Pantnagar university VC appointment controversy: उत्तराखंड के प्रतिष्ठित गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर के कुलपति (VC) की नियुक्ति प्रक्रिया विवादों के घेरे में आ गई है. राजभवन में चयन को लेकर सरगर्मियां तेज हैं, लेकिन इसी बीच पैनल में शामिल तीन नामों में से शामिल एक उम्मीदवार डॉ. शिवेंद्र कुमार कश्यप के खिलाफ 10 लाख रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता और बिना अनुमति आवेदन करने के गंभीर आरोप सामने आए हैं. ऐसे में अब इन आरोपों के सामने आने के बाद से उनकी उम्मीदवारी पर सवाल उठने लगे. क्या है पूरा मामला और क्यों उठ रहे हैं सवाल? विस्तार से जानिए इस खबर में...
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दरअसल, उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने 20 अप्रैल 2026 को कुलपति चयन प्रक्रिया के तहत अभ्यर्थियों के साथ अहम संवाद बैठक की थी. राज्य सरकार द्वारा गठित सर्च कमेटी ने तीन नामों डॉ. मनमोहन सिंह चौहान, डॉ. हरेंद्र कुमार चौधरी और डॉ. शिवेंद्र कश्यप का पैनल प्रस्तुत किया है, लेकिन अब तक अंतिम नियुक्ति पर फैसला नहीं हो पाया है. इस बीच चयन प्रक्रिया के साथ एक विवाद भी जुड़ गया है. जानकारी के अनुसार पैनल में शामिल डॉ. शिवेंद्र कश्यप के खिलाफ करीब 10 लाख रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला विचाराधीन है.
इस मामले में पहले जारी चार्जशीट को उत्तराखंड उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी. अदालत ने चार्जशीट को वापस लेकर संबंधित जांच समिति से याचिकर्ता को आरोप पत्र भेजने का आदेश दिया है. यदि इस पर भी याचिकाकर्ता को लगता है तो वो कोर्ट आने के स्वतंत्र हैं. कश्यप पर जांच अभी भी जारी है और विश्वविद्यालय नियम अनुसार कारवाई कर सकता है. इस मामले मैनेजमेंट बोर्ड 2 दोषियों को आरोप पत्र भेजने के लिए कारवाई भी कर रहा है.
जानिए क्या है 10 लाख रुपये की अनियमितता का मामला?
पंतनगर स्थित गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में सामुदायिक रेडियो केंद्र से जुड़े मामले में 19 नवंबर 2018 को सेवानिवृत्त व्यक्तिगत सहायक भीष्म सिंह द्वारा एक शिकायत पत्र प्रस्तुत किया गया था. पत्र में आरोप लगाया गया कि संयुक्त निदेशक पद पर तैनात डॉ. एस.के. कश्यप को निर्धारित अवधि से अधिक समय तक पद पर बनाए रखा गया जो विश्वविद्यालय के नियमों के खिलाफ है. साथ ही शिकायत में कहा गया कि वर्ष 2014 से 2016 के बीच सामुदायिक रेडियो केंद्र के बैंक खाते से करीब 10 लाख रुपये की निकासी की गई, जिसे संयुक्त निदेशक और उनके अधीनस्थ कर्मचारी के माध्यम से निकाले जाने का आरोप है. इस संबंध में बैंक स्टेटमेंट सहित दस्तावेज भी साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किए जाने की बात कही गई है.
जांच समितियों का गठन और राजभवन के निर्देश
3 जनवरी 2019 को कुलपति द्वारा मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति के गठन के आदेश दिए गए. इसके बाद जांच पूरी होने पर 9 अक्टूबर 2021 को मुख्य कार्मिक अधिकारी ने पत्र जारी किया. मामले को आगे बढ़ाते हुए 16 जनवरी 2022 को शिकायतकर्ता भीष्म सिंह ने राज्यपाल को पत्र लिखकर पूरे प्रकरण की जानकारी दी. इसके बाद 2 सितंबर 2022 को राज्यपाल के निर्देश पर सचिव, राज्यपाल की अध्यक्षता में संबंधित अधिकारियों और शिकायतकर्ता के साथ बैठक हुई, जिसकी मिनट्स ऑफ मीटिंग भी जारी की गई. 19 सितंबर 2022 को सचिव, राज्यपाल के आदेश पर पंतनगर विश्वविद्यालय के निदेशक अनुश्रवण द्वारा पुनः जांच शुरू की गई.
