charchit chehra: कौन हैं ज्यां द्रेज जो CJP प्रदर्शन में कुर्ता पहने खड़े थे, पुलिस हिरासत में टूटी-फूटी हिंदी में क्या बोले ?

रूपक प्रियदर्शी

13 Oct 2026 (अपडेटेड: Oct 13 2026 9:01 AM)

charchit chehra: जंतर मंतर प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज का वीडियो वायरल. जानिए मनरेगा के आर्किटेक्ट ज्यां द्रेज कौन हैं और वे 11 घंटे तक थाने में क्यों अड़े रहे.

दिल्ली प्रोटेस्ट में ज्यां द्रेज भी डिटेन किए गए...रिपोर्टर ने उनसे क्या पूछ लिया ?
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ज्यां द्रेज की कहानी उसी दिन सबने जानी जिस दिन कॉकरोच जनता पार्टी सीजेपी के प्रदर्शन को रोकने के लिए जंतर मंतर को छावनी बना दिया था. प्रदर्शन में लड़के-लड़कियां, नेता, एक्टिविस्ट, मीडिया, सिविल सोसाइटी वाले भी आए. ऐसे प्रदर्शनों के निशाने पर ज्ञानेश कुमार हैं, लेकिन निगाहों में केंद्र सरकार, बीजेपी है. पुलिस ने जहां-जिसको देखा, उठाकर पुलिस वैन में डाल दिया. 

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प्रदर्शनकारियों की उसी भीड़ में खादी का कुर्ता पहने, कंधे पर झोला लटकाए, सफेद दाढ़ी वाले एक बुजुर्ग भी सरकार को चुभने वाले पोस्टर थामे खड़े थे. दिल्ली पुलिस ने देखते ही हिरासत में ले लिया. पुलिस वैन में बिठाए जाते समय न जाने किसी रिपोर्टर को क्या सूझी कि उसने विदेशी चेहरे को देखकर माइक आगे बढ़ाया और मासूम सा सवाल पूछा लिया-आप कौन हैं? कहां से आए हैं? क्या काम करते हैं? बुजुर्ग ने बेहद शांत और टूटी-फूटी हिंदी में कहा- ''मैं ज्यां द्रेज हूं''.

वीडियो सोशल मीडिया पर हुआ Viral

देखते ही देखते वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया. पूरी दुनिया हैरान थी कि जिस व्यक्ति ज्यां द्रेज ने भारत के करोड़ों गरीबों को 'मनरेगा' जैसी दुनिया की सबसे बड़ी रोजगार योजना दी, मीडिया का एक हिस्सा पहचानता तक नहीं. बस इसी से जंतर मंतर से अचानक वायरल हुए ज्यां द्रेज चर्चित चेहरा बन गए. पुलिस भी उनकी पहचान जानकर हैरान हो गई. आदर्श नगर पुलिस स्टेशन ले जाकर पुलिस ने 4 घंटे में छोड़ना चाहा, लेकिन ज्यां द्रेज ने कहा, "मैं अकेला नहीं जाऊंगा. मेरे साथ बंद लोगों को भी छोड़ो, तभी बाहर निकलूंगा. 11 घंटे थाने में अड़े रहने के बाद सबको साथ लेकर ही बाहर आए ज्यां द्रेज.

ज्यां द्रेज भारत के झोलावाला अर्थशास्त्री

ज्यां द्रेज को भारत में झोलावाला अर्थशास्त्री कहा जाता है. एक ऐसा प्रोफेसर जो साइकिल से चलता है, जिसके कंधे पर हमेशा एक झोला होता है और जो आदिवासियों-गरीबों के हक के लिए कड़ाके की धूप में धरने पर बैठ जाता है. उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन के साथ मिलकर भूखमरी और भारतीय अर्थव्यवस्था पर कई किताबें लिखीं. जिनका जन्म तो हुआ बेल्जियम में लेकिन हमेशा के लिए भारतीय बनकर रह गए. 

