बांकीपुर उपचुनाव में बड़ा राजनीतिक उलटफेर देखने को मिला है. भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने नामांकन दाखिल करने के ठीक अगले दिन अपने घोषित उम्मीदवार अभिषेक कुमार बंटी का टिकट वापस ले लिया है. चुनाव से ऐन पहले और नामांकन के मात्र 24 घंटे के भीतर उम्मीदवार बदलने की यह घटना बेहद दुर्लभ और आश्चर्यजनक मानी जा रही है. बीजेपी जैसी अनुशासित पार्टी, जहां उम्मीदवारों का चयन जिला, प्रदेश और केंद्रीय चुनाव समिति की लंबी स्क्रूटनी के बाद होता है, वहां इस तरह का फैसला आना किसी बड़े सियासी संकट का इशारा करता है. हालांकि, अभिषेक कुमार बंटी ने चुनाव न लड़ने और नाम वापस लेने के पीछे पारिवारिक कारणों का हवाला दिया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसके पीछे की गंभीर वजहों को लेकर कयासों का बाजार गर्म है.
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क्या सच में पारिवारिक कारण है या कोई गंभीर मजबूरी?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अमूमन कोई भी नेता इतनी आसानी से मिला हुआ टिकट वापस नहीं करता, खासकर तब जब वह सीट बांकीपुर जैसी हो, जिसे बीजेपी का मजबूत गढ़ माना जाता है. नेताओं का एकमात्र लक्ष्य टिकट पाना होता है और बांकीपुर से बीजेपी का टिकट मिलना किसी लॉटरी लगने जैसा है, जहां 50 से अधिक बड़े चेहरे कतार में खड़े थे.
ऐसे में दो बार के मंडल अध्यक्ष रहे और पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता अभिषेक कुमार बंटी द्वारा 'पारिवारिक कारण' बताकर नाम वापस लेना गले से उतरने वाली बात नहीं लगती. चर्चाएं हैं कि इस फैसले के पीछे कोई बेहद गंभीर पारिवारिक पृष्ठभूमि या ऐसा मुद्दा हो सकता है, जिसकी भनक विपक्ष को लग गई थी.
प्रशांत किशोर का डर और बीजेपी की आनन-फानन में तैयारी
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर (PK) की एंट्री को भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है. प्रशांत किशोर ने पहले ही 5 जुलाई को बांकीपुर सीट से चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया था. जानकारों का कहना है कि अगर उम्मीदवार के बैकग्राउंड में कोई भी कमजोर कड़ी या दाग होता, तो प्रशांत किशोर उसे चुनावी मुद्दा बनाने में कसर नहीं छोड़ते.
बीजेपी नेतृत्व को शायद यह आभास हो गया था कि इस कमजोर कड़ी पर अगर हमला हुआ, तो लेने के देने पड़ सकते हैं. यही वजह है कि 9 जुलाई को अभिषेक बंटी के नामांकन के बाद अगले 24 घंटों में केंद्रीय चुनाव समिति ने तुरंत फैसला बदला और नए चेहरे के नाम की घोषणा कर दी.
नीरज कुमार सिन्हा पर बीजेपी ने लगाया दांव
अभिषेक कुमार बंटी का नाम हटने के तुरंत बाद बीजेपी ने नीरज कुमार सिन्हा को अपना नया उम्मीदवार घोषित कर दिया है. नीरज सिन्हा का परिवार जनसंघ के जमाने से जुड़ा रहा है और वे खुद भी पार्टी के काफी पुराने कार्यकर्ता हैं. वर्ष 1994 में जन्मे नीरज कुमार सिन्हा की उम्र करीब 32-33 साल है और बीजेपी ने उन पर एक युवा चेहरे के तौर पर दांव खेला है. बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में कायस्थ जाति के मतदाताओं का बाहुल्य है और नीरज सिन्हा इसी समाज से आते हैं. यह सीट बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का गृह क्षेत्र रही है, जिससे यह चुनाव बेहद हाई-प्रोफाइल हो चुका है.
मुद्दों से ज्यादा साख की लड़ाई बना बांकीपुर उपचुनाव
बांकीपुर का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां बीजेपी का उम्मीदवार हमेशा प्रतिद्वंद्वी से दोगुने वोटों के अंतर से जीत दर्ज करता आया है. ऐसे में प्रशांत किशोर यहां स्थानीय मुद्दों के बजाय सीधे बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर निशाना साध रहे हैं. वे इस पूरे चुनाव को 'प्रशांत किशोर बनाम सम्राट चौधरी' के मुकाबले में तब्दील करना चाहते हैं. यह चुनाव प्रशांत किशोर और सम्राट चौधरी दोनों के नेतृत्व के लिए पहली बड़ी परीक्षा है, क्योंकि प्रशांत किशोर भी पहली बार खुद चुनावी मैदान में उतर रहे हैं.
बीजेपी के लिए कितना फायदेमंद या नुकसानदेह?
नामांकन के ठीक पहले इस तरह से उम्मीदवार बदलने की प्रक्रिया से बीजेपी को शुरुआती स्तर पर कुछ नुकसान उठाना पड़ सकता है, क्योंकि अभिषेक बंटी ने नामांकन के बाद अपना चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया था. अब नए उम्मीदवार नीरज सिन्हा को नए सिरे से कमान संभालनी होगी.
दूसरी तरफ, बीजेपी के इस कदम से प्रशांत किशोर को बैठे-बिठाए उम्मीदवार बदलने को लेकर एक बड़ा चुनावी मुद्दा मिल गया है, जिसे वे प्रचार में जरूर भुनाएंगे. हालांकि, 13 तारीख को होने वाले नामांकन और 17 तारीख को स्क्रूटनी व नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही बांकीपुर का असली सियासी मुकाबला खुलकर सामने आएगा.
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