मध्यप्रदेश की राजनीति में दतिया से कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता जाना केवल एक सीट का खाली होना नहीं है बल्कि यह आगामी राज्यसभा चुनाव का पूरा अंकगणित बदल देने वाला घटनाक्रम साबित हो सकता है. ऐसे समय में जब राज्यसभा की हर एक वोट निर्णायक होती है, कांग्रेस के लिए यह झटका दोहरी मार बनकर सामने आया है.
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अदालत का फैसला और तत्काल अयोग्यता
दरअसल, दिल्ली की एमपी-एमएलए कोर्ट ने बैंक फर्जीवाड़े से जुड़े मामले में राजेंद्र भारती को तीन साल की सजा सुनाई. इसके बाद विधानसभा सचिवालय ने सुप्रीम कोर्ट के 10 जुलाई 2013 के आदेश के पालन में संविधान के अनुच्छेद 191(1)(e) और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 के तहत उन्हें 2 अप्रैल 2026 से अयोग्य घोषित कर दिया. यानी सजा दो साल से अधिक होते ही सदस्यता खुद समाप्त हो जाती है. कांग्रेस ने इसे 'संविधान खत्म करने वाला कदम' बताया, जबकि बीजेपी इसे पूरी तरह न्यायिक प्रक्रिया के तहत लिया गया निर्णय बता रही है, लेकिन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से बाहर इस सीट के रिक्त होने का सीधा असर राज्यसभा की रणनीति पर पड़ने वाला है.
राज्यसभा चुनाव में क्यों भारी पड़ेगी यह सीट?
राज्यसभा चुनाव में विधायकों की संख्या ही असली ताकत होती है. एक-एक वोट से सीटों का समीकरण तय होता है. दतिया सीट रिक्त होने से कांग्रेस का संख्या बल घट गया है और यह उस वक्त हुआ है जब पार्टी पहले से ही दबाव में है. दरअसल, कांग्रेस के लिए स्थिति और जटिल इसलिए हो गई जब सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा को राज्यसभा चुनाव में वोट डालने से वंचित कर दिया. यानी कांग्रेस के पास न सिर्फ एक सीट कम हुई, बल्कि एक और वोट प्रभावी रूप से कम हो गया.
राज्यसभा चुनाव से पहले बदला समीकरण
मध्य प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों पर जून में चुनाव प्रस्तावित है. ऐसे समय में दतिया सीट का रिक्त होना और मुकेश मल्होत्रा का वोट न डाल पाना कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. पार्टी के पास 65 विधायक थे, लेकिन मुकेश मल्होत्रा के मतदान से बाहर होने और राजेंद्र भारती की सदस्यता जाने के बाद कांग्रेस के पास सदन में राज्यसभा चुनाव में मतदान के लिए 63 विधायक बचे हैं.
वहीं दूसरी तरफ बीना से विधायक निर्मला सप्रे भी लगातार बीजेपी के मंचों पर दिखाई देती रही हैं, जिससे सियासी अटकलें तेज हैं कि वो कांग्रेस उम्मीदवार के लिए वोट शायद ही करें. ऐसे में कांग्रेस की वास्तविक ताकत 62 विधायकों तक सिमटती दिख रही है.
मध्यप्रदेश में राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 58 विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है. इस गणित के लिहाज से कांग्रेस के पास अभी भी 4 विधायक ज्यादा हैं लेकिन यदि क्रॉस वोटिंग की स्थिति बनी तो मुकाबला कड़ा हो सकता है. वहीं भारत आदिवासी पार्टी के कमलेश्वर डोडियार कांग्रेस उम्मीदवार को ही समर्थन देंगे इसकी भी कोई गारंटी फिलहाल कांग्रेस को नहीं. ऊपर से हाल ही में हरियाणा और ओडिशा जैसे राज्यों में हुए राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग ने एमपी कांग्रेस को चिंता में डाल दिया है.
बीजेपी की रणनीति पर टिकी नजरें
230 विधायकों वाली विधानसभा में बीजेपी के पास वर्तमान में 164 विधायक हैं और वो आसानी से 2 सीटें तो जीत ही जाएगी, लेकिन तीसरी सीट के लिए भी बीजेपी अगर उम्मीदवार उतारती है तो फिर राज्यसभा का चुनाव दिलचस्प मोड़ पर पहुंच जाएगा.
संख्या बल कांग्रेस के खिलाफ
कांग्रेस इसे राजनीतिक दबाव और त्वरित कार्रवाई बताकर सहानुभूति जुटाने की कोशिश में है, लेकिन राज्यसभा की गणित भावनाओं से नहीं, संख्या से तय होती है और संख्या फिलहाल कांग्रेस के खिलाफ खड़ी दिख रही है. एक ओर विधायक की सदस्यता गई, दूसरी ओर एक और विधायक वोट नहीं डाल पाएंगे. ऐसे में आगामी राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस की स्थिति पहले से ज्यादा कमजोर नजर आ रही है.
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