IMPCL Sold To Which Company: केंद्र सरकार ने उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के मोहन में स्थित भारत की एकमात्र आयुर्वेद और यूनानी दवाई बनाने वाली सरकारी कंपनी इंडियन मेडिसिंस फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड यानी IMPCL को निजी हाथों में बेच दिया है. सरकार ने ये सौदा कुल 121 करोड़ रुपये में किया है जिसके बाद से पूरे उत्तराखंड में सियासी और सामाजिक घमासान मचा हुआ है. मामले में सवाल उठ रहे हैं कि जो कंपनी लगातार मुनाफे में चल रही थी उसे क्यों बेचा जा रहा है. इस सौदे से नाराज कंपनी के 500 से अधिक कर्मचारी और मजदूर अब कंपनी के गेट पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया है. मजदूरों के इस आंदोलन को विपक्ष का भी समर्थन मिलने लगा है जिसके तहत पहले ही दिन कांग्रेस व उत्तराखंड क्रांति दल के नेता धरना स्थल पर पहुंच गए.
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मुनाफे वाली कंपनी को सस्ते में बेचने पर उठे सवाल
इस पूरी डील के सामने आते ही कई तरह के गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. मिली जानकारी के अनुसार, IMPCL का सालाना टर्नओवर लगभग 145 करोड़ से 160 करोड़ रुपये के बीच था. ये कंपनी लगातार लाभ कमा रही थी. जानकारों के मुताबिक इस कंपनी की कुल बाजार कीमत 200 करोड़ रुपये से भी अधिक बताई जा रही है, लेकिन केंद्र सरकार ने इसे महज 121 करोड़ रुपये में बेच दिया. लगातार फायदा देने वाली और 500 से ज्यादा लोगों को रोजगार देने वाली इस सरकारी कंपनी को उसकी अनुमानित कीमत से कम में बेचे जाने के कारण अब सरकार की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं.
कब बनी थी IMPCL?
IMPCL की स्थापना साल 1978 में हुई थी. कंपनी ने साल 1982 से व्यावसायिक तौर पर दवाओं का उत्पादन शुरू किया था. यह कंपनी केंद्रीय आयुष मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करने वाली एक मिनी रत्न कैटेगरी-2 सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम (CPSE) रही है. कंपनी लगभग 656 आयुर्वेदिक और 336 यूनानी दवाओं का निर्माण करती आई है. कोविड-19 महामारी के दौरान जब देश में आयुष उत्पादों की मांग बढ़ी थी तब इस कंपनी की प्रासंगिकता और ज्यादा साबित हुई थी.
सैकड़ों लोगों की आजीविका दांव पर
अल्मोड़ा के मोहन में स्थित इस कंपनी के पास वन क्षेत्र से सटी हुई लगभग 42 एकड़ की बेशकीमती भूमि है. इसके साथ ही कंपनी के पास अत्याधुनिक निर्माण संयंत्र मौजूद हैं. इस फैक्ट्री से करीब 500 से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर्मचारी जुड़े हुए हैं जिनमें स्थानीय जड़ी-बूटी संग्राहक भी शामिल हैं जिनकी आजीविका पूरी तरह से इसी कंपनी पर टिकी हुई थी. अब कंपनी के निजी हाथों में जाने से इन सभी लोगों के सामने बेरोजगार होने का बड़ा संकट खड़ा हो गया है.
सरकार ने निजीकरण के पीछे दिया ये तर्क
भारत सरकार के निवेश और लोक संपत्ति प्रबंधन विभाग यानी (DIPAM) ने कैबिनेट के फैसले के आधार पर IMPCL में सरकार की 100 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने के लिए टेंडर जारी किए थे. इस हिस्सेदारी में 98.11 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार का और 1.89 प्रतिशत हिस्सा उत्तराखंड सरकार के कुमाऊं मंडल विकास निगम का था. सरकार और निजीकरण के समर्थकों का तर्क है कि यह सरकार की विनिवेश नीति का हिस्सा है जिसके तहत रक्षा, परमाणु ऊर्जा, वित्तीय सेवाओं और बुनियादी ढांचे जैसे रणनीतिक क्षेत्रों को छोड़कर बाकी क्षेत्रों से सरकार अपनी मौजूदगी कम कर रही है. उनका मानना है कि दवा बनाना निजी क्षेत्र का काम है सरकार का नहीं. इसके अलावा सरकारी संपत्तियों को बेचकर मिलने वाले धन को देश के बुनियादी ढांचे जैसे सड़क, रेलवे, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास और सामाजिक कल्याण योजनाओं में लगाने का नीतिगत ढांचा तैयार किया गया है.
कौन है IMPCL को खरीदने वाली नई मालिक कंपनी?
भारत सरकार के वित्त मंत्रालय ने स्काईमैप फार्मास्युटिकल्स प्राइवेट लिमिटेड (Skymap Pharmaceuticals Pvt Ltd) को IMPCL का नया मालिक घोषित किया है. स्काईमैप फार्मास्युटिकल्स ने इसके लिए 121 करोड़ 94 हजार 400 रुपये की सबसे ऊंची बोली लगाई थी जिसे सरकार के अधिकार प्राप्त मंत्री समूह ने मंजूरी दे दी. इस सौदे के बाद अब स्काईमैप को कंपनी के 100 प्रतिशत शेयर और पूरा मैनेजमेंट कंट्रोल सौंप दिया गया है. स्काईमैप फार्मास्युटिकल्स की स्थापना साल 2006 में हुई थी और यह मूल रूप से दिल्ली-एनसीआर आधारित कंपनी है जिसके मुख्य प्रमोटर और संस्थापक संजय गुप्ता हैं.
एलोपैथी कंपनी को आयुष का जिम्मा देने पर उठे सवाल
स्काईमैप फार्मास्युटिकल्स मुख्य रूप से एलोपैथिक दवाएं जैसे टैबलेट, कैप्सूल, इंजेक्शन और सिरप बनाने के साथ-साथ कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग का काम करती है. कंपनी के पास 500 से अधिक फार्मा उत्पादों का पोर्टफोलियो है और यह विदेशों में भी दवाएं भेजती है लेकिन स्काईमैप का पूरा अनुभव एलोपैथी और मॉडर्न मेडिसिन में ही रहा है. विश्लेषकों का मानना है कि देश के तेजी से बढ़ते आयुर्वेदिक और वैलनेस मार्केट में अपना सीधा एकाधिकार स्थापित करने के लिए इस कंपनी ने IMPCL के स्थापित ब्रांड, 42 एकड़ के इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकारी जड़ी-बूटी नेटवर्क को खरीदा है. स्काईमैप द्वारा लगाई गई यह बोली सरकार के रिजर्व प्राइस से थोड़ी ही ऊपर थी. अब सवाल यह भी उठ रहा है कि जिस एलोपैथी निर्माता कंपनी को आयुर्वेद का कोई अनुभव नहीं है उसे इतनी बड़ी आयुष कंपनी सौंपने के पीछे सरकार का क्या मकसद है और क्या यह कुमाऊं की प्राकृतिक संपदा को कॉर्पोरेट के हवाले करने की कोशिश है.
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