14 करोड़ की जमीन, 54 करोड़ का सौदा... हरिद्वार भूमि घोटाले में कैसे खुली अधिकारियों की पोल?

Haridwar Land Scam: हरिद्वार भूमि घोटाले में 14 करोड़ रुपये की कृषि भूमि को कथित तौर पर 54 करोड़ रुपये में खरीदने का मामला सुर्खियों में है. जांच में लैंड यूज परिवर्तन, मूल्यांकन प्रक्रिया और नगर निगम की खरीद में गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं. जानिए कैसे इस मामले में DM, SDM और नगर आयुक्त समेत कई अधिकारियों पर कार्रवाई हुई और क्यों सराय गांव की यह जमीन पूरे उत्तराखंड में चर्चा का विषय बन गई है.

Haridwar Land Scam
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अंकित शर्मा

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उत्तराखंड में पिछले लंबे समय से जमीन कानून में सख्ती की जरूरत को लेकर बहस होती रही है. राज्य की अलग-अलग सरकारों का भी तर्क रहा है कि पहाड़ी राज्य की संवेदनशील भौगोलिक स्थिति की सुरक्षा करने और स्थानीय जमीन मालिकों का शोषण रोकने के लिए कड़े नियम जरूरी हैं. लेकिन हाल में ही सामने आए हरिद्वार भूमि घोटाले के मामले ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है. इस घोटाले में साफ दिखता है कि कैसे सरकारी अधिकारी अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर सरकारी धन की हेराफेरी कर सकते हैं . आइए विस्तार से जानते हैं पूरी कहानी.

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14 करोड़ की जमीन हुई 54 करोड़ की

इस विवाद के पीछे की पूरी कहानी हरिद्वार के सराय गांव की 2.307 हेक्टेयर जमीन से जुड़ी हुई है. यह जमीन नगर निगम के सॉलिड वेस्ट डंपिंग यार्ड के पास है. वहां के लोगों का कहना है कि इस डंपिंग यार्ड की वजह से इलाके में बदबू, प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं लगातार बनी हुई रहती हैं. जांच के मुताबिक यह भूमि मूल रूप से कृषि भूमि थी और इसकी कीमत लगभग 14 करोड़ रुपए थी. लेकिन कुछ ही समय में इस जमीन की कीमत अचानक से बढ़कर 54 करोड़ रुपए की हो गई और सरकारी खरीद का हिस्सा बन गई.

दरअसल मामले की शुरुआत साल 2024 के सितंबर में हुई, जब सराय गांव के ही सिंह परिवार ने नगर निगम को अपनी जमीन खरीदने का प्रपोजल दिया. उन्होंने दावा किया कि जमीन के पीछे बने वेस्ट डंपिंग यार्ड की वजह से उनकी जमीन बेकार हो चुकी है. यह प्रस्ताव कथित तौर पर तत्कालीन म्युनिसिपल कमिश्नर वरुण चौधरी को दिया गया था. इसके बाद तत्कालीन एसडीएम ज्वालापुर अजयवीर सिंह ने कथित तौर पर धारा 143 के तहत जमीन का उपयोग कृषि से बदलकर व्यावसायिक कर दिया. 

रिकॉर्ड समय में पूरी की गई प्रक्रिया

इस मामले को लेकर सबसे पहले हरिद्वार की मेयर किरण जैसल ने सवाल उठाए और सीएम पुष्कर सिंह धामी की संज्ञान में लाया. शिकायत मिलने के बाद मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने जांच के आदेश दिए. सचिव रणवीर सिंह चौहान को जांच की जिम्मेदारी मिली. उन्होंने जमीन खरीद प्रक्रिया और उससे जुड़े सारे घटनाक्रमों की जांच के बाद एक डिटेल्ड रिपोर्ट सरकार को सौंपी, जिसके बाद बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई हुई.

