बूढ़ी आंखों में अपनों का इंतजार और पलायन का दर्द, उत्तराखंड के गांव पर बनी फिल्म 'पायर' क्यों कर रही दर्शकों को भावुक?
उत्तराखंड के गांवों में पलायन की समस्या और अकेलेपन की जिंदगी को एक बुजुर्ग दंपती की कहानी के जरिए फिल्म 'पायर' में दिखाया गया है. 1 घंटे 51 मिनट की यह फिल्म सिनेमाघरों में दर्शकों को भावुक कर रही है. किसी को फिल्म देखकर अपनी दादी की याद आ रही है, तो किसी को अपने बूढ़े मां-बाप की वो आंखें याद आ रही हैं, जो आज भी अपनों के इंतजार में घर के दरवाजे की हर एक आहट पर टिकी हैं. फिल्म निर्माता विनोद कापड़ी ने भी सिनेमाघरों के ऐसे ही भावुक कर देने वाले दृश्यों को अपने सोशल मीडिया हैंडल पर साझा किया है.
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उत्तराखंड के एक गांव की कहानी पर बनी फिल्म 'पायर' (Pyre) इन दिनों काफी चर्चा में है. आखिर ऐसा क्या है इस फिल्म में, जो सिनेमाघरों में दर्शकों को भावुक कर रही है? 65 साल साथ बिताने वाले बुजुर्ग दंपती की आंखें आखिर किसके इंतजार में हैं? 18 अवॉर्ड जीतने के बाद भी इस फिल्म को सिनेमाघरों तक पहुंचने के लिए इतना संघर्ष क्यों करना पड़ा? और उत्तराखंड के कुछ गांवों को भूतिया गांव क्यों कहा जाने लगा? ऐसे तमाम सवालों के साथ सोशल मीडिया पर भी फिल्म की खूब चर्चा हो रही है.
टेलीविजन पत्रकार से फिल्म निर्माता बने विनोद कापड़ी ने अपनी फिल्म 'पायर' में एक बुजुर्ग दंपती की प्रेम कहानी के जरिए पहाड़ों की इस हकीकत को दिखाया है. इस जोड़े ने अपनी जिंदगी के 65 साल एक-दूसरे के साथ बिताए हैं, लेकिन पिछले 28 साल से दोनों मुंबई गए अपने बेटे के लौटने का इंतजार कर रहे हैं.
बुजुर्ग दंपती की मोहब्बत, बेटे की राह तकती आंखें और गांव में पसरा सन्नाटा... 1 घंटे 51 मिनट की यह फिल्म दर्शकों को भावुक कर रही है. यह सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि पहाड़ों से हो रहे पलायन और अपनों से दूर गांवों में अकेले रह गए बुजुर्गों की जिंदगी को भी करीब से दिखाती है. यही वजह है कि सोशल मीडिया पर भी फिल्म की तारीफ में कई पोस्ट सामने आ रहे हैं.
पहाड़ों की मुश्किल जिंदगी भी दिखाती है फिल्म
फिल्म में सिर्फ पलायन की वजह से खाली होते गांवों की कहानी नहीं है, बल्कि पहाड़ों में रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की मुश्किलें भी दिखाई गई हैं. जलवायु परिवर्तन की वजह से पहाड़ी इलाकों में मौसम से जुड़ी चुनौतियां भी बढ़ रही हैं. BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, फिल्म में दिखाया गया है कि हिमालय के कई खूबसूरत गांवों में अब गिने-चुने लोग ही रह गए हैं. युवा बेहतर रोजगार और पढ़ाई की तलाश में शहरों में जा चुके हैं. उनके लौटने की उम्मीद में बुजुर्ग अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं. सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो भी सामने आए हैं, जिनमें लोग फिल्म देखने के बाद सिनेमाघरों से बाहर निकलते वक्त भावुक नजर आ रहे हैं. कुछ दर्शक तो अपने आंसू भी नहीं रोक पा रहे हैं.
