बरगी डैम हादसा: सुबह जब मां-बेटे की एक साथ लाश निकली तो चीख-चीखकर रोने वाले प्रदीप ने बताई क्रूज के सफर की असल कहानी

MP तक के रवीश पाल सिंह मौके पर पहुंचे और उन्होंने जो देखा उसकी आंखों देखी...कैसे हर लाशों को देखने दौड़ पड़ते थे प्रदीप. किसे खोज रही थीं इनकी आंखें? इंतजार तो खत्म हुआ पर ऐसा दर्दनाक कि वहां मौजूद हर कोई रो पड़ा. जिसने भी ये हृदय विदारक तस्वीर देखी उसका कलेजा मुंह को आ गया.

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गुलाबी शर्ट वाले शख्स ने बताई क्रूज डूबने की असली कहानी.

रवीशपाल सिंह

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मां और बच्चे के एक-दूसरे से चिपके हुए शव जब पानी से बाहर निकाले गए...उस पल समय जैसे थम गया था. यह तस्वीर… मैं शायद ही कभी भूल सकूं. इतने सालों की पत्रकारिता में मैंने कई हादसे देखे, कई चीखें सुनीं, कई लाशें देखीं… लेकिन इस एक दृश्य ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया. ऐसा लगा जैसे शब्द, संवेदनाएं, पेशेवर दूरी सब कुछ उस एक पल में टूट गया हो. वहां मौजूद हर शख़्स की आंखें भर आई थीं. क्या मंत्री, क्या आम आदमी, क्या मृतकों के परिजन सबकी आंखों में सिर्फ़ पानी था.

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लेकिन हुआ क्या था? 

दरअसल, गुरुवार की शाम आम दिनों की तरह ही थी. मैं रोज़ का काम ख़त्म कर रात को घर लौटने की तैयारी कर रहा था. तभी फ़ोन की घंटी बजी. स्क्रीन पर जबलपुर के संवाददाता धीरज शाह का नाम था. जैसे ही कॉल उठाई, उसकी आवाज़ में घबराहट साफ़ महसूस हो रही थी. उसने बिना भूमिका के कहा “बरगी में क्रूज़ शिप पलट गया है.”

बरगी का नाम सुनते ही मेरे दिमाग़ में खतरे की घंटी बज गई. शाम ढल रही थी, अंधेरा बढ़ रहा था और बरगी डैम के बैकवाटर में नर्मदा का गहरा, अनिश्चित पानी… मैंने तुरंत वीडियो मंगवाए. वीडियो देखते ही समझ आ गया कि यह कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि एक बड़ा हादसा है. बिना एक पल गंवाए मैं भोपाल से रात में ही घटनास्थल के लिए रवाना हो गया.

रात में जो डैम वीरान होती है वहां जिंदगी की जद्दोजहद थी

करीब रात 2 बजे मैं बरगी डैम के उस हिस्से में पहुँचा जहाँ हादसा हुआ था. जो जगह आमतौर पर शांत और वीरान रहती है, वह उस रात एक आपातकालीन ज़ोन में बदल चुकी थी. सैकड़ों सरकारी गाड़ियाँ, मंत्रियों का कारकेड, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें, और चारों तरफ़ लगी फ्लड लाइट्स. पूरा इलाक़ा जैसे जाग रहा था, लेकिन एक अजीब सा सन्नाटा भी था.

मंत्री राकेश सिंह सीएम को दे रहे थे पल-पल की खबर

उस सन्नाटे को बीच-बीच में पुलिस की सीटियां तोड़ रही थीं. एक कोने में मध्यप्रदेश के मंत्री राकेश सिंह खड़े होकर लगातार फ़ोन पर अपडेट दे रहे थे. बाद में पता चला कि वह सीधे मुख्यमंत्री से बात कर रहे थे, जो हर पल की जानकारी ले रहे थे.

रात में रेस्क्यू ऑपरेशन रुका हुआ था. अंधेरा और गहराई दोनों ही बाधा थे. लेकिन मशीनें और टीमें सुबह के अभियान की तैयारी में जुटी थीं. इसी बीच मेरी नज़र उस क्रूज़ पर पड़ी जो आधा पानी में डूबा हुआ था. सिर्फ़ उसका आगे का हिस्सा दिखाई दे रहा था. कुछ घंटे पहले तक जहाँ हँसी, संगीत और मस्ती थी, अब वहाँ लहरों के बीच मौत का सन्नाटा पसरा हुआ था. रात जैसे-तैसे बीती. हर मिनट भारी लग रहा था. सभी को सुबह का इंतज़ार था.