जांच रिपोर्ट में हुई अनियमितताओं पुष्टि
हालांकि, 28 अक्टूबर 2022 तक निर्धारित समयसीमा में जांच पूरी नहीं हो सकी, जिसके बाद राजभवन की ओर से कुलपति को जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए. 10 दिसंबर 2022 को नए कुलपति एम.एस. चौहान ने जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें उल्लेख किया गया कि सामुदायिक रेडियो केंद्र से जुड़े संयुक्त निदेशक डॉ. एस.के. कश्यप, श्याम सिंह और अन्य द्वारा पंजाब नेशनल बैंक में विश्वविद्यालय के एक खाते से लगभग 10 लाख रुपये निकाले गए. जांच में संबंधित अधिकारियों द्वारा वित्तीय अनियमितताओं की पुष्टि होने की बात सामने आई. इसके बाद 28 फरवरी 2023 को राजभवन ने विश्वविद्यालय को नियमों के अनुसार कार्रवाई करने के निर्देश दिए.
आरोपों को डॉ. कश्यप ने कोर्ट में दी चुनौती
हालांकि 9 जून 2023 को निदेशक अनुश्रवण ने राज्यपाल के उप सचिव को पत्र लिखकर विश्वविद्यालय द्वारा की गई कार्रवाई को उचित नहीं बताया. 5 फरवरी 2026 को विश्वविद्यालय के कार्मिक विभाग ने आरोपी संयुक्त निदेशक डॉ. एस.के. कश्यप को चार्जशीट जारी की. 25 फरवरी 2026 को प्रबंध समिति के सदस्य अरुण रावत को नई जांच समिति का अध्यक्ष बनाया गया और उनके साथ तीन अन्य सदस्यों को भी शामिल किया गया. 28 फरवरी 2026 को नई समिति की ओर से भीम सिंह और डॉ. एस.के. कश्यप को नोटिस जारी कर जवाब प्रस्तुत करने के लिए 18 मार्च 2026 को उपस्थित होने को कहा गया. हालांकि निर्धारित तिथि पर डॉ. एस.के. कश्यप जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित नहीं हुए और असमर्थता जताई. इस बीच यह भी सामने आया कि 5 फरवरी 2026 को ही डॉ. कश्यप ने अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया है.
शिकायतकर्ता का ने कहा न्याय की उम्मीद कम
आज तक से फोन पर बातचीत में शिकायतकर्ता भीम सिंह ने कहा, इस मामले को कई साल बीत चुके हैं और न्याय की आशा धुंधली होती जा रही है जब मैं विभाग में कार्यरत था मैंने तभी इस मामले को उठाया था क्योंकि मुझे लगता था की सरकार के पैसे का दुरुपयोग हो रहा है और इस धांधली की वजह से विश्वविद्यालय का नाम भी खराब होगा लेकिन अब मुझे लगता है की न्याय मिलने की उम्मीद बहुत कम है.
हाईकोर्ट का आदेश और चार्जशीट की प्रक्रिया
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा जारी चार्जशीट को वापस लेने के निर्देश दिए. अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को 5 फरवरी 2026 को जो चार्जशीट जारी की गई थी, वह मुख्य कार्मिक अधिकारी द्वारा कुलपति की ओर से जारी की गई थी, जबकि नियमों के अनुसार यह अधिकार केवल सक्षम अनुशासनात्मक प्राधिकारी को ही है. उच्च न्ययालय ने कहा यदि सक्षम अधिकारी के द्वारा चार्जशीट पर याचिकाकर्ता को आपत्ति है तो वह कोर्ट आने के लिए स्वतंत्र हैं. आदेश के बाद अब पंतनगर विश्विद्यालय बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट डॉ एस के कश्यप को चार्जशीट भेजने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है.
हमारे सहयोगी 'आज तक' ने याचिकाकर्ता और इस मामले में आरोपी डॉक्टर शिवेंद्र कश्यप से बातचीत करने की कोशिश की लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिल सका.
बिना NOC आवेदन करने का भी लगा आरोप
उधमसिंह नगर स्थित गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर में कुलपति पद के लिए आवेदन प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े हुए हैं. 20 मार्च 2026 को मुख्य कार्मिक अधिकारी की ओर से राज्यपाल सचिवालय, देहरादून को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि डॉ. शिवेंद्र कुमार कश्यप ने कुलपति पद के लिए आवेदन करने का दावा किया है, जबकि विश्वविद्यालय के अभिलेखों में ऐसा कोई आवेदन दर्ज नहीं है. पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि सेवा में रहते हुए किसी कर्मचारी को बाहरी पद के लिए आवेदन विश्वविद्यालय के निर्धारित “प्रॉपर चैनल” के माध्यम से करना होता है और इसके लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) लेना अनिवार्य है. आरोप है कि डॉ. कश्यप ने न तो यह प्रक्रिया अपनाई और न ही एनओसी प्राप्त किया, बल्कि सीधे उत्तराखंड सरकार को आवेदन भेज दिया. विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस पूरे मामले को राज्यपाल सचिवालय के संज्ञान में लाते हुए संबंधित दस्तावेज भी प्रस्तुत किए हैं.
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