ऐसा माना जाता है कि बच्चों की शादी के बाद समधी और समधन का रिश्ता बराबरी का होता है. रिश्तों की गंभीरता के साथ हंसी-मजाक का होता है. लेकिन जब समधन मायावती जैसी प्रभावशाली और ताकतवर नेता हों तो सामाजिक रिश्तों के सारे नियम धरे के धरे रह जाते हैं.
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ये कहानी है समधी डॉ. अशोक सिद्धार्थ और समधन मायावती की है. ये रिश्ता तब बना डॉ. अशोक सिद्धार्थ की बेटी प्रज्ञा सिद्धार्थ की शादी मायावती के भाई आनंद कुमार के बेटे आकाश आनंद हुई. शादी हुए 3 साल हो चुके. शुरूआत बढ़िया हुई तभी रिश्तेदारी में राजनीतिक भूचाल आया. पता नहीं समधी साहब कभी समधन से हंसी मजाक कर पाए या नहीं पर उत्तर प्रदेश की राजनीति में बीएसपी और मायावती के परिवार में चल रही भीषण उठा-पटक के सेंटर में जरूर आ गए. आज के चर्चित चेहरा अशोक सिद्धार्थ हैं जो राजनीति से संन्यास की कसम खाकर भी अपने दामाद आकाश आनंद की बसपा में सियासी पैठ को नहीं बचा पा रहे हैं.
दामाद की राजनीति के लिए क्या कुछ कर रहे अशोक सिद्धार्थ
ये एक समधी, एक ऐसे नेता की कहानी है जिन्हें आज खुद को पाक-साफ साबित करने और दामाद की राजनीति बचाने के लिए बार-बार मायावती को बहनजी लिखना पड़ रहा है. उनके चरण स्पर्श करने पड़ रहे हैं. यहां तक कि उन्होंने बेटी-दामाद की खातिर अपनी राजनीति की भी आहुति देनी पड़ रही है. क्या अशोक सिद्धार्थ का सिर्फ यही कसूर था कि वे उस बेटी के पिता हैं, जिसकी शादी उन्होंने मायावती जैसी पावरफुल नेता के घर में कर दी?
बेटी की शादी के बाद चर्चा में आए अशोक सिद्धार्थ
अशोक सिद्धार्थ ऐसे चर्चित चेहरा हैं जिनकी चर्चा ही शुरू हुई मायावती के घर बेटी की शादी के बाद से. हालांकि बीएसपी के साथ पिछले 35 सालों से काम कर रहे थे. एकदम ग्रास रूट टाइप वर्कर रहे जिसमें सिर्फ वही किया जो बहनजी ने चाहा और जो उनके हित में था. पार्टी के कई पदों पर रहे. बीएसपी के टिकट पर 2009 में MLC बने. बहनजी के इतने कृपापात्र बने कि 2016 से 2022 तक राज्यसभा सांसद रहे. बहनजी को हमेशा राजनीतिक गुरु और बड़ी बहन का दर्जा देकर रखा. डॉक्टर साहब तो खुद अपने लिए बहनजी से बहुत कुछ पाए. मायावती के सीएम रहते 2007 से 2012 तक पत्नी सुनीता सिद्धार्थ को भी यूपी महिला आयोग की उपाध्यक्ष बनवा दिया.
डॉक्टर प्रज्ञा को बहू बनाना चाहते थे आनंद कुमार
संबंधों और विश्वास का पीक तब आया जब 2023 में अशोक सिद्धार्थ की बेटी प्रज्ञा को मायावती और आनंद कुमार ने परिवार के बड़े बेटे आकाश आनंद के लिए पसंद करके बहू बनाया. अशोक सिद्धार्थ लंबे समय से मायावती के सबसे भरोसेमंद और संकटमोचक सिपहसालार थे, जिसके कारण मायावती के भाई आनंद कुमार से उनकी गहरी और पारिवारिक दोस्ती हो गई थी. आनंद कुमार को अपने बेटे आकाश आनंद के लिए जिस बहू की तलाश थी उसके सारे गुण अशोक सिद्धार्थ की बेटी डॉ. प्रज्ञा सिद्धार्थ में थे. अशोक सिद्धार्थ खुद एमबीबीएस डॉक्टर तो नहीं बने पर बेटी को डॉक्टर बना दिया. प्रज्ञा लंदन से एमबीबीएस वाली डिग्री लेकर डॉक्टर बनीं. अशोक सिद्धार्थ उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में आंखों की जांच करने वाले और चश्मे का नंबर बनाने वाले सरकारी कर्मचारी थे. बस उसी से डॉक्टर साहब कहलाने लगे. उनके पास MBBS की डिग्री नहीं है.
शादी पर मायावती का क्या रिएक्शन था ?
