भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की किताब का नाम है- 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी'. किताब रेडी, टाइटल रेडी, पब्लिशर भी रेडी भी फिर भी वो छप नहीं पाई. किताब ऐसे व्यक्ति कि जिसने भारतीय सेना को लीड किया. किताब छापने के लिए सरकार की मंजूरी का इंतजार है जो मिल नहीं रही. अगर ये किताब छप चुकी होती तो राहुल गांधी संसद में किताब के अंश पढ़ सकते थे. किताब नहीं छपी इसलिए स्पीकर ओम बिरला ने पढ़ने नहीं दी. गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कड़ा एतराज जताया. संसदीय प्रोटोकॉल के नियम 349 के कारण राहुल को अनपब्लिश बुक के अंश पढ़ने पर रोक लगाई गई.
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हैरान करने वाली बात यह है कि सेना प्रमुख के पद से रिटायर होने के सालों बाद भी यह किताब अब तक बाजार में नहीं आ पाई है. आखिर सरकार की मंजूरी का वो कौन सा पेंच है जिसने इस किताब के पन्ने पलटकर जनता के सामने आने से रोक दिया है? क्या हैं वो संवेदनशील खुलासे जो रक्षा मंत्रालय को परेशान कर रहे हैं?
साल 2024 में ही छपनी थी किताब
जनरल एमएम नरवणे- वो नाम जिन्होंने भारतीय सेना की कमान संभाली. उनकी आत्मकथा 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' अप्रैल 2024 में रिलीज होनी थी, लेकिन साल 2026 आ गया और किताब अब भी 'रिव्यू' के नाम पर रक्षा मंत्रालय की फाइलों में दबी है. इस किताब के कुछ हिस्से जब लीक हुए, तो संसद से लेकर गलियारों तक हड़कंप मच गया.
रिटायरमेंट के बाद भी सरकार की मंजूरी क्यों है?
सवाल उठता है कि रिटायरमेंट के बाद भी सरकार की मंजूरी क्यों जरूरी है? The Army Rules, 1954 और सरकारी गोपनीयता से जुड़े कानून Official Secrets Act 123 लागू होते हैं. कोई भी सैन्यकर्मी बिना अनुमति ऐसी जानकारी साझा नहीं कर सकता जो राष्ट्रीय सुरक्षा या विदेशी संबंधों को प्रभावित करे. भले ही जनरल नरवणे रिटायर हो चुके हैं, लेकिन वो ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट (OSA) से बंधे हैं. संवेदनशील ऑपरेशन्स की जानकारी सार्वजनिक करने से पहले रक्षा मंत्रालय की स्क्रीनिंग और अप्रूवल जरूरी है.
- सेना नियम 1954 (धारा 21): बिना इजाजत किताब लिखने, बयानबाजी पर रोक
- ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट : संवेदनशील सैन्य ऑपरेशन्स की जानकारी साझा करना गैरकानूनी
- पेंशन नियम (2021): विवादित कुछ छापा तो पेंशन बंद
- संसदीय प्रोटोकॉल (नियम 349): जो प्रकाशित उसकी बात नहीं कर सकते
- सिविल यानी गैर-सैन्य अधिकारी Official Secrets Act से बंधे
सरकार का पेंग्विन रैंडम हाउस को भी निर्देश
सरकार ने प्रकाशक पेंग्विन रैंडम हाउस को निर्देश दिया है कि जब तक समीक्षा पूरी न हो जाए, किताब की सॉफ्ट कॉपी या कोई भी अंश साझा न किया जाए. इसी कारण 2024 में होने वाली रिलीज अब तक टली हुई है और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर प्री-ऑर्डर भी रद्द कर दिए गए हैं. पेंग्विन ने कहा हुआ है कि जिम्मेदार प्रकाशक के रूप में नेशनल सिक्योरिटी' प्रोटोकॉल का सम्मान करते हैं. जनरल नरवणे और रक्षा मंत्रालय के बीच चल रही समीक्षा प्रक्रिया के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं.
अनपब्लिश किताब के एक अंश पर हंगामा
पूरी किताब तो छपी नहीं, लेकिन किताब के अंश लीक होकर संसद में हंगामा मचा रहे हैं. खुद जनरल नरवणे का कहना है कि उन्होंने अपना काम कर दिया है और अब गेंद प्रकाशक और रक्षा मंत्रालय के पाले में है. दिलचस्प बात यह है कि अपनी इस आत्मकथा के अटकने के बीच जनरल ने 'द कैंटोनमेंट कॉन्स्पिरेसी' जैसी फिक्शन किताब लिख दी, लेकिन उनकी असली किताब अब भी मंजूरी के इंतजार में है.