आम ग्रामीणों ने निभाए फिल्म के मुख्य किरदार
इस फिल्म की एक खास बात इसके कलाकार भी हैं. इसमें मुख्य किरदार निभाने वाले दोनों लोग पेशेवर कलाकार नहीं हैं. उन्होंने असल जिंदगी में पहले कभी कैमरे के सामने एक्टिंग नहीं की थी. फिल्म में पदम सिंह का किरदार विनोद कापड़ी के चाचा पदम सिंह ने निभाया है, जबकि तुलसी के किरदार में हीरा देवी नजर आती हैं. पहाड़ों में बुजुर्गों को प्यार से 'बुबू' और 'आमा' कहा जाता है. ये दोनों उत्तराखंड के एक छोटे से पहाड़ी गांव में रहते हैं. फिल्म में उनकी जिंदगी को काफी करीब से दिखाया गया है. यहां न पक्की सड़क है और न ही बिजली की सुविधा. तुलसी को जब भी अस्पताल ले जाने या किसी मदद की जरूरत पड़ती है तो पदम सिंह पड़ोसियों को बुलाने के लिए एक पारंपरिक लंबे सींग वाले वाद्ययंत्र का इस्तेमाल करते हैं. मदद करने वाले पड़ोसियों को वह बदले में बकरियां देते हैं.
28 साल से बेटे के लौटने का इंतजार
फिल्म की पूरी कहानी पदम सिंह और तुलसी के इर्द-गिर्द घूमती है. दोनों ने अपनी जिंदगी के 65 साल एक-दूसरे के साथ बिताए हैं. लेकिन पिछले 28 साल से उन्हें अपने बेटे हरिया का इंतजार है. हरिया काम की तलाश में मुंबई चला गया था. इतने साल बाद भी वापस नहीं लौटा. विनोद कापड़ी ने BBC को बताया कि यह फिल्म साथ निभाने, अकेलेपन और इंतजार की कहानी है. कहानी में एक मोड़ तब आता है, जब इतने साल बाद बेटे का एक खत आता है. इस खत में उसके घर लौटने की तारीख लिखी होती है. इसके बाद बुजुर्ग जोड़ा बेटे के आने के दिन गिनने लगता है. इस बीच गांव के दूसरे लोग भी धीरे-धीरे वहां से जा चुके हैं.
एक दिन एक ग्रामीण पदम सिंह को सलाह देता है कि उन्हें भी तुलसी के साथ गांव छोड़ देना चाहिए. उसका कहना है कि अगर दोनों में से किसी की मौत हो गई तो शव को पहाड़ से नीचे ले जाने के लिए चार लोग भी नहीं मिलेंगे. आसपास कोई मदद करने वाला नहीं बचता तो पदम सिंह अपने घर के बाहर ही दो चिताएं तैयार कर लेते हैं. एक अपनी पत्नी के लिए और दूसरी अपने लिए. जब तुलसी उनसे ऐसा करने की वजह पूछती हैं तो पदम सिंह कहते हैं कि अगर वह पहले चली गईं तो वह उन्हें पहाड़ से नीचे कैसे ले जाएंगे. फिल्म का यह हिस्सा अकेलेपन और पलायन के दर्द को काफी करीब से दिखाता है.
2018 में आया था फिल्म बनाने का विचार
विनोद कापड़ी ने अपने एक्स पोस्ट में बताया कि जून 2018 में उनकी मुलाकात मुनस्यारी में 84 साल के केसर सिंह और उनकी पत्नी से हुई थी. इस बुजुर्ग जोड़े की जिंदगी, उनका अकेलापन और बेटे के लौटने का इंतजार कापड़ी को काफी प्रभावित कर गया. इसी मुलाकात से उन्हें 'पायर' बनाने का विचार आया. कापड़ी के मुताबिक, उन्होंने बुजुर्ग जोड़े से पूछा था कि उन्हें सबसे ज्यादा चिंता किस बात की रहती है. इस पर बुजुर्ग ने कहा कि अगर वह पहले दुनिया से चले गए तो उनकी पत्नी का ख्याल कौन रखेगा, क्योंकि उन्हें खाना बनाना नहीं आता. वहीं उनकी पत्नी को भी यही चिंता थी कि अगर वह पहले चली गईं तो उनके पति के लिए खाना कौन बनाएगा. इस बातचीत ने कापड़ी को भीतर तक छू लिया.
