Meenakshi Natarajan News: मध्य प्रदेश की राजनीति में जून के महीने में हुए राज्यसभा चुनाव को लेकर एक बार फिर बड़ा सियासी तूफान खड़ा हो गया है. चुनाव के दौरान कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र रद्द किए जाने के फैसले के खिलाफ दायर चुनाव याचिका पर जबलपुर हाईकोर्ट ने सुनवाई की है. हाईकोर्ट की एकल पीठ ने निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए गए भारतीय जनता पार्टी के तीनों राज्यसभा सदस्यों को नोटिस जारी कर दिया है.
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न्यायमूर्ति बीपी शर्मा की पीठ ने की शुरुआती सुनवाई
जबलपुर हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति बीपी शर्मा की एकल पीठ ने मंगलवार को इस चुनाव याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई की. मीनाक्षी नटराजन की ओर से वरिष्ठ वकील अजय गुप्ता और वकील आर्यन गुप्ता ने अदालत में अपना पक्ष रखा. याचिका में दलील दी गई कि निर्वाचन अधिकारी द्वारा नटराजन का नामांकन अनुचित और गलत आधार पर निरस्त किया गया था. याचिका में बीजेपी सांसद महेश केवट के निर्वाचन को निरस्त करने की मांग की गई है.
बीजेपी के तीनों नवनिर्वाचित सांसदों को जारी हुआ नोटिस
कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए निर्विरोध चुने गए बीजेपी के तीनों सांसदों महेश केवट, तरुण चुग और रजनीश अग्रवाल को नोटिस जारी किया है. हालांकि याचिका में मुख्य चुनौती महेश केवट के निर्वाचन को दी गई है, लेकिन तरुण चुग और रजनीश अग्रवाल को भी नोटिस इसलिए दिया गया है क्योंकि अंतिम फैसले का असर पूरे चुनाव परिणाम पर पड़ सकता है. इस मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर के आसपास होने की संभावना जताई जा रही है.
क्या था पूरा नामांकन विवाद?
जून में मध्य प्रदेश की तीन राज्यसभा सीटों पर चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई थी, जिनमें से दो सीटों पर बीजेपी की जीत तय मानी जा रही थी और तीसरी सीट पूर्व सांसद दिग्विजय सिंह का कार्यकाल खत्म होने के बाद खाली हुई थी. कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन को मैदान में उतारा, जिसके जवाब में बीजेपी ने महेश केवट को खड़ा कर मुकाबला दिलचस्प बना दिया था. चुनाव प्रक्रिया के दौरान बीजेपी की ओर से तेलंगाना के एक मामले की जानकारी फॉर्म में न छुपाने का आरोप लगाते हुए आपत्ति दर्ज कराई गई थी, जिसके बाद निर्वाचन आयोग ने मीनाक्षी नटराजन का पर्चा खारिज कर दिया था.
कानूनी आधार और आंकड़ों का गणित
नामांकन रद्द होने के बाद वोटिंग की नौबत ही नहीं आई और बीजेपी के तीनों प्रत्याशी निर्विरोध चुन लिए गए. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 100(1) के तहत यदि किसी प्रत्याशी का नामांकन गलत तरीके से खारिज होता है, तो चुनाव को शून्य घोषित करने का कानूनी प्रावधान है. आंकड़ों की बात करें तो विधानसभा के 228 विधायकों ने प्रक्रिया में भाग लिया था, जहां एक सीट के लिए 58 वोटों की जरूरत थी. बीजेपी के 164 विधायकों में से दो प्रत्याशियों को वोट देने के बाद भी 10 वोटों की कमी पड़ रही थी, जबकि कांग्रेस के पास पर्याप्त आंकड़े मौजूद थे. अब इस मामले में हाईकोर्ट के अगले रुख पर सभी की निगाहें टिकी हैं.
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