
भारतीय राजनीति में ममता बनर्जी मात्र एक नाम नहीं, बल्कि कड़े संघर्ष और अदम्य इच्छाशक्ति का प्रतीक हैं. नीले बॉर्डर वाली सफेद सूती साड़ी और हवाई चप्पल पहनने वाली 'दीदी' आज विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा हैं. 2024 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने बंगाल में जिस तरह बीजेपी की लहर को रोककर अपनी पकड़ साबित की, उसने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है. ममता बनर्जी को राजनीति विरासत में नहीं मिली. एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में 5 जनवरी 1955 को पश्चिम बंगाल के कोलकाता में जन्मीं ममता ने 17 साल की उम्र में पिता को खोने के बाद परिवार पालने के लिए मिल्क बूथ पर काम किया. अभावों ने उन्हें वह तेवर दिए जिसने उन्हें 'स्ट्रीट फाइटर' बना दिया. 1975 में जयप्रकाश नारायण की कार के बोनट पर चढ़ना हो या 1990 में सिर पर लोहे की रॉड का हमला झेलना, ममता ने कभी झुकना नहीं सीखा. 1993 में जब पुलिस ने उन्हें सचिवालय (राइटर्स बिल्डिंग) से घसीटकर बाहर निकाला, तो उन्होंने कसम खाई थी कि अब मुख्यमंत्री बनकर ही लौटेंगी. 1998 में कांग्रेस से अलग होकर 'तृणमूल कांग्रेस' बनाई और सिंगूर-नंदीग्राम आंदोलनों के जरिए 'मां, माटी, मानुष' का नारा दिया. 2011 में उन्होंने बंगाल में वामपंथ के 34 साल पुराने किले को ध्वस्त कर इतिहास रच दिया. 15 साल से मुख्यमंत्री रहने के बावजूद ममता आज भी कालीघाट के अपने पुश्तैनी घर में रहती हैं. हालांकि राहुल गांधी के साथ उनके रिश्तों में अक्सर उतार-चढ़ाव देखे गए हैं, लेकिन इंडिया गठबंधन (INDIA Alliance) में उनकी भूमिका निर्णायक रही है. उनका लक्ष्य स्पष्ट है- अपने क्षेत्रीय दुर्ग को बचाते हुए राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के विजय रथ को रोकना.
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