पति को उम्रकैद, गोद में 2 महीने की बच्ची और 10 साल का नर्क... दलजीत सिहाग की पत्नी का छलका दर्द!

दलजीत सिहाग की पत्नी अनीता सिहाग ने 'हरियाणा Tak' से बातचीत में 10 साल के लंबे संघर्ष और समाज के रवैये का दर्द बयां किया है. जाट आरक्षण मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा दलजीत सिहाग को बाइज्जत बरी किए जाने से उनके परिवार को बड़ी राहत मिली है.

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दलजीत सिहाग की पत्नी
दलजीत सिहाग की पत्नी
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जाट आरक्षण आंदोलन 2016 से जुड़े मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहे दलजीत सिहाग समेत तीन लोगों को हाल ही में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है. हाईकोर्ट ने दलजीत सिहाग को बाइज्जत बरी कर दिया है. इस फैसले के बाद दलजीत सिहाग की पत्नी अनीता सिहाग ने 'हरियाणा Tak' से खास बातचीत की और अपने 10 साल के लंबे, दर्दनाक संघर्ष और समाज के रवैये पर खुलकर बात रखी.

जिंदगी फिर से वापस मिलने जैसा

अनीता सिहाग ने बताया कि जब उनके पति को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी, तब ऐसा लगा था कि मानो उनकी पूरी जिंदगी ही खत्म हो गई हो. उस वक्त उनकी बेटी मां की कोख में थी और जब दलजीत सिहाग जेल गए, तब बच्ची मात्र दो महीने की थी. आज वह बेटी 10 साल की हो चुकी है. अनीता ने कहा कि हाईकोर्ट से पति के बाइज्जत बरी होने की खबर उनके परिवार के लिए 'दुबारा जिंदगी मिलने' जैसी है. उन्होंने अपनी इस लंबी कानूनी लड़ाई में न्यायपालिका और विशेषकर जज राजेश भारद्वाज का तहदिल से शुक्रिया अदा किया है, जिन्होंने उनके पति को न्याय दिलाया.

आर्थिक तंगी और मानसिक प्रताड़ना का सामना

अनीता ने अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताया कि एक परिवार में कमाने वाला अकेला जिम्मेदार व्यक्ति जब जेल चला जाता है, तो पीछे कुछ नहीं बचता. बच्चों का पालन-पोषण, घर का खर्च, हिसार से लेकर चंडीगढ़ तक अदालतों और वकीलों के चक्कर काटने में उन्हें भारी आर्थिक तंगी और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ा. उन्होंने बताया कि इस दौरान उनके ससुर को भी गहरा सदमा लगा था, जिनका 2022 में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. इसके अलावा, कुछ समय पहले दलजीत सिहाग को पुलिस द्वारा बेड़ियां पहनाकर घुमाने की घटना ने उनके परिवार को अंदर से झकझोर कर रख दिया था, जिससे उनके बच्चों पर भी गहरा मानसिक असर पड़ा था.

समाज के दोहरे चरित्र पर छलका दर्द

समाज के सहयोग पर बात करते हुए अनीता सिहाग ने कड़वी सच्चाई बयां की. उन्होंने कहा कि आंदोलन के समय युवाओं को आगे कर दिया जाता है, लेकिन जब कोई मुसीबत आती है या इंसान जेल चला जाता है, तो समाज के ठेकेदार मदद से पीछे हट जाते हैं. उन्होंने पंचायत और समाज के भरोसे के बजाय सीधे न्यायपालिका पर भरोसा रखने की बात कही. साथ ही, उन्होंने युवा पीढ़ी और समाज के लोगों को संदेश दिया कि यदि वे किसी को किसी आंदोलन या मामले में आगे बढ़ाते हैं, तो उसके परिवार की आखिरी दम तक जिम्मेदारी भी उठानी चाहिए.

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