सिंधिया परिवार के ₹41,000 करोड़ के संपत्ति बंटवारे में आया नया मोड़, कोर्ट में दाखिल हुई नई अर्जी ने बढ़ाया सस्पेंस!

आकांक्षा ठाकुर

19 Aug 2026 (अपडेटेड: Aug 19 2026 2:19 PM)

Sindhiya Rajgharana Sampatti Vivad: ग्वालियर के प्रसिद्ध सिंधिया राजघराने की ₹41,000 करोड़ की संपत्ति का बंटवारा अब और उलझ गया है. जहां एक तरफ समझौते की चर्चाएं थीं, वहीं अब मामले में एक नई कैविएट ने कानूनी पेंच फंसा दिया है. जानिए इस पारिवारिक विवाद में किस नए मोड़ ने कोर्ट की हलचल बढ़ा दी है.

ग्वालियर राजघराने की ₹41,000 करोड़ की संपत्ति का मामला फिर उलझा
ग्वालियर राजघराने की ₹41,000 करोड़ की संपत्ति का मामला फिर उलझा
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Scindia Property Dispute: मध्य प्रदेश का ग्वालियर सिंधिया राजघराना देश की सबसे अमीर रियासतों में से एक माना जाता है. इस परिवार के पास अरबों रुपये की चल और अचल संपत्तियां मौजूद हैं. लंबे समय से ग्वालियर जिला कोर्ट में ₹41,000 करोड़ से अधिक की अचल संपत्ति के बंटवारे को लेकर कानूनी जंग चल रही है. हाल ही में खबर आई थी कि परिवार के सदस्यों के बीच एक आपसी सहमति बन गई है. 1000 पन्नों का समझौता पत्र तैयार कर कोर्ट के सामने रखा गया था. लेकिन अब इस मामले में एक नया मोड़ आ गया है, जिससे यह पूरा विवाद एक बार फिर उलझता हुआ दिख रहा है.

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अदालत में नई कैविएट से बढ़ा सस्पेंस

पारिवारिक समझौते की खबरों के बीच अचानक कोर्ट में एक नई कैविएट दाखिल की गई है. यह कैविएट स्वर्गीय पद्मराजे सिंधिया की बेटी प्रतिमा देवी ने दायर की है. प्रतिमा देवी का विवाह नेपाल के प्रसिद्ध राणा परिवार में डॉक्टर धवल शमशेर राणा के साथ हुआ है. प्रतिमा देवी और उनकी बहन रमा राजे ने खुद को स्वर्गीय पद्मराजे सिंधिया का कानूनी उत्तराधिकारी बताया है. उन्होंने अदालत से मांग की है कि प्रस्तावित समझौते से उनके अधिकार प्रभावित हो रहे हैं. इसलिए बिना उनका पक्ष सुने कोर्ट कोई अंतिम फैसला न सुनाए.

क्या होता है कैविएट? 

कैविएट का आसान मतलब है कि किसी व्यक्ति को डर हो कि सामने वाला पक्ष कोर्ट से उसके खिलाफ कोई आदेश ले सकता है, तो वह पहले ही अदालत में कैविएट दाखिल कर देता है. इसका मकसद यह होता है कि कोर्ट कोई भी आदेश देने से पहले उसे भी अपना पक्ष रखने का मौका दे. यानी कैविएट के जरिए व्यक्ति कोर्ट से कहता है कि ''मेरे खिलाफ कोई फैसला या आदेश देने से पहले मेरी बात भी सुनी जाए.''

समझौता पत्र और जेष्ठाधिकार का तर्क

केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कोर्ट में एक पारिवारिक समझौते का आवेदन पेश किया था. इसके तहत ज्योतिरादित्य सिंधिया, उनकी बुआ वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे के बीच संपत्तियों का बंटवारा तय माना जा रहा था. इस समझौते में मुख्य रूप से यह सिद्धांत रखा गया था कि जो जहां स्थापित है, वह संपत्ति उसी के हिस्से में आएगी. सिंधिया पक्ष की ओर से परंपरा और 'जेष्ठाधिकार' को आधार बनाया जा रहा है. इसके मुताबिक परिवार का बड़ा सदस्य ही मुख्य उत्तराधिकारी माना जाता है.

78 साल पुराना 'द कॉवनेंट' बना अहम सबूत

इस पूरे कानूनी मामले में 78 साल पुराना विलय पत्र यानी 'द कॉवनेंट' सबसे अहम दस्तावेज बनकर उभरा है. दिल्ली की नोटरी से सर्टिफाइड यह दस्तावेज कोर्ट के सामने पेश किया जा चुका है. इसमें आजादी के बाद 1947 में मध्य भारत की रियासतों के भारत संघ में विलय का पूरा ब्यौरा दर्ज है. इस दस्तावेज में निजी संपत्तियों और तत्कालीन राजाओं को मिलने वाले टैक्स फ्री प्रीवी पर्स (वार्षिक भत्ते) का पाई-पाई का हिसाब लिखा हुआ है. उस समय सबसे ज्यादा भत्ता ग्वालियर के तत्कालीन महाराज जीएम सिंधिया को मिलता था.

कानूनी लड़ाई में अब आगे क्या?

अब यह मामला 'जेष्ठाधिकार' बनाम 'हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम' की कानूनी बहस में बदल गया है. पहले उम्मीद लगाई जा रही थी कि 1000 पन्नों के समझौते के आधार पर कोर्ट जल्द कोई निर्णय दे देगा. परंतु नेपाल से आई इस नई कैविएट के बाद अब स्थिति पेचीदा हो गई है. जब तक प्रतिमा देवी और रमा राजे के पक्ष पर सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक अंतिम फैसले में देरी होने की पूरी संभावना जताई जा रही है.

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