सोनम वांगचुक लद्दाख के एक इंजीनियर, नवाचारक (Innovator) और शिक्षा सुधारक हैं. वे दुनिया की समस्याओं को सुलझाने के लिए पारंपरिक ज्ञान को मौलिक विज्ञान के साथ जोड़ने के लिए पहचाने जाते हैं.  1966 में जन्मे सोनम वांगचुक का पालन-पोषण हिमालय के एक सुदूर गांव में हुआ, जहां स्कूल और संसाधनों की कमी थी. इन्हीं शुरुआती चुनौतियों ने व्यावहारिक और समुदाय-संचालित समाधान तैयार करने के उनके जीवनभर के मिशन को आकार दिया. वे 'आइस स्तूप' के आविष्कार के लिए जाने जाते हैं. यह एक कृत्रिम ग्लेशियर (Unreal Glacier) है जो बर्फ के शंकु के रूप में सर्दियों के पानी को स्टोर करता है और शुष्क वसंत के महीनों में किसानों के लिए इसे धीरे-धीरे छोड़ता है. 

इंजीनियरिंग से इतर, उन्होंने 1988 में 'स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख' (SECMOL) की स्थापना की. यह वैकल्पिक स्कूल चलाता है जो केवल रटने की विद्या के बजाय व्यावहारिक/अस्तित्वगत शिक्षा (Existential Learning), स्थिरता और प्रासंगिकता पर ध्यान केंद्रित करता है. पर्यावरण और सामाजिक सक्रियता: हाल के वर्षों में वे हिमालय में पर्यावरण संरक्षण के मुखर समर्थक रहे हैं. वे सतत विकास पर जोर देते हैं और लद्दाख के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं. अपने जमीनी नवाचारों और सक्रियता के कारण वे भारत और दुनिया भर में एक प्रमुख आवाज बने हैं. उन्हें 2018 में मैग्सेसे पुरस्कार (जिसे अक्सर एशिया का नोबेल पुरस्कार कहा जाता है) सहित कई सम्मान प्राप्त हुए हैं. 

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