पाकिस्तान का खौफनाक सच: 'जबरन धर्मांतरण और शेल्टर होम का काला खेल' 13 साल पहले भारत आए हरिराम ने क्या बताया ?

सिंध से भागकर भारत आए हरिराम की बेटी 'धारा' अब खेल के मैदान में भारत का बढ़ाएगी मान. भावुक होकर हरिराम कहते हैं, "हम जिस देश में बिना पहचान के आए थे, आज हमारी बेटी उसी भारत देश की जर्सी पहनकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करेगी.'' भारत TAK के खास पॉडकास्ट में हरिराम का छलका दर्द.

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भारत तक के पॉडकास्ट में हरिराम ने किए कई खुलासे.
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पाकिस्तान के सिंध में जहां हिंदू परिवारों के लिए अपनी बेटियों का भविष्य और सुरक्षा हमेशा एक खौफनाक सपना है, वहीं भारत आकर नागरिकता हासिल करने वाले हरिराम के घर आज उम्मीद की एक नई किरण चमकी है. पाकिस्तान का अत्याचार और बेटियों का जबरन धर्म परिवर्तन सहकर 13 साल पहले भारत आए हरिराम के परिवार को आखिरकार भारतीय नागरिकता मिल गई है, लेकिन इस कहानी का सबसे खूबसूरत पहलू है उनकी 13 साल की दिव्यांग बेटी धारा सिंधु, जो अब टेबल टेनिस में भारत का प्रतिनिधित्व करने की तैयारी कर रही है. 

हरिराम ने पाकिस्तान के सिंध प्रांत की दर्दनाक हकीकत बयान करते हुए बताया कि 2013 के आसपास पाकिस्तान में हिंदू बच्चियों का अपहरण और जबरन धर्मांतरण (Forceful Conversion) की घटनाएं बेहद बढ़ गई थीं.

हिंदू बेटी कोर्ट में रोती थीं, फिर भी नहीं होती थी सुनवाई

वे बताते हैं, "रोजाना 1-2 हिंदू बच्चियों को उठाकर जबरन इस्लाम कबूल कराया जाता था. जब मासूम बच्चियां कोर्ट के सामने चिल्ला-चिल्लाकर रोती हैं कि उन्हें अपने मां-बाप के पास जाना है, तब भी कानून उनकी नहीं सुनता. कोर्ट उन्हें 20 दिन के लिए शेल्टर होम (Safety House) भेज देता है. उन 20 दिनों में बच्ची पर इतना मानसिक दबाव बनाया जाता है कि वह कभी वापस अपने घर लौटकर नहीं आती. इसी डर से हमने थार एक्सप्रेस पकड़ी और सब कुछ छोड़कर भारत आ गए."

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मजबूरी की मजदूरी से भारतीय पहचान तक का सफर 

वर्ष 2013 में थार एक्सप्रेस से अपने पूरे परिवार के साथ गुजरात के आणंद पहुंचे हरिराम के लिए शुरुआती 3-4 साल बेहद कठिन रहे. बिना स्थानीय पहचान और आधार कार्ड के काम मिलना मुश्किल था. हरिराम बताते हैं कि उन्होंने गांव में मजदूरी और दिहाड़ी का काम करके अपने परिवार का पेट पाला. लेकिन वे कहते हैं, "हम वो सारी तकलीफें सहने को तैयार थे, पर उस नर्क में वापस नहीं रहना चाहते थे."

13 साल लंबे कानूनी और आधिकारिक इंतज़ार के बाद जब भारत सरकार ने उन्हें और उनके 158 अन्य साथियों को भारतीय नागरिकता का दस्तावेज़ सौंपा, तो यह केवल कागज का टुकड़ा नहीं बल्कि एक आज़ाद जीवन की नई शुरुआत थी.

दिव्यांग बेटी 'धारा' बनेगी भारत की शान 

हरिराम की 13 साल की बेटी धारा सिंधु का जन्म महज 7वें महीने में 800 ग्राम वजन के साथ हुआ था. डॉक्टरों ने उसके बचने की उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन धारा ने जिंदगी से जंग जीती. आज दिव्यांग होने के बावजूद धारा टेबल टेनिस में स्टेट और नेशनल लेवल पर अपना हुनर दिखा रही है.

आगामी दिसंबर में धारा दिल्ली में आयोजित होने वाली नेशनल टेबल टेनिस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने जा रही है. हरिराम भावुक होकर कहते हैं, "हम जिस देश में बिना पहचान के आए थे, आज हमारी बेटी उसी भारत देश की जर्सी पहनकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करेगी. हमारे लिए इससे बड़े गर्व की बात और क्या हो सकती है!"

यहां देखिए पूरा पॉडकास्ट 

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