टेलीविजन का 90 का दौर...हर घर में गूंजती थी एक ही आवाज...'मजेदार-लजीजदार...कर्रम कुर्रम, लिज्जत पापड़.' हर घर की थाली तक पहुंचने लगा था ये मसालेदार पापड़ जो कई बार बेस्वाद खाने में भी स्वाद का तड़का लगा देता था. पापड़ के पैकेट पर एक खूबसूरत मासूम का इलस्ट्रेशन था जो आज भी है. इस स्वाद के पीछे की कहानी भी बहुत रोचक और इंस्पायरिंग हैं. अब सवाल ये है कि अचानक लिज्जत पापड़ की चर्चा क्यों होने लगी ?
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दरअसल NCERT की नौवीं कक्षा के लिए नई पुस्तक "Understanding Society: India and Beyond" में 'लिज्जत पापड़' की सफलता की कहानी को एक बिज़नेस केस स्टडी के रूप में लिया गया जिसे छात्र अब पढ़ेंगे.
ये कहानी तब शुरू होती है जब देश को आजादी मिले 11 साल हुए थे. दक्षिण मुंबई (तब बॉम्बे) के एक घनी आबादी वाला इलाका गिरगांव. पुरानी रिहायशी इमारतों में महिलाएं रोजमर्रा के काम व्यस्त थीं. मार्च का महीना था. सूरज आसमान में चढ़ने लगा था. चिलचिलाती धूप और गर्मी के बीच एक इमारत में 7 गुजराती महिलाओं के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था. घर की चारदीवारी में रहकर ही कुछ ऐसा करना चाहती थी जो न केवल उनके परिवार का जीवन स्तर बदले बल्कि उन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत बना दे. उन्होंने अपने रोजमर्रा के हुनर को ही ऐसा तराशा कि वही उनकी अलग पहचान बन गई. उनकी प्रसिद्धि और प्रॉडक्ट ने देश की सीमाएं भी लांघ दी.
15 मार्च 1959 को लिज्जत पापड़ की शुरूआत हुई. आपको बता दें कि शुरूआत में इसका नाम लिज्जत नहीं था. हम आपको कहानी में आगे बताएंगे कि पापड़ का नाम लिज्जत कैसे पड़ा और इसके पैकेट पर एक प्यारे बच्चे की तस्वीर और खरगोश की क्या है कहनी ?
80 रुपए का कर्ज और 4 पैकेट का प्रोडक्शन
गुजरात की 7 महिलाओं का एक समूह- जसवंतीबेन जमनादास पोपट, पारवतीबेन रामदास थोडानी, उजमबेन नरगसदास कुंडलिया, बानूबेन नानाजी तन्ना, लागुबेन अमृतलाल गोकानी, जयाबेन विठ्ठलानी और दीवालीबेन लाखाणी आर्थिक समस्याओं से जूझ रही थीं. इन सभी की उम्र 20 से 30 साल के बीच थी. सभी मध्यवर्गीय परिवारों से आती थीं और बेहद कम पढ़ी-लिखी थीं.
इन्होंने आपस में चर्चा की. सोचा कि कुछ ऐसा किया जाए जिससे घर से बाहर जाकर काम न करना पड़े और घर से ही काम करके पैसे कमाए जा सकें. बातचीत में एक बात पर सबकी सहमति बनी- वो था पापड़. हर घर की थाली में हल्की-फुल्की मजेदार और मसालेदार...कुकुरा पापड़ जिससे कमोबेश सभी को प्यार था. अब टारगेट था हर घर की थाली तक एक जबरदस्त स्वाद के साथ पहुंचना ताकि लोग इस पापड़ के दीवाने हो जाएं.
तब पापड़ बनाने के लिए समान जैसे बर्तन, बेलन, चकला के लिए पैसे नहीं थे. सभी सातों महिलाएं सर्वोदय कार्यकर्ता छगनलाल करमसी पारेख यानी 'छगनबापा' के पास पहुंची. इन्होंने ब्याज पर 80 रुपए उधार लिए. इन्होंने पापड़ बनाने की एक पुरानी संस्था से बर्तन, चकले और बेलन वगैरह खरीद लिए. पापड़ की सामाग्री लेकर आईं. 4 पैकेट पापड़ तैयार हुए.
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नहीं बिके पापड़ पर हिम्मत नहीं हारीं
पहले दिन ये महिलाएं पापड़ लेकर दुकानों पर गईं पर पापड़ बिके नहीं. वे हिम्मत नहीं हारीं. वे दोबारा 'छगनबापा' के पास गईं. छगनलाल ने इस बार 80 रुपए और कर्ज दिए पर एक शर्त पर. BBC हिंदी में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक छगनलाल ने 160 रुपए के बदले 200 रुपए लेने की बात कही. महिलाएं मान गईं और फिर सामग्री लेकर पापड़ बनाने में जुट गईं. पापड़ का पैकेट लेकर एक बार फिर वो दुकानों पर गईं, लेकिन इस बार उन्होंने शर्त रख दी कि पापड़ उसी दुकानदार को देंगी जो तुरंत उसको पेमेंट कर देगा.
एक दुकानदार ने खरीद लिए पापड़
एक दुकानदार आनंदजी मणिक ने उनके पापड़ खरीद लिए. उन्होंने और भी पापड़ बनाने के लिए प्रात्साहित किया. बस क्या था...7 महिलाओं के समूह ने पापड़ बनाना शुरू किया और वो बाजार में बिकने लगा. उन्होंने पहले छगनलाल का कर्ज जो 200 रुपए था वो चुकाया और फिर पापड़ बनाकर अपना आमदनी बढ़ाने लगीं. अब तो उनके समूह में और भी महिलाएं जुड़ने लगीं. सभी को ये सातों महिलाएं सामग्री देतीं. वे घर ले जाकर पापड़ बनातीं और छत पर सूखने के बाद ले आती थीं. पापड़ों की गिनती के बाद पैकिंग होती और फिर प्रॉडक्ट बाजार में पहुंच जाता था.