इससे पहले भी सेना प्रमुखों की किताबें छपी हैं
जनरल एम.एम. नरवणे से पहले भारत के कई सेना प्रमुखों और शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने अपनी आत्मकथाएं और संस्मरण प्रकाशित किए हैं. जनरल वी.पी. मलिक और जनरल जे.जे. सिंह ने अपनी किताबों में संवेदनशील ऑपरेशन्स की जानकारी दी थी, लेकिन प्रकाशन से पहले आवश्यक सैन्य मंजूरी ली गई थी ताकि कोई गोपनीय जानकारी (Classified Information) बाहर न जाए. जनरल सुंदरजी ने भी अपनी किताब के लिए उचित प्रक्रिया का पालन किया था.
जनरल नरवणे की किताब के मामले में स्थिति अलग इसलिए है क्योंकि सरकार ने जून 2021 में पेंशन नियमों में संशोधन किया है. अब सेवानिवृत्त (Retired) अधिकारियों को भी अपने संगठन के बारे में कुछ भी संवेदनशील लिखने से पहले लिखित अनुमति लेनी होती है. यदि कोई बिना अनुमति के ऐसी जानकारी छापता है जिसे सरकार 'संवेदनशील' मानती है, तो उनकी पेंशन रोकी जा सकती है.
जब कोई अधिकारी किताब लिखता है, तो उसे अपनी पांडुलिपि (Manuscript) सेना के ADG PI (Additional Directorate General of Public Information) और रक्षा मंत्रालय (MoD) के पास भेजनी होती है. वहां विशेषज्ञों की एक टीम हर लाइन को पढ़ती है. देखते हैं कि कहीं इसमें पड़ोसी देशों (जैसे चीन या पाकिस्तान) के साथ संबंधों पर बुरा असर डालने वाली बातें तो नहीं हैं. समीक्षा के बाद मंत्रालय कुछ हिस्सों को हटाने (Censor) या बदलने का सुझाव दे सकता है.
जनरल वी.के. सिंह पर चला था मुकदमा
RAW के पूर्व अधिकारी मेजर जनरल वी.के. सिंह ने बिना सरकारी इजाजत 2007 में 'India's External Intelligence: Secrets of RAW' लिखी थी। उन पर Official Secrets Act (OSA) के तहत मुकदमा चला और उनके घर पर छापेमारी भी हुई, क्योंकि सरकार का मानना था कि उन्होंने खुफिया जानकारी लीक की है. किताब में रॉ के भीतर कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं का दावा किया गया. किताब के कारण आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 के तहत सीबीआई ने केस दर्ज किया.
सरकारी कर्मचारियों के लिए किताब लिखने और प्रकाशित करने के नियम CCS (Conduct) Rules, 1964 और AIS (Conduct) Rules, 1968 के तहत आते हैं. यदि किताब पूरी तरह से साहित्यिक (Literary), कलात्मक (Artistic) या वैज्ञानिक (Scientific) प्रकृति की है और इसमें सरकारी नीतियों की आलोचना नहीं है, तो आमतौर पर पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होती है. अगर किताब में सरकारी नीतियों, प्रशासन या संवेदनशील जानकारी से जुड़ा है, तो इजाजत जरूरी है. Official Secrets Act के तहत किसी भी गोपनीय या ऐसी जानकारी को साझा करना मना है जो देश की अखंडता या विदेशी संबंधों को नुकसान पहुंचाए. कर्मचारी को ये स्पष्ट करना होता है कि किताब में व्यक्त विचार उसके अपने हैं, सरकार के नहीं.
पेंग्विन रैंडम हाउस ने क्या किया?
- अमेजन समेत ऑनलाइन साइट्स से बुकिंग हटाई
- जिन लोगों ने किताब बुक की थी, उनके पैसे वापस किए
- जैसा सरकार कहेगी, वैसी ही किताब छपेगी
किताब के लिए क्या हैं सेना के नियम?
- पांडुलिपि रक्षा मंत्रालय को देना जरूरी
- किताब प्रकाशन से पहले स्क्रिप्ट दिखाना जरूरी
- ADG PI के पास पांडुलिपि जमा कराना जरूरी
- सेना की एक्सपर्ट टीम पांडुलिपि की समीक्षा करती है
- एक्सपर्ट तय करती है क्या बताना चाहिए, क्या नहीं
- जरूरी हुआ तो सरकार कुछ अंश या पूरी किताब रद्द कर सकती है
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