ज्यां द्रेज का जन्म 22 जनवरी 1959 को बेल्जियम के ल्युवेन शहर के एकेडमिक और संपन्न परिवार में हुआ. उनके पिता जैक्स द्रेज यूरोप के मशहूर इकॉनमिस्ट रहे. ज्यां द्रेज और उनके भाई-बहनों का बचपन सुख-सुविधाओं और एकेडमिक माहौल में बीता. परिवार के माहौल ने ज्यां को बचपन में सिखा दिया कि दुनिया की बड़ी से बड़ी समस्याओं का हल आंकड़ों और किताबों में छुपा होता है. ज्यां द्रेज का मन मैथमेक्टिस में लगता था. आगे उन्होंने ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ एसेक्स से Mathematical Economics में बैचलर्स की डिग्री हासिल की. 

ज्यां द्रेज की डेस्टनी तो कुछ और थी

पिता का नाम सक्सेस की गारंटी था लेकिन ज्यां द्रेज की डेस्टनी तो कुछ और थी तो न यूरोप में मन लगा, न आलीशान लाइफ स्टाइल में. उनकी रिसर्च में कुछ तो अलग था. लंदन में डॉक्टरेट करते हुए बेघर लोगों के साथ रहने लगे. उन्हें किताबों में लिखे सच का ग्राउंड पर रियलिटी चेक करना था. उसी भूख ने उन्हें भारत का रास्ता दिखाया. वहीं से ज्यां द्रेज की जिंदगी हमेशा-हमेशा के लिए बदल गई. 

20 साल की उम्र में पहली बार भारत आए

साल 1979 में, महज 20 साल की उम्र में, एक रिसर्च प्रोजेक्ट के सिलसिले में ज्यां द्रेज ने पहली बार भारत में कदम रखा. गांवों, तंग गलियों और दूर-दराज के आदिवासी इलाकों में जाकर भयानक गरीबी, भूखमरी और सरकारी उदासीनता को अपनी आंखों से देखा.

जो देखा उससे हिलते गए ज्यां द्रेज. फिर वो क्रांतिकारी फैसला किया कि भारत में रहकर हंगर और पॉवर्टी से लड़ेंगे. बेल्जियम भूल गए. भारत को अपना लिया और पढ़ने के लिए भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) से पीएचडी पूरी की. भारत के लिए इतने समर्पित हुए कि भारत आने के लगभग 23 साल बाद, साल 2002 में उन्होंने बेल्जियम की नागरिकता हमेशा के लिए त्याग दी और पूरी तरह से भारतीय नागरिक बन गए. 

भारत में झुग्गी बस्ती में जाकर रहने लगे 

भारत आने के बाद ज्यां द्रेज किसी फाइव-स्टार होटल या दिल्ली के लुटियंस जोन के बंगलों में नहीं रहे. दिल्ली की झुग्गी-बस्ती में जाकर रहने लगे, जहां वे खुद अपने हाथ से खाना बनाते और टाट की बोरी पर सोते थे. उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में काम करना शुरू किया. उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाया. 

ये वो दौर था जब देश में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार चल रही थी और इंडिया शाइनिंग के नारे गूंज रहे थे.  साल 2004 में देश की राजनीति में भारी यू-टर्न आया. सरकार कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार सत्ता में आई. सोनिया गांधी प्रधानमंत्री तो नहीं बनीं, लेकिन सरकार की पॉलिसी मेकर बन गईं. सोनिया गांधी के लिए मनमोहन सिंह की सरकार ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) का गठन किया. NAC ने खोज-खोजकर देश के बड़े बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जोड़ा. 

ज्यां द्रेज उस समय तक भारत के ग्रामीण इलाकों में भूखमरी और गरीबी पर गहरा जमीनी शोध कर चुके थे और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन के साथ मिलकर कई महत्वपूर्ण किताबें लिख चुके थे. Development Economics में उनके बेजोड़ अनुभव और रिसर्च के कारण NAC  से जुड़ गए. NAC को सोनिया गांधी की सुपर कैबिनेट कहा जाने लगा.

