उत्तराखंड: खौफनाक सफर! बारिश और गहरी खाई के बीच कंधों पर जिंदगी, चमोली की इस तस्वीर ने पूरे राज्य को झकझोरा

कमल नयन सिलोड़ी

04 Sep 2026 (अपडेटेड: Sep 4 2026 4:12 PM)

सड़क न होने के कारण चमोली में बारिश और खतरनाक रास्तों के बीच ग्रामीणों को प्रसूता को 3 किलोमीटर डांडी (डोली) पर उठाकर अस्पताल पहुंचाना पड़ा. खराब मौसम की वजह से हेलीकॉप्टर सेवा भी ठप रही, जिससे पहाड़ी इलाकों में बदहाल स्वास्थ्य और सड़क सुविधाओं की पोल खुल गई.

उत्तराखंड में खौफनाक मंजर
उत्तराखंड में खौफनाक मंजर
Google CTA

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों से सुविधाओं के बड़े-बड़े दावों की पोल खोलती एक और दर्दनाक तस्वीर सामने आई है. चमोली जिले के देवाल विकासखंड से आए इस मामले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि दुर्गम गांवों में आज भी जिंदगी और इलाज के बीच की दूरी कितनी जानलेवा है. मामला पिनाऊं-ब्लाण क्षेत्र का है, जहां प्रसव पीड़ा से कराह रही एक महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ी.

Read more!

गांव तक सड़क न होने के कारण ग्रामीणों ने तुरंत लकड़ी और कपड़े की मदद से एक 'डांडी' (डोली) तैयार की. इसके बाद प्रसूता को उस पर लिटाकर गांव के युवाओं ने अपने कंधों पर उठाया और करीब 3 किलोमीटर लंबा बेहद खतरनाक सफर पैदल तय किया.

गहरी खाई, झमाझम बारिश और फिसलन भरा रास्ता

इलाके में लगातार हो रही तेज बारिश के कारण पहाड़ी रास्ते पूरी तरह फिसलन भरे और संकरे हो चुके थे. एक तरफ ऊंची पहाड़ी और दूसरी तरफ गहरी खाई- इस बेहद जोखिम भरे रास्ते पर ग्रामीणों के कदम भले ही डगमगा रहे थे, लेकिन उनकी हिम्मत नहीं टूटी. घंटों की कड़ी मशक्कत के बाद वे किसी तरह महिला को लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र देवाल पहुंचे.

मौसम की मार: हेलीकॉप्टर भी नहीं आ सका

महिला की नाजुक हालत को देखते हुए प्रशासन की ओर से उसे एयरलिफ्ट करने यानी हेलीकॉप्टर से बड़े अस्पताल भेजने की कोशिश भी की गई. लेकिन लगातार बिगड़ रहे मौसम और कम विजिबिलिटी (दृश्यता) के कारण हेलीकॉप्टर लैंड नहीं कर सका. आखिरकार, देवाल से सड़क मार्ग के जरिए महिला को बागेश्वर अस्पताल के लिए रेफर किया गया, जहां उसका इलाज जारी है.

सिस्टम पर खड़े होते गंभीर सवाल

पहाड़ों में मानसूनी बारिश के दौरान रास्ते वैसे ही जानलेवा हो जाते हैं. ऐसे में अगर किसी को मेडिकल इमरजेंसी पड़ जाए, तो समय पर इलाज मिलना किस्मत के भरोसे ही रहता है. पिनाऊं-ब्लाण की इस घटना ने साफ कर दिया है कि आजादी के दशकों बाद भी उत्तराखंड के सीमांत गांवों तक पक्की सड़कें और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना कागजों तक ही सीमित है. जब तक हर गांव सड़क से नहीं जुड़ता, तब तक डांडी-कांडी ही इन ग्रामीणों का इकलौता सहारा बनी रहेगी.

ये भी पढ़ें: Nainital News: नैनीताल के निजी स्कूलों की मनमानी पर DM ललित मोहन रयाल का बड़ा एक्शन, 46 स्कूलों ने लौटाए 39 लाख रुपए