Datia Bypoll Election: मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर हुए उपचुनाव के मतदान के बाद अब सियासी समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं. मतदान प्रक्रिया पूरी होने के बाद MP Tak की ग्राउंड रिपोर्ट और वरिष्ठ पत्रकारों के विश्लेषण के मुताबिक, इस बार का मुकाबला बेहद रोचक और अतरंगी मोड़ पर आ खड़ा हुआ है. चुनाव परिणामों से ठीक पहले आए रुझान और आंकड़े बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दलों के लिए कई बड़े संकेत दे रहे हैं.
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1. स्टार प्रचारकों की फौज पड़ी भारी
रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी ने चुनाव प्रचार के लिए दिल्ली और भोपाल से मंत्रियों व संगठन के दिग्गजों की बड़ी फौज मैदान में उतारी थी. दो दर्जन से ज्यादा राज्य मंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों और प्रदेश के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने दतिया में डेरा डाल रखा था.
हालांकि, इस भारी-भरकम स्टार कैंपेनिंग का उल्टा असर देखने को मिला. बाहर से आए नेताओं को दतिया की भौगोलिक स्थिति और स्थानीय स्तर के कार्यकर्ताओं की सही समझ नहीं थी. बड़े नेताओं द्वारा पूरा चुनाव प्रचार 'हाईजैक' कर लिए जाने की वजह से दतिया के स्थानीय बीजेपी कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस करने लगे. नतीजा ये हुआ कि कई कार्यकर्ता जमीन पर काम करने के बजाय उदासीन होकर घरों में बैठ गए या चुनावी गतिविधियों से दूरी बना ली.
2. वोटिंग प्रतिशत में गिरावट और शहरी वोटर की बेरुखी
साल 2023 के विधानसभा चुनाव की तुलना में इस बार मतदान प्रतिशत में लगभग 8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. आमतौर पर माना जाता है कि कम वोटिंग प्रतिशत से बीजेपी को नुकसान उठाना पड़ सकता है.
विशेष रूप से दतिया के शहरी क्षेत्रों में मतदाता काफी सुस्त नजर आए. पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने के बाद उनके समर्थकों में भारी नाराजगी देखी गई. यद्यपि पार्टी नेतृत्व और खुद नरोत्तम मिश्रा ने मंच से अपील कर डैमेज कंट्रोल की कोशिश की लेकिन ग्राउंड पर कार्यकर्ताओं का उत्साह नगण्य रहा. जहां नरोत्तम मिश्रा के सामान्य कार्यक्रमों में हजारों की भीड़ जुटती थी, वहीं बड़े नेताओं के रोड शो में भी अपेक्षा से बहुत कम भीड़ देखने को मिली.
3. 'लाडली बहना' फैक्टर का क्या हुआ?
बीजेपी का सबसे मजबूत कोर वोटर मानी जाने वाली महिला मतदाताओं (आधी आबादी) की भागीदारी भी इस उपचुनाव में काफी कम रही. 'लाडली बहना' जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं के बावजूद महिला वोटरों का मतदान केंद्रों तक कम संख्या में पहुंचना पार्टी के लिए चिंता का विषय बन गया है
शहरी वोटर की बेरुखी, महिलाओं का कम मतदान और स्थानीय कार्यकर्ताओं का न्यूट्रल होना- ये तमाम समीकरण दतिया में बीजेपी के लिए चुनौती खड़ी कर रहे हैं, जिसका सीधा फायदा कांग्रेस प्रत्याशी को मिलता दिख रहा है. हालांकि, ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका अंतिम फैसला मतगणना के दिन यानी 3 तारीख को ही साफ होगा.
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