अब महिलाओं का ये हौसला एक संस्था बन चुकी थी
महिलाओं के जज्बे की गूंज फैलने लगी थी. फिर एक संस्था बनीं और नाम रखा गया- 'श्री महिला गृह उद्योग'. अब पापड़ को भी को स्वाद वाला नाम देने की चर्चा ने जोर पकड़ा. फाउंडर महिलाओं ने आपस में चर्चा की. सबने कुछ नाम सुझाए पर बात बनी नहीं.
ऐसे नाम पड़ा- 'लिज्जत पापड़'
फिर एक महिला जिनका नाम धीरजबेन रूपारेल ने नाम सुझाया- 'लिज्जत' जो गुजराती शब्द है जिसका अर्थ है- जायकेदार. साल 1966 में इसे बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट और खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) के तहत रजिस्टर्ड भी कराया गया. इसके बाद इसे 'खादी और ग्रामोद्योग' से कर छूट और वित्तीय सहायता भी मिलने लगी.
बाजार में डुप्लीकेट पापड़ भी बनने लगे चुनौती
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक लिज्जत की लोकप्रियता के चलते बाजार में दूसरे पापड़ भी लिज्जत के नाम पर बेचे जाने लगे. अब चुनौती इससे बचने की थी. तब एक बच्चे 'बबला' की तस्वीर को इसके पैकेट पर जगह दी गई और साथ में था एक खरगोश जिसका नाम बन्नी थी. ये ट्रेड मार्क बना जो दूसरे पापड़ और बाजार में डुप्लीकेसी से लिज्जत को अलग करता था. बन्नी की कहानी भी रोचक है.
पापड़ की लोकप्रियता को और बढ़ाने के लिए दूरदर्शन पर एक एक कम खर्च में बने विज्ञापन को प्रसारित करने की योजना पर काम चल रहा था. ये बात थी 1970 के दशक की. तब एक्टर अप्पी उमरानी ने भारत के मशहूर कठपुतली कलाकार रामदास पाध्ये से कॉन्टैक्ट किया. रामदास ने ही कठपुतली के रूप में खरगोश बन्नी के किरदार को गढ़ा.
पहले बकवास बताया गया फिर हो गया लोकप्रिय
जब रामदास ने बन्नी वाला आडिया दिया तब लिज्जत के अधिकारियों ने कहा- क्या बकवास है. क्या खरगोश भी पापड़ खाते हैं ? हालांकि जब ऐड बनकर तैयार हुआ तो सभी को पसंद आया. कठपुतली बन्नी खरगोश का पापड़ खाने का अंदाज और उसके कुरकुरेपन को कर्रम-कुर्रम कहना और अनोखी हंसी सबको भा गया. जब ये एड टीवी पर आया तो क्या बच्चे क्या बूढ़े सबने खूब पसंद किया.
सहकारिता वाला मॉडल
यहां कोई मालिक या कर्मचारी नहीं है. संस्था से जुड़ी हर महिला को 'बहन' और सह-मालिक माना जाता है. संस्था को होने वाले मुनाफे या नुकसान की हिस्सेदार सभी बहनें बराबर होती हैं. महिलाओं को उनकी मेहनत का पैसा रोज या हफ्ते के हिसाब से दिया जाता है, जिससे उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता बनी रहती है.
क्वालिटी से कोई समझौता नहीं
दाल, मसाले और हींग हमेशा एक ही जगह (मुख्यालय) से ख़रीदे और तैयार किए जाते हैं ताकि स्वाद में कभी बदलाव न आए. हर सुबह सभी बहनें सेंटर पर आती हैं और सामग्री लेकर घा जाती हैं. सेंटर पर हर पापड़ का वजन और मोटाई जांची जाती है. खराब पापड़ रिजेक्ट कर दिए जाते हैं. अब तो महिला सदस्यों की संख्या 45,000 से भी अधिक हो गई है जो देशभर के अलग-अलग सेंटर्स से जुड़ी हैं. देश के अलग-अलग राज्यों में लिज्जत पापड़ के 83 शाखाएं और 27 डिवीजन हैं.
न केवल भारत में बल्कि अब लिज्जत पापड़ का निर्यात अमेरिका, ब्रिटेन, सिंगापुर सहित 25 से अधिक देशों में होने लगा है. पापड़ के अलावा डिटर्जेंट, साबुन, वड़ी, खाखरा और मसालों के अलावा गेहूं का आटा भी बाजार में आ गया है. अब यह कारोबार 80 रुपए के कर्ज से शुरू होकर 1,600 करोड़ रुपये से भी ज्यादा के टर्नओवर पर पहुंच चुका है.
2021 में मिल चुका है पद्मश्री
वर्ष 2021 में भारत सरकार ने लिज्जत की एकमात्र जीवित संस्थापक जसवंतीबेन पोपट को भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्म श्री' से सम्मानित किया था. 80 रुपये से 1,600 करोड़ तक का यह सफर भले ही किसी को पता हो या न हो पर रसोई में पापड़ हो तो लिज्जत ये उन्हें बखूबी पता होता है. 90 के दशक का दूरदर्शन का वो विज्ञापन भी लोगों की जुबान पर है- कर्रम कुर्रम..लिज्जत पापड़.
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