Punjab Election 2027: पंजाब में AAP का वर्चस्व या BJP कांग्रेस स्थानीय पार्टियों के साथ कर सकती हैं बड़ा खेल? जानें रुद्र रिसर्च की ग्राउंड रिपोर्ट

पंजाब विधानसभा चुनाव को लेकर रुद्र रिसर्च की ग्राउंड रिपोर्ट. जानें क्या आम आदमी पार्टी अपना वर्चस्व बरकरार रखेगी या कांग्रेस की होगी वापसी. भाजपा और शिरोमणि अकाली दल चुनाव को बनाएंगे त्रिकोणीय? मालवा, माझा और दोआबा का पूरा जातीय व राजनीतिक समीकरण समझिए.

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पंजाब के आगामी विधानसभा चुनाव में कौन मारेगा बाजी ? कौन अभी कहां ? किसके सामने कौन सी चुनौतियां ? जानें इस ग्राउंड रिपोर्ट में.
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एक समय पंजाब की राजनीति कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल के बीच घूमती थी, लेकिन 2022 के बाद आम आदमी पार्टी के उदय के साथ इसमें बदलाव दिखाई देने लगा है. पंजाब विधानसभा का कार्यकाल मार्च 2027 में खत्म हो रहा है और इसी अवधि में राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं. आगामी चुनावों की पृष्ठभूमि में आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल जैसे प्रमुख राजनीतिक दल स्वतंत्र रूप से चुनावी तैयारियों में जुटे हुए दिखाई दे रहे हैं. 

2024 के लोकसभा चुनाव के अनुसार राज्य में कुल मतदाताओं की संख्या 21,567,196 है. पंजाब में कुल 117 विधानसभा क्षेत्र हैं और बढ़ता नशा तंत्र, बेरोजगारी, कृषि क्षेत्र का संकट, उद्योग एवं निवेश, कानून-व्यवस्था तथा युवाओं का पलायन आगामी चुनावों के प्रमुख मुद्दे बनने की संभावना है. 

पंजाब में सत्ता परिवर्तन की रही है परंपरा 

वर्ष 1967 से अब तक हुए विधानसभा चुनावों के इतिहास पर नजर डालें तो 2012 के विधानसभा चुनाव को छोड़कर किसी भी चुनाव में सत्तारूढ़ दल लगातार दूसरी बार सत्ता में नहीं लौट पाया है. इससे साफ है कि पंजाब में सत्ता परिवर्तन की परंपरा कायम रही है. ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव में एक बार फिर सत्ता परिवर्तन होता है या सत्तारूढ़ दल अपनी कुर्सी बरकरार रखता है, यह देखने वाली बात होगी. राजनीतिक विश्लेषण, चुनावी रुझानों का अध्ययन और चुनाव के पहले व बाद में सर्वेक्षण करने वाली पुणे की संस्था रुद्र रिसर्च एंड एनालिटिक्स ने पंजाब का दौरा कर राज्य की हालिया राजनीतिक हालात को जमीनी स्तर पर जानने और समझने की कोशिश की है.  साथ ही, दलवार रणनीतियों, सामाजिक समीकरणों, पिछले चुनावों के विश्लेषण तथा प्रमुख चुनावी मुद्दों के आधार पर एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट तैयार की गई है.

पिछले चुनावों के परिणाम 

  • 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने अभूतपूर्व सफलता हासिल करते हुए 92 सीटों पर जीत हासिल की थी. 
  • कांग्रेस को 18 सीटें मिली थीं.
  • शिरोमणि अकाली दल को केवल 3 सीटों से संतोष करना पड़ा. 
  • भारतीय जनता पार्टी ने महज 2 सीटें जीतीं. 
  • बहुजन समाज पार्टी को 1 सीट मिली. 
  • 1 निर्दलीय उम्मीदवार विजयी हुआ था. 

इसलिए कमजोर हुई कांग्रेस

इस परिणाम के साथ पंजाब की राजनीति में आम आदमी पार्टी का वर्चस्व कायम हो गया. पंजाब की जनता में कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल दोनों दलों के प्रति बढ़ता असंतोष, कई दशकों तक बारी-बारी से सत्ता में रहने के बावजूद नशे की समस्या, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और रेत माफिया जैसे मुद्दों के समाधान में इन दलों की सीमित सफलता, चुनाव से कुछ महीने पहले कांग्रेस द्वारा आंतरिक विवादों के कारण कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाना तथा उसके बाद नवजोत सिंह सिद्धू, चरणजीत सिंह चन्नी और सुनील जाखड़ के बीच चला आंतरिक संघर्ष इन सभी कारणों ने कांग्रेस की स्थिति को कमजोर किया.