जब आनंद कुमार ने अपनी इस पारिवारिक दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने का प्रस्ताव मायावती के सामने रखा तो उन्होंने हामी भर दी. भक्ति, वफादारी के साथ मेरिट, क्वालिफिकेशन-सारे गुण थे रिश्तेदारी में बदलने के लिए. 26 मार्च 2023 को गुरुग्राम के रिसॉर्ट में बौद्ध रीति-रिवाज से दोनों की शादी हुई. शादी ने बहनजी के एक वफादार नेता को सीधे समधी बना दिया. शायद यही वो गलती थी जिसका आज तक कोर्स करेक्शन कर रही हैं मायावती.
क्या है डॉ. अशोक सिद्धार्थ की कहानी ?
डॉ. अशोक सिद्धार्थ की कहानी की शुरुआत उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के कायमगंज से होती है. जहां 5 फरवरी 1985 को जन्म हुआ था. उनके पिता कांशीराम के शुरुआती दौर के बेहद खास और करीबी सहयोगियों में गिने जाते थे. जब बीएसपी का गठन भी नहीं हुआ था और कांशीराम बामसेफ के जरिए दलित-शोषित समाज को एकजुट कर रहे थे, तब अशोक सिद्धार्थ का परिवार इस आंदोलन में पूरी तरह सक्रिय था. इसी पारिवारिक माहौल का असर था कि उन्होंने बचपन से ही डॉ. बी. आर. अंबेडकर और कांशीराम के विचारों को आत्मसात किया.
सरकारी नौकरी करते हुए भी बामसेफ से जुड़े रहे
पिता की लाइन पर समाज और राजनीति के लिए काम करना शायद शुरूआती मोटो नहीं था. बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी से पढ़ने के बाद उन्होंने महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज, झांसी से आई स्पेशलिस्ट डॉक्टर की डिग्री ली. हालांकि सरकारी नौकरी करते हुए भी बामसेफ (All India Backward and Minority Communities Employees Federation) से जुड़े रहे. 2007 में उनकी जिंदगी में बड़ा टर्निंग पॉइंट आया.
जब मायावती की नजर अशोक सिद्धार्थ पर पड़ी
जब यूपी में बीएसपी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी, तब मायावती ने उनके उपयोगिता देख सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर फुल टाइम राजनीति में आने को कहा. फिर अशोक सिद्धार्थ लगातार मायावती के लिए काम करते हुए करीबी, भरोसेमंद बनते गए. हालांकि अशोक सिद्धार्थ कभी भी मंत्री नहीं बने. मायावती ने उन्हें सरकार में शामिल करने के बजाय हमेशा संगठन में बड़ी जिम्मेदारी दी. जैसे ही यह वफादारी पारिवारिक रिश्ते में बदली, उनके बुरे दिन शुरू हो गए.
मायावती और आनंद कुमार शुरू से बीएसपी के कवर और कवच बने रहे. जब वक्त और बारी आई नई जेनरेशन की लीडरशिप तैयार करने की तो आनंद कुमार के बड़े बेटे आकाश आनंद को नेशनल कॉर्डिनेटर के लिए चुना गया. तब तक आकाश अशोक सिद्धार्थ के दामाद बन चुके थे. वहीं से चीजें बदलने लगीं. आकाश आनंद कुछ नया करने लगे तो अशोक सिद्धार्थ उनके सलाहकार, सुपर बॉस जैसे हो गए. आकाश पर ससुरजी के बढ़ते कद और असर से मायावती असहज होने लगीं.
आरोप लगे- दामाद आगे पर पर्दे के पीछे हैं अशोक सिद्धार्थ
ये आज तक पता नहीं कि इन सबसे आकाश के पिता आनंद कुमार कितने सहज या असहज थे. आरोप लगने कि दामाद को मोहरा बनाकर अशोक सिद्धार्थ पर्दे के पीछे रहकर पार्टी में समानांतर सत्ता चला रहे थे. आकाश की पत्नी प्रज्ञा पर भी शक गहराने लगा. मायावती को लगने लगा कि घर का बेटा कंट्रोल से बाहर जाकर दामाद बनकर ससुर और बीवी के इशारों पर नाच रहा है. फिर एक दिन वो आया जब मायावती ने आकाश आनंद पर चाबुक चलाते हुए नेशनल कॉर्डिनेटर से हटाया. कह दिया कि अशोक सिद्धार्थ और आकाश आनंद को बहुजन मूवमेंट से ज्यादा अपने निजी और पारिवारिक स्वार्थों से लगाव है.
पूरे विवाद में शांत रहीं डॉ. प्रज्ञा
मायावती ने अशोक सिद्धार्थ पर सारा कसूर नाम लेकर मढ़ा, लेकिन आकाश की पत्नी डॉ. प्रज्ञा का राजनीति से सीधे तौर पर कोई वास्ता नहीं रहा. पूरे विवाद के दौरान पूरी तरह शांत रहीं. पता नहीं अपने ऊपर शक और आरोपों को लेकर चुप्पी तोड़ी होती तो सीन कुछ और होता.
