दतिया विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह 6016 वोटों से चुनाव जीत गए और इसी के साथ बीजेपी लगातार दूसरा उपचुनाव हार गई. दतिया विधानसभा उपचुनाव का नतीजा सिर्फ एक सीट का फैसला नहीं है. कांग्रेस ने लगातार दूसरी बार बीजेपी को इस सीट पर हराकर यह साफ संकेत दिया है कि दतिया की लड़ाई अब प्रदेश की बड़ी राजनीतिक बहस बन चुकी है. इस नतीजे का असर पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा की राजनीतिक भूमिका, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व और बीजेपी के संगठनात्मक फैसलों तक दिखाई देगा. कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह ने बीजेपी उम्मीदवार आशुतोष तिवारी को 6,056 वोटों से हराया. सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा के पोलिंग बूथ क्रमांक-121 पर भी बीजेपी पीछे रह गई. यहां कांग्रेस को 291 और बीजेपी को 264 वोट मिले.
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नरोत्तम मिश्रा की राजनीतिक ताकत पर सबसे बड़ा इम्तिहान
दतिया लंबे समय तक डॉ. नरोत्तम मिश्रा का अभेद्य राजनीतिक गढ़ माना जाता रहा है. लेकिन 2023 विधानसभा चुनाव में हार के बाद बीजेपी ने इस उपचुनाव में उनका टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया. ऐसे में यह चुनाव सिर्फ कांग्रेस और बीजेपी के बीच नहीं, बल्कि बीजेपी के टिकट चयन के फैसले की भी परीक्षा बन गया था.
अब हार के बाद सबसे पहला सवाल भीतरघात का उठना तय माना जा रहा है. चर्चा इस बात की होगी कि क्या डॉ. नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने पूरी ताकत से चुनाव नहीं लड़ा या फिर टिकट बदलने से संगठन की एकजुटता प्रभावित हुई. भले ही डॉ. मिश्रा ने खुलकर पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार किया हो, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इन सवालों पर चर्चा तेज होना स्वाभाविक है.
साथ ही बीजेपी के उस फैसले पर भी सवाल उठेंगे, जिसमें उसने अपने सबसे मजबूत स्थानीय चेहरे की जगह नया उम्मीदवार मैदान में उतारा. राजनीतिक विश्लेषक रिजवान अहमद सिद्दीकी का मानना है कि टिकट बदलना हार की एक बड़ी वजह रहा, वहीं बीजेपी ने अपने सबसे मजबूत स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा नहीं जताकर रणनीतिक गलती भी की.
मोहन यादव सरकार के लिए दूसरा बड़ा झटका!
दतिया उपचुनाव को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व की बड़ी चुनावी परीक्षा माना जा रहा था. इससे पहले बीजेपी श्योपुर उपचुनाव भी हार चुकी है. ऐसे में सत्ता में रहते हुए लगातार दो उपचुनाव हारना बीजेपी के लिए राजनीतिक रूप से असहज स्थिति पैदा करता है. विपक्ष अब इन नतीजों को सरकार के खिलाफ जनमत के रूप में पेश करने की कोशिश करेगा. कांग्रेस के लिए यह जीत आगामी चुनावों से पहले कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने वाली है, जबकि बीजेपी को यह जवाब देना होगा कि क्या लगातार उपचुनावों में मिली हार केवल स्थानीय कारणों का परिणाम है या फिर प्रदेश में सरकार के खिलाफ माहौल बनने की शुरुआती आहट.
2028 की सियासत की झलक?
दतिया का परिणाम यह भी संकेत देता है कि 2028 विधानसभा चुनाव से पहले उम्मीदवार चयन, स्थानीय नेतृत्व और संगठनात्मक एकजुटता बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है. वहीं कांग्रेस इस जीत को सत्ता के खिलाफ बढ़ते जनसमर्थन के तौर पर पेश करेगी.
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