AAP का दिल्ली मॉडल और मान के चेहरे पर मिली जीत

दूसरी ओर, अरविंद केजरीवाल के "दिल्ली मॉडल" की चर्चा पंजाब के घर-घर तक पहुंची. पार्टी ने भगवंत मान को मुख्यमंत्री पद का आधिकारिक चेहरा घोषित किया. उनकी स्वच्छ छवि, प्रभावशाली व्यक्तित्व और आम लोगों से जुड़ाव ने मतदाताओं को आकर्षित किया. किसान आंदोलन के कारण आई राजनीतिक जागरूकता भी एक महत्वपूर्ण कारक रही. केंद्र सरकार द्वारा कृषि कानून वापस लेने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी तथा पहले उसकी सहयोगी रही शिरोमणि अकाली दल को किसानों के रोष का सामना करना पड़ा.

इसके अलावा, पंजाब के युवाओं का विदेशों की ओर बढ़ता पलायन तथा रोजगार के अवसरों की कमी के कारण युवा मतदाताओं ने पारंपरिक राजनीति को नकारते हुए आम आदमी पार्टी को एक अवसर देने का निर्णय लिया. सोशल मीडिया अभियान, डिजिटल रणनीति तथा महिला एवं युवा मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी के कारण चुनावी ध्रुवीकरण सीधे विकास के मुद्दों पर केंद्रित हुआ, जिसके परिणामस्वरूप आम आदमी पार्टी को लगभग 42 फीसदी मत प्राप्त हुए.

दलों को चुनाववार जनाधार 

पंजाब के चुनावों में मत प्रतिशत में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिले. भारतीय जनता पार्टी का मत प्रतिशत 2017 के 5 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 19 प्रतिशत हो गया. वहीं, शिरोमणि अकाली दल का मत प्रतिशत 25 प्रतिशत से घटकर 13 प्रतिशत पर आ गया. 2022 के विधानसभा चुनाव में 42 प्रतिशत मत प्राप्त करने वाली आम आदमी पार्टी का मत प्रतिशत 2024 में घटकर 26 प्रतिशत रह गया. दूसरी ओर, कांग्रेस का मत प्रतिशत 2022 के 23 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 26 प्रतिशत हो गया. 

2022 विधानसभा चुनाव परिणाम मंडलवार एनॉलिसिस

पटियाला, फरीदकोट और फिरोजपुर मंडलों में आम आदमी पार्टी ने लगभग एकतरफा वर्चस्व स्थापित किया. पटियाला की 35 में से 34 सीटों, फरीदकोट की सभी 12 सीटों तथा फिरोजपुर की 16 में से 14 सीटों पर पार्टी ने जीत दर्ज की. फरीदकोट मंडल में आम आदमी पार्टी को लगभग 50 प्रतिशत मत प्राप्त हुए. 

जालंधर मंडल में आम आदमी पार्टी को 34 फीसदी वोट मिले. इसी मंडल में कांग्रेस को 29 प्रतिशत मत प्राप्त हुए और उसने 16 सीटों पर विजय हासिल की. भारतीय जनता पार्टी को राज्य के अन्य मंडलों की तुलना में जालंधर में सर्वाधिक 9 फीसदी वोट मिले, जबकि सबसे कम 2 प्रतिशत मत फरीदकोट मंडल में मिले. शिरोमणि अकाली दल को सर्वाधिक 25 प्रतिशत मत फिरोजपुर मंडल में मिले, जबकि सबसे कम 14 प्रतिशत मत पटियाला मंडल में प्राप्त हुए. 

2024 लोकसभा चुनाव परिणाम का विश्लेषण

पंजाब में 2024 के लोकसभा चुनाव में विधानसभा क्षेत्रवार बढ़त के आधार पर कांग्रेस 45 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही. आम आदमी पार्टी 41 विधानसभा क्षेत्रों में, भारतीय जनता पार्टी 10 विधानसभा क्षेत्रों में तथा शिरोमणि अकाली दल 6 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त पर रहा. इसके अतिरिक्त अन्य दलों एवं निर्दलीय उम्मीदवारों ने 15 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की. 2024 के लोकसभा चुनाव में मालवा, माझा और दोआबा इन तीनों क्षेत्रों में अलग-अलग राजनीतिक रुझान देखने को मिले. कांग्रेस ने 7 लोकसभा सीटें जीतीं, जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत से सत्ता में आई आम आदमी पार्टी को केवल 3 सीटों से संतोष करना पड़ा. 

