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जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा दिल्ली हाई कोर्ट की एक ऐसी सशक्त न्यायाधीश हैं, जो अपने कड़े फैसलों और विद्वत्ता के लिए जानी जाती हैं. दिल्ली शराब नीति मामले में अरविंद केजरीवाल की याचिका पर उनके हालिया 'कैच-22' वाले पलटवार ने उन्हें राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया है. दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलतराम कॉलेज से 'बेस्ट ऑलराउंडर स्टूडेंट' के रूप में स्नातक करने वाली जस्टिस शर्मा ने मात्र 24 साल की उम्र में मजिस्ट्रेट बनकर अपने न्यायिक सफर की शुरुआत की. उनकी काबिलियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह महज 35 वर्ष की आयु में सेशन जज बन गई थीं. उन्होंने कानून में पीएचडी (PhD) की है, जिसमें उनकी रिसर्च वैश्विक न्यायिक प्रणालियों पर आधारित रही.

कानून की पेचीदगियों के अलावा जस्टिस शर्मा एक संवेदनशील लेखिका भी हैं. उन्होंने अब तक 5 किताबें लिखी हैं, जिनमें 'बियॉन्ड बागबान' (बुजुर्गों के अधिकार) और 'डोंट ब्रेक आफ्टर ब्रेकअप' (महिलाओं के लिए संबल) जैसी चर्चित कृतियां शामिल हैं. वे अपनी लेखनी के माध्यम से सामाजिक और भावनात्मक मुद्दों को उठाने के लिए जानी जाती हैं. मार्च 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट की स्थाई जज बनने से पहले उन्होंने सीबीआई (CBI) की विशेष अदालत और राउज एवेन्यू कोर्ट में प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया. हालिया विवादों पर उनका रुख स्पष्ट रहा है- "न्याय धारणाओं से नहीं, संविधान की शपथ से चलता है."

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