विनोद कापड़ी ने BBC को बताया कि शुरुआत में उन्होंने असली बुजुर्ग जोड़े के साथ फिल्म बनाने की कोशिश की थी, लेकिन करीब एक हफ्ते की शूटिंग के बाद उन्हें लगा कि यह तरीका काम नहीं करेगा. इसके बाद उन्होंने नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक से भी संपर्क किया. कापड़ी के मुताबिक, नसीरुद्दीन शाह को कहानी पसंद आई, लेकिन उन्हें लगा कि वे और रत्ना पाठक उस इलाके के नहीं हैं, इसलिए इन किरदारों को निभाने के लिए स्थानीय लोगों को लेना बेहतर होगा. आखिरकार पदम सिंह और हीरा देवी को फिल्म के मुख्य किरदारों के लिए चुना गया.
18 अवॉर्ड जीतने के बाद भी रिलीज के लिए करना पड़ा संघर्ष
विनोद कापड़ी ने अपने 30 अक्टूबर के एक्स पोस्ट में फिल्म को बनाने से लेकर रिलीज करने तक के संघर्ष के बारे में भी बताया. उनके मुताबिक, कई फिल्म स्टूडियो और OTT प्लेटफॉर्म्स ने यह कहकर फिल्म बनाने या रिलीज करने से इनकार कर दिया कि गांव के आम लोगों और एक बुजुर्ग जोड़े की कहानी वाली फिल्म का आज कोई भविष्य नहीं है. कापड़ी ने बताया कि एक निर्माता फिल्म बनाने के लिए तैयार हुए और शूटिंग भी शुरू हो गई, लेकिन फिल्म पूरी होने से पहले ही उन्होंने अपने हाथ पीछे खींच लिए और पैसे वापस मांग लिए.
ऐसे में फिल्म पूरी करने के लिए कापड़ी को अपनी जमा पूंजी, म्यूचुअल फंड, जमीन और यहां तक कि अपनी कार भी बेचनी पड़ी. कापड़ी के मुताबिक, फिल्म पूरी होने के बाद उसे अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स तक पहुंचाने में भी मुश्किलें आईं. एक सेल्स एजेंट ने दुनिया भर के फिल्म फेस्टिवल्स में फिल्म पहुंचाने का भरोसा दिया था, लेकिन बाद में उसने भी हाथ खड़े कर दिए. इसके बाद कापड़ी और अरिंद्र राय चौधरी ने खुद फिल्म को फेस्टिवल्स तक पहुंचाने की जिम्मेदारी संभाली.
विनोद कापड़ी के मुताबिक फिल्म का चयन 28वें Tallinn Black Nights Film Festival में हुआ, जहां इसे वर्ल्ड प्रीमियर के दौरान Best Film – Audience Award मिला. कापड़ी ने अपने पोस्ट में बताया कि फिल्म करीब 28 अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाई गई और इसने कुल 18 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते, जिनमें 15 Best Film Awards शामिल हैं.
गुलजार और ऑस्कर विजेताओं ने भी दिया साथ
फिल्म की एक और खास बात यह है कि इसके साथ ऑस्कर विजेता कलाकार और दूसरे बड़े नाम भी जुड़े हैं. ऑस्कर विजेता संगीतकार माइकल डाना ने फिल्म का संगीत तैयार किया है. वहीं गुलजार ने इसके लिए गाना लिखा. जर्मन एडिटर और ऑस्कर विजेता एडिटर पेट्रीशिया रोमल ने भी बिना किसी फीस के फिल्म की एडिटिंग में सहयोग किया.
इतने बड़े नामों के जुड़ने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार मिलने के बाद भी फिल्म को भारत में रिलीज करने के लिए कोई स्टूडियो या OTT प्लेटफॉर्म तैयार नहीं हुआ. कापड़ी ने अपने पोस्ट में इस बात पर निराशा भी जताई थी. आखिरकार अरिंद्र राय चौधरी की कोशिशों से लंदन में रहने वाले सुरेश जोशी तक फिल्म पहुंची. कापड़ी ने बताया कि फिल्म देखने के बाद सुरेश जोशी ने इसे सपोर्ट करने का फैसला किया. उनके सहयोग से फिल्म भारतीय सिनेमाघरों तक पहुंच सकी.
सिनेमाघरों में छलकीं दर्शकों की आंखें
फिल्म पायर को देखने के बाद क्या युवा क्या बुजुर्ग सभी की आंखें छलक जा रहा हैं. खुद निर्माता विनोद कापड़ी ने अपने इंस्टा पर एक वीडियो शेयर किया है.