कानून-व्यवस्था, किसानों से जुड़े मुद्दों तथा नशे की समस्या को लेकर राज्य सरकार के विरुद्ध जनभावना दिखाई दी. भारतीय जनता पार्टी एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी, लेकिन शहरी हिंदू मतदाताओं के समर्थन के कारण उसे 19 प्रतिशत मत प्राप्त हुए, जो अब तक का उसका सर्वाधिक मत प्रतिशत है. शिरोमणि अकाली दल को केवल बठिंडा लोकसभा सीट पर विजय मिली, जबकि 2 लोकसभा सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार विजयी रहे. 

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‘आप’ का उदय और सत्ता की परीक्षा 

2022 में भ्रष्टाचार-विरोधी छवि, पारंपरिक दलों के प्रति नाराजगी और बदलाव की उम्मीद के कारण आम आदमी पार्टी को बड़ा जनादेश मिला. मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व में पंजाब में ‘केजरीवाल मॉडल’ का प्रभाव दिखाई दिया. मुफ्त बिजली, ‘आम आदमी क्लिनिक’, स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में सुधार, भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान तथा सरकारी भर्तियों के चलते मतदाताओं ने सरकार को समर्थन दिया. 

स्थानीय चुनावों में भी AAP का जलवा पर कई चुनौतियां भी 

हाल ही में स्थानीय चुनावों में 958 सीटें जीतकर आम आदमी पार्टी ने अपनी संगठनात्मक ताकत भी साबित की है. सत्ता के चौथे वर्ष में प्रवेश करते हुए सरकार के सामने कई सवाल खड़े हैं. ड्रग्स का बढ़ता संकट, बेरोजगारी, गैंगवार, आर्थिक घाटा और बढ़ता कर्ज जैसे मुद्दे विपक्ष लगातार उठा रहा है. इसलिए 2027 में आम आदमी पार्टी को विकास के दावों के साथ अपने प्रदर्शन का भी जवाब देना होगा. 

बेअदबी कानून पड़ सकता है भारी ? 

मुख्यमंत्री भगवंत मान से जुड़े कथित आपत्तिजनक वीडियो को लेकर कुछ समय राजनीतिक विवाद जरूर हुआ था, लेकिन वर्तमान में यह मुद्दा जनता या राज्य की राजनीति पर अधिक प्रभाव डालता नहीं दिख रहा है. सरकार ने अकाल तख्त को विश्वास में लिए बिना कानून बनाने के कारण ग्रामीण और पंथक सिख मतदाताओं में नाराज़गी देखी जा रही है. अकाल तख्त और पंजाब सरकार के बीच बेअदबी विरोधी कानून को लेकर राज्य के राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं. इसका ‘आप’ को कुछ हद तक नुकसान होने की संभावना दिखाई देती है. 

कांग्रेस के सामने गुटबाजी की चुनौती 

2017 में 77 सीटों के साथ सत्ता में आई कांग्रेस का 2022 में केवल 18 सीटों पर सिमट जाना पार्टी के लिए बड़ा झटका था. कैप्टन अमरिंदर सिंह, नवजोत सिद्धू और अन्य नेताओं के बीच आंतरिक संघर्ष ने पार्टी को भारी राजनीतिक नुकसान पहुंचाया. हालांकि आज कांग्रेस फिर से मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरती दिख रही है. 2022 की हार के बावजूद कांग्रेस पंजाब में प्रमुख विपक्ष के रूप में बनी हुई है. राज्य के कई क्षेत्रों में उसका पारंपरिक वोट बैंक अभी भी मौजूद है. 

लोकसभा चुनावों में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन और राज्य में सरकार-विरोधी माहौल कांग्रेस के लिए सकारात्मक संकेत हैं. स्थानीय निकाय चुनावों में दूसरे स्थान पर रहकर पार्टी ने अपनी संगठनात्मक क्षमता भी प्रदर्शित की है. प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा, पूर्व मुख्यमंत्री और चुनाव अभियान समिति अध्यक्ष चरणजीत सिंह चन्नी और पूर्व मंत्री एवं चुनाव प्रबंधन समन्वय समिति के अध्यक्ष विजय इंदर सिंगला, घोषणापत्र समिति (Manifesto Committee) के अध्यक्ष डॉ. अमर सिंह जैसे प्रभावशाली नेता पार्टी में मौजूद हैं. 

