सोशल मीडिया पर सुप्रीम कोर्ट के कोर्टरूम का एक वीडियो काफी वायरल हो रहा है जिसमें एक याचिकाकर्ता अपनी मर्यादा भूलकर खुद को सबसे बड़ा बताते हुए कोर्ट को हुक्म देता नजर आ रहा. इतना ही नहीं उसने देश के मुख्य न्यायाधीश के लिए भी बहुत गंदे शब्दों का इस्तेमाल किया. इतने पर भी उसका गुस्सा शांत नहीं हुआ तो उसने अपने केस की फाइल के पन्ने हवा में उड़ा दिए. इस बदतमीजी के बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने उसकी 'दिमागी और मौजूदा हालत' को देखते हुए उस पर कोई कानूनी एक्शन न लेने का बड़ा फैसला किया. हालांकि, कोर्ट ने उसके इस बर्ताव की कड़ी निंदा की और उसकी याचिका को खारिज कर दिया है.
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कोर्टरूम में क्या-क्या हुआ?
यह पूरी घटना शुक्रवार सुबह करीब 11 बजे की है. सुप्रीम कोर्ट में गर्मियों की छुट्टियों समर वेकेशन के दौरान होने वाले आधे दिन के कामकाज का यह आखिरी दिन था. जस्टिस के. वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच प्रबल प्रताप नाम के शख्स के केस की सुनवाई कर रही थी. तभी अचानक प्रबल प्रताप का पारा चढ़ गया. वह जजों से जिद करने लगा कि जिन पुलिसवालों पर उसने आरोप लगाए हैं कोर्ट तुरंत उनके खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करने का हुक्म दे. जब जजों ने उसकी बात नहीं मानी तो उसने चिल्लाना शुरू कर दिया. उसने फाइल के कागज हवा में फेंक दिए और सीजेआई को लेकर अपशब्द कहने लगा. शख्स की इस हरकत से जज साहब बेहद नाराज हो गए. उन्होंने तुरंत सुरक्षाकर्मियों को उसे हिरासत में लेने का आदेश दिया. आदेश मिलते ही वहां सादे कपड़ों में तैनात सिक्योरिटी गार्ड्स ने मुस्तैदी दिखाई और प्रबल प्रताप को दबोचकर कोर्टरूम से बाहर ले गए. इसके बाद दिल्ली पुलिस उसे अपने साथ ले गई और इस पूरे ड्रामे को लेकर उससे काफी देर तक पूछताछ की.
कोर्ट ने क्यों दी राहत?
मामले की सुनवाई के बाद दोनों जजों की बेंच ने अपने लिखित आदेश में इस बर्ताव पर गहरी चिंता जताई. कोर्ट ने कहा कि सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता को अपने केस पर कानूनी बात रखनी चाहिए थी, लेकिन उसने इसके उलट पूरी तरह से फालतू और अमर्यादित बातें कीं.
जजों ने अपने फैसले में लिखा,
"याचिकाकर्ता के हालात और उसकी स्थिति को देखते हुए, हम इस समय उसके खिलाफ कोई कानूनी या दंडात्मक कार्रवाई करना ठीक नहीं समझते."
केस भी हुआ खारिज
अदालत ने उसे जेल भेजने या कोई और सजा देने से भले ही राहत दे दी हो, लेकिन कानूनी तौर पर उसे कोई फायदा नहीं मिला. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया कि हाई कोर्ट के पुराने फैसले में दखल देने की कोई ठोस वजह नहीं है. इसलिए, इस याचिका को पूरी तरह खारिज किया जाता है. इस हाईवोल्टेज ड्रामे के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में छुट्टियों का दौर खत्म हो गया है और सोमवार से कोर्ट में रोज की तरह आम कामकाज शुरू हो जाएगा.
कौन है प्रबल प्रताप यादव?
प्रबल प्रताप यादव पेशे से एक टेक एम्प्लॉई रहा है. वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के विकासनगर इलाके में स्थित एक सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट कंपनी में काम करता था. दफ्तर में काम करने के दौरान उसकी नीयत डगमगा गई और वह अपने ही साथ काम करने वाली एक मुस्लिम महिला सहकर्मी को लगातार परेशान करने लगा. प्रबल उस महिला कर्मचारी को बेहद आपत्तिजनक, अश्लील और गाली-गलौज से भरे ईमेल्स भेजता था. जब पानी सिर से ऊपर चला गया तो महिला ने इसकी शिकायत मैनेजमेंट से की. कंपनी ने पहले तो प्रबल को सुधरने की सख्त चेतावनी दी लेकिन जब उसकी हरकतें बंद नहीं हुईं तो कंपनी ने कड़ा रुख अपनाते हुए उसे नौकरी से बर्खास्त (टर्मिनेट) कर बाहर का रास्ता दिखा दिया.
ऑफिस से बेइज्जत होकर निकाले जाने के बाद प्रबल प्रताप के सिर पर बदले का खून सवार हो गया. कंपनी को सबक सिखाने के लिए उसने एक ऐसा पैंतरा चला जो सीधे देशभक्ति से जुड़ा था. उसने कंपनी पर 'देश विरोधी गतिविधियों' में शामिल होने के झूठे और मनगढ़ंत आरोप लगा दिए. इसके बाद उसने कंपनी के मालिकों और अधिकारियों को जेल भिजवाने के लिए कानूनी दांवपेंच का सहारा लेना शुरू किया.
लखनऊ से दिल्ली तक के कानूनी ड्रामे की टाइमलाइन
प्रबल प्रताप ने अपनी इस झूठी लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए लखनऊ से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक खूब चक्कर काटे. इसकी पूरी क्रोनोलॉजी इस प्रकार है:
नवंबर 2025: नौकरी से निकाले जाने के बाद प्रबल ने लखनऊ की सीजेएम (CJM) कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उसने अर्जी दी कि कंपनी देश विरोधी काम कर रही है इसलिए इसके खिलाफ तुरंत एफआईआर (FIR) दर्ज की जाए। इस पर कोर्ट ने लखनऊ पुलिस से मामले की जांच कर रिपोर्ट मांगी.
26 फरवरी 2026: पुलिस ने अपनी जांच रिपोर्ट कोर्ट को सौंप दी. जब अदालत ने प्रबल से आरोपों को साबित करने के लिए पुख्ता सबूत मांगे तो वह कुछ खास पेश नहीं कर पाया. इस पर कोर्ट ने पुलिस एफआईआर का आदेश न देकर मामले को सीधे 'कम्प्लेंट केस' के तौर पर दर्ज कर लिया.
6 अप्रैल 2026: नियमानुसार प्रबल को कोर्ट में अपने दावों के समर्थन में सबूत पेश करने थे, लेकिन वह इस बात पर अड़ गया कि पुलिस केस यानी एफआईआर ही होनी चाहिए. अपनी इसी जिद में उसने इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में याचिका दायर कर दी और मांग की कि निचली अदालत के कम्प्लेंट केस वाले फैसले को रद्द कर सीधे पुलिस एफआईआर का हुक्म दिया जाए. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उसकी इस याचिका को खारिज कर दिया. कोर्ट ने साफ कहा कि जब निचली अदालत पहले से ही इस मामले की सुनवाई कर रही है तो कानून के दायरे में रहकर वहीं अपने सबूत और तथ्य पेश किए जाएं.
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