मायावती की नजर में परिवार और संगठन के भीतर जो भी दूरियां आईं, उसकी असली वजह डॉक्टर प्रज्ञा सिद्धार्थ ही थीं. मायावती को शक रहा कि प्रज्ञा शादी के बाद भी अपने पिता अशोक सिद्धार्थ के राजनीतिक स्वार्थों और प्रभाव से खुद को मुक्त नहीं कर पाईं.
मायावती ने बिना नाम लिए प्रज्ञा की तरफ किया इशारा
मायावती ने अपने अंदरूनी सर्कुलर और बयानों में खुलकर तो प्रज्ञा का नाम नहीं लिया, लेकिन उन्होंने यह साफ संकेत दिया कि अशोक सिद्धार्थ अपनी बेटी प्रज्ञा के जरिए दामाद आकाश आनंद को भड़का रहे थे. उन्हें अपने पक्ष में करके पार्टी को दो फाड़ करने की साजिश रच रहे थे।
गाज अशोक सिद्धार्थ और आकाश दोनों पर गिरी
ये किसी रहस्य की तरह है कि मायावती के इस खेल में मोहरा अशोक सिद्धार्थ थे या उनके घर का बेटा आकाश आनंद क्योंकि गाज तो दोनों पर गिरी. पॉलिटिकल करियर दोनों का डूब रहा है. आकाश आनंद का बीएसपी में आना-जाना किसी सस्पेंस थ्रिलर फिल्म जैसा रहा है.
पहली बार लोकसभा चुनाव के दौरान गिरी गाज
मायावती ने उन्हें बड़ी उम्मीदों के साथ अपना अघोषित उत्तराधिकारी और पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक घोषित किया था, लेकिन लोकसभा चुनावों के दौरान उनके आक्रामक बयानों से नाराज होकर 2024 में पहली बार उन्हें पद से हटा दिया गया. इसके बाद जब उनकी दोबारा वापसी हुई. तो उनका सियासी ग्राफ फिर बढ़ने लगा, लेकिन अंदरूनी खींचतान के बाद फिर 3 सितंबर को मायावती ने एक बार फिर उन्हें राष्ट्रीय संयोजक के पद से बेदखल कर दिया.
खींचतान का अंत बेहद नाटकीय रहा
इस खींचतान का अंत बेहद नाटकीय रहा. इसके बाद समधन और समधी के बीच शर्त का खेल शुरू हुआ. मायावती ने शर्त रख दी कि अगर आकाश आनंद को पार्टी में रहना है उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ को पूरी तरह से सीन से हटना होगा. एक लाचार पिता और ससुर की तरह, अपने दामाद का राजनीतिक करियर बचाने के लिए अशोक सिद्धार्थ ने सोशल मीडिया पर बहनजी को चरण स्पर्श करते हुए राजनीति और सामाजिक जीवन से पूरी तरह संन्यास लेने का ऐलान कर दिया. इस शपथ के साथ कि मायावती के चरणों में हमेशा समर्पित रहेंगे और उनके लिए जान देना भी गर्व की बात होगी, लेकिन इस पूर्ण आत्मसमर्पण और घुटने टेकने के बाद भी मायावती का गुस्सा शांत नहीं हुआ. उन्होंने अशोक सिद्धार्थ के इस कदम को देर से उठाया गया कदम करार दिया और कहा कि इनकी नीयत में खोट और महत्वाकांक्षा अभी कम नहीं हुई है.
ईशान आनंद बने पार्टी का नया चेहरा
उनकी और दामाद के भविष्य की स्क्रिप्ट शायद पहले ही लिखी जा चुकी थी. इतना सब करने, कहने से पहले मायावती आकाश के छोटे भाई और आनंद कुमार के दूसरे बेटे ईशान आनंद को पार्टी का नया चेहरा बना चुकी हैं. मायावती ने आकाश आनंद पर 'डबल माइंडेड' होने और बुआ से ज्यादा ससुर के प्रति वफादार रहने का आरोप लगाते हुए, न सिर्फ वापसी के सारे दरवाजे बंद कर दिए, बल्कि उन्हें बीएसपी से भी निकालकर आजाद कर दिया. आकाश आनंद के इस अंतिम एग्जिट ने यह साफ कर दिया कि मायावती की सल्तनत में वफादारी की शर्त अटूट है और वहां सिर्फ एक ही सुप्रीम बॉस हैं-बहन मायावती.
मायावती के कड़े नियम की ससुर-दामाद भेंट चढ़ गए
डॉ. अशोक सिद्धार्थ की फैमिली और पॉलिटिकल लाइफ की क्लोजिंग लाइन ये है कि वो मायावती की सल्तनत के उस कड़े नियम की भेंट चढ़ गए जहां समधी का रिश्ता भी शर्तों पर तय होता है. अशोक सिद्धार्थ ने बेटी की शादी पावरफुल घर में क्या की, उन्हें अपनी पूरी जिंदगी की कमाई राजनीति को तिलांजलि देनी पड़ी, पैर छूने पड़े, गिड़गिड़ाना पड़ा, और अंत में न वो खुद बचे और न ही अपने दामाद के करियर को बचा पाए. आगे क्या होगा, इसका इंतजार करना होगा.
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