कांग्रेस के लिए गुटबाजी है बड़ी चुनौती 

आगामी चुनावों में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती गुटबाजी है. यदि पार्टी आंतरिक मतभेदों को नियंत्रित कर एकजुट नेतृत्व प्रस्तुत कर पाती है, तो 2027 में वह सत्ता की मजबूत दावेदार बन सकती है. पंजाब कांग्रेस में नई नियुक्तियों के बाद चन्नी और रंधावा नाराज हैं. चन्नी प्रदेश अध्यक्ष पद के इच्छुक थे, लेकिन हाईकमान ने राजा वडिंग को बरकरार रखते हुए उन्हें केवल प्रचार समिति का अध्यक्ष पद दिया. इसी कारण चन्नी ने अपने समर्थकों की बैठक बुलाकर शक्ति प्रदर्शन किया. रंधावा ने भी अवसर न मिलने पर नाराजगी जताई है और इन घटनाक्रमों के कारण कांग्रेस को नुकसान होने की संभावना है.

भाजपा की स्वतंत्र राजनीतिक यात्रा 

पंजाब में भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक यात्रा लंबे समय तक शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन में रही, लेकिन 2020 के बाद गठबंधन टूटने के बाद पार्टी ने स्वतंत्र विस्तार की रणनीति अपनाई. 2024 के लोकसभा चुनाव में मत प्रतिशत बढ़ाकर भाजपा ने अपनी ताकत का संकेत दिया. केवल सिंह ढिल्लों की प्रदेश अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति, सुनील जाखड़, रवनीत बिट्टू और अन्य प्रभावशाली नेताओं की सक्रियता के जरिए पार्टी सिख मतदाताओं तक पहुंचने का प्रयास कर रही है. पार्टी ने स्पष्ट रूप से 2027 का विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने का निर्णय लिया है. 

ये है बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती 

किसान आंदोलन का प्रभाव और ग्रामीण पंजाब में सीमित पकड़ भाजपा के लिए बड़ी चुनौती हैं. हालांकि शहरी क्षेत्रों में बढ़ता समर्थन और संगठनात्मक विस्तार के कारण पार्टी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. हाल ही में पश्चिम बंगाल में पार्टी के प्रदर्शन से उसका आत्मविश्वास बढ़ा है और माना जा रहा है कि इस राज्य के चुनाव में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह व्यक्तिगत रूप से रणनीति पर ध्यान देंगे. 

दल बदल की रणनीति 

पंजाब की राजनीति में सीमित प्रभाव रखने वाली भाजपा ने आगामी विधानसभा चुनावों से पहले अपनी ताकत बढ़ाने के लिए दलबदल की बड़ी रणनीति अपनाई है. पिछले कुछ समय में आम आदमी पार्टी के 7 में से 6 राज्यसभा सांसदों ने भाजपा में ज्वॉइन कर लिया है. पंजाब में ऐतिहासिक रूप से भाजपा केवल शहरी हिंदू मतदाताओं तक सीमित रही है, लेकिन राघव चड्ढा, अमरिंदर सिंह और शिरोमणि अकाली दल के नेताओं के कारण अब पार्टी को ग्रामीण और सिख मतदाताओं तक पहुंच बनाने के लिए बड़े चेहरे मिलते दिख रहे हैं. 

शिरोमणि अकाली दल: अस्तित्व बचाने की लड़ाई 

एक समय पंजाब की राजनीति में लंबे समय तक प्रभाव रखने वाला शिरोमणि अकाली दल आज संगठनात्मक रूप से सीमित प्रभाव वाला दिखाई देता है. प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में पार्टी ने कई दशकों तक राज्य की राजनीति पर प्रभावी शासन किया. किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि में भाजपा से गठबंधन तोड़ना, परिवारवाद के आरोप, नए नेतृत्व की कमी और युवा मतदाताओं से बढ़ती दूरी के कारण पार्टी का पतन शुरू हुआ.

2022 में केवल 3 सीटों तक सीमित रह गई यह पार्टी आज भी अपने पारंपरिक जनाधार को फिर से पाने के लिए संघर्ष कर रही है. भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद पार्टी को स्वतंत्र राजनीतिक दिशा तलाशनी पड़ी. सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं और पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता भी इससे दूर हो गए हैं. स्थानीय निकाय चुनावों में भी पार्टी अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकी. अकाली दल के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिख राजनीति में अपने पारंपरिक स्थान को बनाए रखना है. यदि पार्टी संगठनात्मक पुनर्गठन नहीं करती है, तो पंजाब की राजनीति में उसका महत्व और कम होने की संभावना है. 