जांच अधिकारियों से मिली जानकारी के मुताबिक, यह प्रक्रिया असामान्य तरीके से बेहद तेजी से पूरी की गई. दरअसल नियमों के तहत सभी पक्षों को कम से कम 22 दिनों का नोटिस देना अनिवार्य होता है. साथ ही जमीन की आवश्यकता और व्यवहार्यता की जांच के लिए पूल कमेटी भी नहीं बनाई गई और पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड समय में पूरी कर ली गई. भूमि उपयोग बदलने के लिए जमीन की कीमत भी 6 हजार रुपए प्रति वर्गमीटर से बढ़कर लगभग 25 हजार रुपए प्रति वर्गमीटर हो गई. फिर हरिद्वार नगर निगम ने इसे दिसंबर 2024 में खरीद लिया.

इन अधिकारियों पर गिरी गाज

मामले के संज्ञान में आने के बाद जांच शुरू हुई और जून 2025 में राज्य सरकार ने हरिद्वार के तत्कालीन DM कर्मेंद्र सिंह, म्युनिसिपल कमिश्नर वरुण चौधरी और SDM अजयवीर सिंह समेत कई अधिकारियों पर कार्रवाई करते हुए सस्पेंड कर दिया. यह राज्य का पहला ऐसा मामला माना गया जहां पर एक साथ किसी DM-SDM और म्युनिसिपल कमिश्नर पर एक ही केस में कार्रवाई हुई. जांच के दौरान कई गड़बड़ियां सामने आई. जांच रिपोर्ट में यह भी लिखा गया कि, खरीद प्रक्रिया कृषि भूमि के मूल्यांकन के आधार पर शुरू हुई, लेकिन अंतिम खरीद व्यावसायिक दरों पर हुई. 

इसके बाद सतर्कता विभाग की जांच भूमि चयन, वैल्युएशन, लैंड यूज में बदलाव और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के पालन की जांच की गई. जांचकर्ताओं ने सवाल उठाया की जब जरूरत नहीं थी तो आखिर जमीन क्यों खरीदनी पड़ी. एक साल बाद जून 2026 में धामी सरकार ने कार्रवाई और तेज कर दी. राज्य सरकार ने तत्कालीन म्युनिसिपल कमिश्नर और IAS अधिकारी वरुण चौधरी को सेवा से बर्खास्त करने और तत्कालीन DM कर्मेंद्र सिंह के खिलाफ बड़ी सजा की अनुशंसा की है.

अधिकारियों के खिलाफ मुकदमे को मिली मंजरी

इसके अलावा पूर्व SDM अजयवीर सिंह के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई, जबकि मामले से जुड़े अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे को मंजूरी मिल गई है. आगे की कार्रवाई के लिए प्रस्ताव को केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को भेजा गया. सीएम धामी ने इसे करप्शन के खिलाफ सरकार की जीरो टॉलरेंस पॉलिसी का हिस्सा बताया है. सरकार ने रुख साफ किया है कि किसी भी अधिकारी का पद या रैंक कार्रवाई में बाधा नहीं बनेगा.

हालांकि सरकारी फाइलों और जांच रिपोर्टों के अलावा इस कहानी का दूसरा पक्ष भी है जो कि सराय गांव को लोगों की जिंदगी से जुड़ा है. सराय गांव के प्रधान मनीष कुमार का कहना है कि डंपिंग यार्ड की वजह से लोगों को काफी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ा है. साथ ही खेती नहीं हो पा रही और लोग अपनी जमीन भी बेच पा रहे हैं. उनके कहना है कि घोटाले के सामने के बाद पंचायत के भी कई काम पर असर पड़ा हैं. अब अधिकारी पूरी तरह से सतर्क हो गए, जिसके कारण वैध भूमि उपयोग परिवर्तन आवेदन भी लंबित पड़े हैं.

ग्रामीणों ने की बड़ी मांग

गांव के कुछ लोगों ने जिला प्रशासन से डंपिंग साइट हटाने की मांग की है. उनका साफ कहना है कि इससे उनके स्वास्थ्य और जीवन दोनों पर ही बुरा असर पड़ रहा है और मानसून के समय स्थिति और खराब हो जाकी है. सराय गांव के ही रणवीर सिंह ने कहा कि, मेरे पास 12 बीघा जमीन है, लेकिन डंपिंग साइट होने की वजह से कोई भी जमीन खरीदने को तैयार नहीं है. उन्होंने आगे की साल दर साल परेशान बढ़ रही है और वे परिवार के साथ गांव छोड़ने का भी सोच रहे है.

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