सुबह होते ही सेना के गोताखोरों ने संभाला मोर्चा

सुबह की पहली किरण के साथ ही सेना के गोताखोरों ने मोर्चा संभाल लिया. पहले ही घंटे में एक शव बाहर निकाला गया. फिर थोड़ी देर बाद एक और महिला का शव मिला. माहौल और भारी हो गया. इसी बीच गुलाबी शर्ट पहने एक व्यक्ति अपनी बेटी के साथ वहां पहुंचा. लाशें निकलती देख वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा. मैं उसके पास गया. उसने अपना नाम प्रदीप बताया. उसने ख़ुद को दिल्ली का रहने वाला बताया. वह अपने परिवार के साथ जबलपुर किसी रिश्तेदार के गृह प्रवेश में आया था और घूमने के लिए बरगी डैम पहुँचा था. उसने बताया सब कुछ सामान्य था. परिवार के साथ क्रूज़ में बैठे, मस्ती कर रहे थे. तभी अचानक तेज़ हवाएं चलने लगीं. शुरुआत में लोगों ने इसे रोमांच की तरह लिया, लेकिन कुछ ही मिनटों में वह रोमांच डर में बदल गया. हवाओं ने लहरों को उग्र बना दिया. डैम का बैकवॉटर समुद्र जैसा लगने लगा.

प्रदीप ने लाइफ जैकेट बांटना शुरू किया

प्रदीप ने कहा “मैंने लाइफ जैकेट बांटना शुरू ही किया था कि अचानक क्रूज़ एक तरफ़ झुक गया… और फिर बस तीन मिनट… तीन मिनट में सब खत्म हो गया.” उसकी आवाज़ कांप रही थी. उसने बताया कि उसकी पत्नी और चार साल का बेटा अभी तक लापता हैं.

हमारी बातचीत चल ही रही थी कि एक और महिला का शव बाहर निकाला गया. प्रदीप उसे देखकर रो पड़ा, लेकिन जब चेहरा साफ हुआ तो उसके चेहरे पर हल्की राहत आई क्योंकि वह उसकी पत्नी नहीं थी.

लेकिन यह राहत ज्यादा देर नहीं टिकनी थी. करीब आधे घंटे बाद गोताखोरों ने इशारा किया कि एक और शव मिला है. स्ट्रेचर लेकर टीम क्रूज़ के पास पहुंची और फिर धीरे-धीरे एक शव किनारे लाया गया. शव उल्टा था. जैसे ही उसे सीधा किया गया, वहां मौजूद हर व्यक्ति का कलेजा मुंह को आ गया.

वह एक महिला का शव था… और उसके सीने से चिपका हुआ एक छोटा बच्चा. यह दृश्य शब्दों में बयान करना मुश्किल है. प्रदीप और उसकी बेटी चीख-चीखकर रोने लगे. वह उसकी पत्नी और उसका बेटा था. उस पल वहां मौजूद हर इंसान टूट गया. पुलिस वाले, डॉक्टर, मंत्री, पत्रकार, किसी की भी आंखें सूखी नहीं थीं.

मां ने आखिरी सांस तक बच्चे को बचाने की कोशिश की

ऐसा लग रहा था जैसे उस मां ने आखिरी सांस तक अपने बच्चे को बचाने की कोशिश की हो… और जब कुछ नहीं कर पाई, तो उसे अपने सीने से लगाकर ही दुनिया से विदा हो गई. दोनों को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे मां ने अपने बेटे को गोद में सुला रखा हो… और खुद भी उसी नींद में चली गई हो. एक ऐसी नींद, जो कभी नहीं टूटेगी. मंत्री राकेश सिंह इस दृश्य को देखकर खुद को रोक नहीं पाए. वे भीड़ से अलग हट गए, लेकिन उनकी आंखों से आंसू बह निकले.

इसके बाद रेस्क्यू टीम ने और तेजी से काम शुरू किया. दोपहर करीब 2 बजे क्रूज को पूरी तरह पानी से बाहर निकाल लिया गया. लेकिन उसमें कोई और शव नहीं मिला. छह लोग अब भी लापता थे, जिनकी तलाश के लिए फिर से गहरे पानी में सर्च ऑपरेशन शुरू किया गया.

इस पूरे हादसे के पीछे कई सवाल खड़े हो गए. सबसे बड़ा सवाल कि लाइफ जैकेट्स क्यों नहीं दी गईं? अगर दी गईं, तो समय पर क्यों नहीं पहनाई गईं? और क्या मौसम की चेतावनियों के बावजूद क्रूज़ को चलने देना सही था?

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, लोगों को संभलने का मौका ही नहीं मिला. कुछ लोग घबराकर नीचे के केबिन में भागे और वहीं फंस गए. जब क्रूज़ पलटा, तो वे बाहर निकल ही नहीं सके. यह सिर्फ एक हादसा नहीं था. यह कई स्तरों पर हुई लापरवाही का परिणाम था.

करीब 14 घंटे की इस ग्राउंड रिपोर्टिंग के बाद जब मैं वापस भोपाल के लिए निकला, तो शरीर थक चुका था लेकिन मन उससे कहीं ज्यादा भारी था. पूरे रास्ते वही दृश्य बार-बार आँखों के सामने आता रहा एक माँ, अपने बच्चे को सीने से लगाए हुए. पत्रकारिता हमें सिखाती है कि भावनाओं से दूरी बनाकर रखो… लेकिन कुछ तस्वीरें ऐसी होती हैं, जो उस दूरी को तोड़ देती हैं. यह वही तस्वीर थी.

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