अमृतपाल सिंह और नए राजनीतिक संकेत 

पंजाब की राजनीति में अमृतपाल सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल में रहने के बावजूद 2024 में सांसद के रूप में निर्वाचित हुए. दीप सिद्धू के निधन के बाद 'वारिस पंजाब दे' संगठन की कमान संभालते हुए अमृतपाल ने इसे अधिक धार्मिक-राजनीतिक स्वरूप दिया. यह संगठन आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी करता दिखाई दे रहा है, जिससे शिरोमणि अकाली दल के वोट बैंक में विभाजन की संभावना बढ़ सकती है. 

राज्य का अनुमानित जातीय समीकरण 

पंजाब के अनुमानित जातीय समीकरण के अनुसार, अनुसूचित जाति (SC) के मतदाताओं की संख्या लगभग 32 प्रतिशत है. इसके बाद अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के मतदाता लगभग 31 प्रतिशत हैं. जाट सिख मतदाता लगभग 19 प्रतिशत हैं, जबकि उच्च वर्ग (General) जिसमें खत्री, अरोड़ा, ब्राह्मण, राजपूत और बनिया समुदाय शामिल हैं, उनका संयुक्त प्रतिशत लगभग 13 प्रतिशत है. मुस्लिम, ईसाई और अन्य समुदायों का प्रतिशत लगभग 3 प्रतिशत है, जबकि अनुसूचित जनजाति (ST) मतदाताओं का अनुपात लगभग 2 प्रतिशत है. जाट सिख को राजनीतिक रूप से सबसे प्रभावशाली वर्ग माना जाता है.

अधिकांश मुख्यमंत्री और प्रमुख दलों का नेतृत्व इसी समुदाय से आया है. विशेष रूप से पंजाब में अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 32 प्रतिशत है, जो देश के किसी भी राज्य से अधिक है. इसलिए दलित मतदाता किसी भी चुनाव में परिणाम को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकते हैं. हिंदू मतदाता मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों में प्रभावशाली हैं और वे भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस तथा आंशिक रूप से आम आदमी पार्टी के बीच विभाजित हैं.

भौगोलिक क्षेत्रवार राजनीतिक समीकरण 

पंजाब की राजनीति को तीन प्रमुख भौगोलिक क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है. पंजाब की राजनीति मालवा, माझा और दोआबा इन तीन प्रमुख भौगोलिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में बंटी हुई है. 

मालवा

यह पंजाब का सबसे बड़ा राजनीतिक क्षेत्र है. कहा जाता है कि जिसने मालवा जीता, उसने पंजाब जीता, क्योंकि यहां की 69 सीटें बहुमत के आंकड़े को आसानी से पार करा देती हैं. ऐतिहासिक रूप से यह क्षेत्र शिरोमणि अकाली दल और कैप्टन अमरिंदर सिंह के कारण कांग्रेस का गढ़ माना जाता था. लेकिन 2022 के चुनाव में आम आदमी पार्टी ने यहां एकतरफा बढ़त हासिल करते हुए 69 में से 66 सीटें जीत लीं. मुख्यमंत्री भगवंत मान स्वयं मालवा (संगरूर) क्षेत्र से आते हैं. किसान आंदोलन का सबसे अधिक प्रभाव भी इसी क्षेत्र में देखा गया है. इसी कारण यहां भाजपा को आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों के विरोध का सामना करना पड़ता है. यहां किसान, जाट सिख और ग्रामीण मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. 

माझा

रावी और ब्यास नदियों के बीच स्थित यह क्षेत्र माझा कहलाता है. अमृतसर का स्वर्ण मंदिर इसी क्षेत्र में स्थित होने के कारण सिख राजनीति पर इसका गहरा प्रभाव है. सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण यहां नशा तस्करी, ड्रोन के जरिए घुसपैठ और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे प्रमुख राजनीतिक विषय हैं. हाल के समय में भाजपा इस क्षेत्र के शहरी हिस्सों (अमृतसर, पठानकोट) में अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास कर रही है. 

