अगर तेजस्वी यादव और प्रशांत किशोर ने मिला लिया हाथ, तो क्या सच में साफ हो जाएगी NDA? जानिए क्या कहता है आंकड़ों का खेल
Bihar Politics: क्या तेजस्वी यादव और प्रशांत किशोर साथ आ जाएं तो बिहार में बीजेपी और NDA को बड़ा नुकसान हो सकता है? RJD नेता रोहिणी आचार्य ने हालिया MLC चुनावों के आंकड़ों का हवाला देते हुए दोनों नेताओं के साथ आने का सुझाव दिया है. दावा है कि सात सीटों पर RJD और जन सुराज के वोट जोड़ने पर NDA के वोट पीछे रह जाते हैं, जबकि तिरहुत सीट पर तस्वीर अलग है. जानिए क्या है वोटों का पूरा गणित.
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बिहार की राजनीति इन दिनों एक सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर बेहद गर्म है. राष्ट्रीय जनता दल (RJD) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने एक ऐसा सियासी दांव चल दिया है, जिसने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. रोहिणी ने सोशल मीडिया पर सुझाव दिया है कि अगर तेजस्वी यादव (TJ) और प्रशांत किशोर (PK) हाथ मिला लें, तो एनडीए और बीजेपी का बिहार में सफाया तय है और उनका खाता भी नहीं खुलेगा. उन्होंने इस दावे के पीछे हाल ही में हुए विधान परिषद (MLC) चुनावों के आंकड़ों का हवाला दिया है. विस्तार से जानिए पूरी बात.
क्या कहते हैं एमएलसी चुनाव के आंकड़े?
इसे बहुत आसान तरीके से ऐसे समझें कि जब चुनाव हुए, तो आरजेडी और प्रशांत किशोर की नई पार्टी 'जन सुराज' को अलग-अलग जितने वोट मिले थे, अगर उन दोनों के वोटों को आपस में जोड़ दिया जाए, तो तस्वीर बिल्कुल बदल जाती है:
सात सीटों का गणित: सारण, दरभंगा, कोसी और पटना जैसी कई महत्वपूर्ण स्नातक और शिक्षक निर्वाचन सीटों पर अगर आरजेडी और जन सुराज के वोट मिला दिए जाएं, तो उनके कुल वोट बीजेपी (एनडीए) के वोटों से काफी ज्यादा हो जाते हैं. यानी कागजी तौर पर देखें तो वोटों का यह गणित एनडीए को कड़ी टक्कर देने या हराने के लिए काफी नजर आता है.
एक सीट पर अपवाद: हालांकि, तिरहुत स्नातक सीट पर एनडीए के वोट दोनों दलों के संयुक्त वोटों से अधिक पाए गए.

लेकिन क्या जमीन पर ऐसा होना आसान है?
राजनीति को करीब से समझने वाले लोग और एक्सपर्ट्स मानते हैं कि कागजों पर दो पार्टियों के वोटों को जोड़ देना जितना आसान लगता है, असल जिंदगी में उतना ही मुश्किल होता है. इसके पीछे कुछ बड़े व्यावहारिक पेंच हैं:
वोट ट्रांसफर होना: आरजेडी का अपना पक्का वोटर बेस है, वहीं प्रशांत किशोर एक बिल्कुल अलग और नए वैकल्पिक राजनीतिक सोच के साथ मैदान में हैं. क्या आरजेडी का वोटर पीके के उम्मीदवार को वोट देगा और क्या पीके के समर्थक लालटेन (RJD) के पक्ष में वोट डालेंगे? यह सबसे बड़ा सवाल है।
नेतृत्व का सवाल: अगर दोनों दल साथ आते हैं, तो गठबंधन का चेहरा या मुख्य नेता कौन होगा? इन सवालों के जवाब के बिना गठबंधन आसान नहीं होता.
नेताओं और पार्टी के भीतर क्या चल रहा है?
इस चर्चा के बीच आरजेडी के नवनिर्वाचित एमएलसी डॉ. संजीव कुमार ने खुलकर अपनी राय रखी है. उनका कहना है कि यदि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व और महागठबंधन के तमाम दल मिलकर इस पर सोच-विचार करें और पहल करें, तो जनता के बीच एक बहुत अच्छा मैसेज (परसेप्शन) जाएगा और मिलकर चुनाव लड़ने में कोई हर्ज नहीं है. हालांकि, जानकारों का यह भी मानना है कि एमएलसी चुनाव (जो कि शिक्षक और पढ़े-लिखे स्नातक लोगों के बीच होता है) और आम जनता के बीच होने वाले विधानसभा चुनावों का मिजाज बिल्कुल अलग होता है.
फिलहाल दोनों दलों की तरफ से किसी आधिकारिक गठबंधन का ऐलान नहीं हुआ है, लेकिन रोहिणी आचार्य के इस बयान ने बिहार के राजनीतिक बाजार में नई चर्चाओं और बहसों को जरूर हवा दे दी है.
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