इत्र का कॉम्बिनेशन ही उनके पान को लाजवाब बनाता है.
- विभिन्न वैरायटी: उनकी दुकान पर मौसम के हिसाब से मगही (गया से), जगन्नाथी (ओडिशा से), सांची और देसी पान की वैरायटी उपलब्ध रहती है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी भाया बनारसी पान
राजेंद्र चौरसिया का जुड़ाव देश की सियासत से भी खास रहा है. वर्ष 2014 में जब नरेंद्र मोदी पहली बार वाराणसी से चुनाव लड़ रहे थे, तब राजेंद्र चौरसिया उनके प्रस्तावकों में शामिल थे.
काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के उद्घाटन के दौरान राजेंद्र जी ने पीएम मोदी को खुद अपने हाथों से पान खिलाया था. पान का स्वाद पीएम मोदी को इतना पसंद आया कि अब जब भी वे बनारस आते हैं या बरेका (BLW) गेस्ट हाउस में रुकते हैं, तो उनके लिए राजेंद्र जी की दुकान से ही विशेष पान भेजा जाता है.
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