दोआबा क्षेत्र 

ब्यास और सतलुज नदियों के बीच स्थित यह क्षेत्र दोआबा के नाम से जाना जाता है. पंजाब में सबसे अधिक दलित मतदाता इसी क्षेत्र में पाए जाते हैं. दलित मतदाताओं के प्रभाव के कारण यह क्षेत्र बहुजन समाज पार्टी (BSP) और कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा है. 2022 में कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी (पहले दलित मुख्यमंत्री) के चेहरे के माध्यम से इस गढ़ को बनाए रखने का प्रयास किया, लेकिन फिर भी आम आदमी पार्टी ने यहां कांग्रेस को कड़ी टक्कर दी. 

वर्तमान स्थिति में यहां कांग्रेस का प्रभाव देखा जाता है. दोआबा क्षेत्र के जालंधर और होशियारपुर इलाके में दलित मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक है. इसलिए यहां सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास जैसे मुद्दे अधिक प्रभावी होते हैं. 2027 में इन तीनों क्षेत्रों में कौन सा दल प्रभावी रहता है, इसी पर सत्ता का गणित निर्भर करेगा. 

आगामी चुनावों के प्रमुख मुद्दे 

पंजाब में किसान मुद्दे, बेरोजगारी एवं औद्योगिक निवेश, नशे की समस्या, सीमावर्ती सुरक्षा, शिक्षा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था, सिख अस्मिता और धार्मिक संस्थाओं से जुड़े मुद्दे, तथा केंद्र-राज्य संबंध आगामी विधानसभा चुनाव के प्रमुख चुनावी मुद्दे बन सकते हैं.

निष्कर्ष: पंजाब में किसी एक की लहर नहीं

अगर आज की जमीनी हकीकत को देखें, तो पंजाब में फिलहाल किसी भी एक पार्टी की एकतरफा जीत या लहर दिखाई नहीं दे रही है. मुकाबला काफी दिलचस्प मोड़ पर है. 

'आप' के पास क्या मजबूत पक्ष है?

भगवंत मान की इमेज: मुख्यमंत्री भगवंत मान की अपनी एक साफ छवि है, जो पार्टी के लिए बड़ा प्लस पॉइंट है.

महिलाओं का तगड़ा सपोर्ट: 'मुख्यमंत्री मावां धियां सत्कार योजना' के जरिए सरकार 18 साल से ऊपर की पात्र महिलाओं को 1,000 और अनुसूचित जाति (SC) की महिलाओं को 1,500 रुपए महीना दे रही है. माना जा रहा है कि इस स्कीम की वजह से महिलाओं का भारी समर्थन 'आप' को मिल सकता है.

दिल्ली मॉडल और काम: इसके अलावा राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाएं, उनके विकास कार्य और अरविंद केजरीवाल का विकास मॉडल व उनका प्रभाव भी पार्टी के पक्ष में माहौल बना रहा है.

तो क्या कांग्रेस भी मार सकती है बाजी?

अगर अंदरूनी कलह खत्म हुई तो: कांग्रेस के लिए भी पूरी गुंजाइश है, लेकिन शर्त एक ही है- उन्हें अपने आंतरिक मतभेद और गुटबाजी को दूर करना होगा.

एंटी-इन्कंबेंसी का फायदा: अगर कांग्रेस एकजुट होकर चुनाव लड़ती है, तो वह वर्तमान सरकार के खिलाफ पनप रहे सत्ता-विरोधी लहर का पूरा फायदा उठा सकती है. उनके पास मजबूत संगठन, अनुभवी नेतृत्व और जिताऊ उम्मीदवार भी हैं, जो उन्हें जीत की दहलीज तक ले जा सकते हैं.

भाजपा और अकाली दल कर सकते खेल ?

अकेले लड़ने से नुकसान: एक समय था जब बीजेपी और अकाली दल का गठबंधन दोनों को मजबूत रखता था. शहरी इलाकों में बीजेपी का असर था और अकाली दल का सिख व धार्मिक मतदाताओं पर, लेकिन आज ये दोनों अलग-अलग लड़ रहे हैं, जिससे वोटों का बिखराव हो रहा है और इसका सीधा नुकसान इन दोनों ही पार्टियों को उठाना पड़ रहा है.

गठबंधन हुआ तो बदलेगा गेम: इसीलिए, अगर भविष्य में बीजेपी और अकाली दल दोबारा एक साथ आ जाते हैं (यानी उनका गठबंधन फिर से होता है), तो पंजाब का यह मुकाबला सीधे 'त्रिकोणीय' (Three-way fight) हो जाएगा. अगर ऐसा हुआ, तो चुनाव के नतीजे पूरी तरह से बदल सकते हैं. 

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