ऐसे बना राहुल गांधी से कनेक्शन

ज्यां द्रेज उस कैबिनेट के सदस्य बन गए. कांग्रेस, सोनिया गांधी, राहुल गांधी के साथ ज्यां द्रेज का कनेक्शन तभी बना. राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) के मंथन से निकला मनरेगा. ज्यां द्रेज ने ग्रामीण भारत से गरीबी और पलायन रोकने के लिए 100 दिन के कानूनी रोजगार गारंटी (NREGA), मिड डे मील का खाका खींचा, जो  दुनिया की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी बन गई. आगे सूचना का अधिकार RTI, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून भी लागू हुआ. यूपीए सरकार के ऐसे सारे प्रयोगों से जुड़े रहे ज्यां द्रेज.

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कांग्रेस के कार्यकर्ता नहीं बल्कि पॉलिसी एक्टिविस्ट बने द्रेज

ज्यां द्रेज कांग्रेस के कार्यकर्ता या अंधभक्त नहीं बने. वो पॉलिसी एक्टिविस्ट बनकर आगे राहुल गांधी की मदद करने लगे. जैसे-जैसे कांग्रेस में राहुल गांधी का कद बढ़ने लगे, ज्यां द्रेज करीब रहकर काम करने लगे. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी ने जिस न्याय योजना का वादा किया था, माना जाता है कि उसे डिजाइन करने में भी ज्यां द्रेज की बड़ी भूमिका रही. हालांकि राहुल गांधी की वो न्याय स्कीम प्रचंड मोदी लहर के सामने कतई नहीं टिकी.

ज्यां द्रेज जब  वंचित और गरीब तबके के अधिकारों के लिए चल रहे अलग-अलग सामाजिक आंदोलन चला रहे थे तब बेला भाटिया भी कुछ ऐसे ही मिशन पर थीं.  बेला भाटिया खुद कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी करके ग्राउंड पर काम करने लौटी थीं. जब ज्यां द्रेज दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ा रहे थे, तब दोनों का परिचय हुआ और जल्द ही जन-कल्याण, सादगी और न्याय के प्रति साझा जुनून ने उन्हें एक-दूसरे के बेहद करीब ला दिया. 

बेला भाटिया ऐसे बनीं हमसफर

परिचय केवल विचारों के स्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि 1991 के गल्फ वॉर के दौरान दोनों एक साथ शांति अभियान का हिस्सा बनकर इराक और सऊदी अरब की सीमा पर बने पीस कैंप में भी रहे. कठिन और चुनौतीपूर्ण सफर ने रिश्ते को अटूट रिश्ते में बदल दिया, जिसके बाद दोनों ने शादी करने का फैसला किया. इतने पढ़े-लिखे और शानदार जिंदगी जीने वाले ज्यां द्रेज और बेला भाटिया ने छोटी सी झुग्गी-बस्ती के एक कमरे के मकान से अपनी शादीशुदा जिंदगी और नए सामाजिक आंदोलनों की नींव रखी.

आज ज्यां द्रेज बीजेपी सरकार के खिलाफ अचानक प्रोटेस्ट करने नहीं उतरे.  सरकार की आर्थिक और सामाजिक नीतियों के धुर आलोचक रहे हैं. उनकी नजर में भी सरकार केवल कॉर्पोरेट विकास में व्यस्त है, जिससे गरीब और समाज का निचला तबका हाशिए पर चला गया है. वे मनरेगा (MGNREGA) में बजट कटौती, राशन प्रणाली (PDS) में आधार कार्ड की अनिवार्यता के कारण गरीबों का हक छिनने और लोकतंत्र में शांतिपूर्ण असंतोष को दबाने के खिलाफ लगातार आवाज उठाते रहे हैं. 

VB-GRAMG पर क्या कहते हैं ज्यां द्रेज ?

मनरेगा को बदलने के लिए लाए गए VB-GRAMG विधेयक (2025) को उन्होंने रोजगार गारंटी पर सर्जिकल स्ट्राइक करार दिया, जो ग्रामीण श्रमिकों को पूरी तरह लाचार बना देता है. जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन में भी इसीलिए शामिल हुए क्योंकि उन्हें लगा कि वोटिंग लिस्ट में गड़बड़ियों और लोकतंत्र पर प्रशासनिक कड़े पहरे के कारण आम नागरिकों के बुनियादी लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकार खतरे में हैं  और इसी कारण वे पुलिस की भारी मुस्तैदी और सरकारी तंत्र को चुनौती देने सड़कों पर उतरे.

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