नेटफ्लिक्स की सीरीज 'मटरगश्ती' में राजस्थान के युवा संगीतकार का धमाल, सभी 7 गानों और बैकग्राउंड स्कोर से जीता दिल
नेटफ्लिक्स की नई सीरीज 'मटरगश्ती' में अपने म्यूजिक का जलवा बिखेरने वाले म्यूजिक डायरेक्टर (संगीतकार) अभिनव आर. कौशिक (Abhinav R Kaushik) की कहानी. जानिए कैसे नीलामी में छूटे एक पुराने हारमोनियम ने बदल दी उनकी जिंदगी.
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ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर हाल ही में रिलीज हुई बहुचर्चित वेब सीरीज 'मटरगश्ती' के गानों और बैकग्राउंड स्कोर की गूंज इस वक्त हर तरफ है. इस सीरीज की सबसे खास बात यह है कि इसके सभी 7 गानों और पूरे बैकग्राउंड स्कोर को अपनी धुनों से सजाने वाले संगीतकार राजस्थान के अलवर से ताल्लुक रखने वाले अभिनव आर. कौशिक एक हैं. 'टैन ऑन टैन बैडी' (10/10 Baddie) जैसे ट्रेंडी गानों से लेकर पिता-पुत्री के जज्बातों को छू लेने वाले ट्रैक्स तक, उनकी धुनों ने इस सीरीज को बेहद खास बना दिया है.
पंकज त्रिपाठी से अनूठी जुगलबंदी और दिग्गजों संग काम
अभिनव बॉलीवुड के मंझे अभिनेता पंकज त्रिपाठी के पारिवारिक गणेश उत्सव के लिए पिछले 4 सालों से लगातार आधिकारिक गीत तैयार कर रहे हैं. इसके अलावा वे सुखविंदर सिंह, कैलाश खेर, शान और हरिहरन जैसे देश के दिग्गज गायकों के साथ भी काम कर चुके हैं. अब तक 250 से ज्यादा कमर्शियल विज्ञापनों में संगीत देने के बाद, नेटफ्लिक्स की 'मटरगश्ती' उनके करियर का अब तक का सबसे बड़ा मील का पत्थर (Milestone) साबित हो रही है.
इंजीनियरिंग की डिग्री घर छोड़ संगीत की धुन में निकले मुंबई
मूल रूप से राजस्थान के ऐतिहासिक शहर अलवर के रहने वाले इस संगीतकार का परिवार शिक्षा और अनुशासन के माहौल से जुड़ा रहा है. माता-पिता दोनों शिक्षक रहे हैं. पिता को पेंटिंग का शौक था और नानाजी एक प्रधानाध्यापक थे.
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नीलामी में छूटे हारमोनियम ने अभिनव को दिखाया रास्ता
इस सफर में टर्निंग पॉइंट तब आया जब नानाजी के स्कूल से नीलामी में छूटा हुआ एक पुराना हारमोनियम उनके घर पहुंचा. बड़े भाई के समर कैंप के लिए आया वह हारमोनियम धीरे-धीरे उनके हाथों का खिलौना और फिर ज़िंदगी का सबसे बड़ा मकसद बन गया. ग्यारहवीं-बारहवीं क्लास में आते-आते उन्होंने ठान लिया था कि वे अपनी ज़िंदगी सिर्फ संगीत के नाम करेंगे.
परिवार की खुशी के लिए की इंजीनियरिंग, पर दिल में था संगीत
चूंकि पूरा परिवार शिक्षा के क्षेत्र में था, इसलिए घरवालों की इच्छा थी कि कम से कम एक प्रोफेशनल डिग्री हाथ में होनी चाहिए. उनकी बात का मान रखते हुए उन्होंने अलवर से ही मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की, लेकिन कॉलेज की चार दीवारों के भीतर असली खेल कुछ और ही चल रहा था! इंजीनियरिंग उनके लिए महज एक औपचारिकता थी और असली फोकस संगीत पर था.
पढ़ाई के दिनों में वे साल में एक बार कलकत्ता जाकर अपने गुरुजी के सानिध्य में 15-20 दिन रहकर हिन्दुस्तानी क्लासिकल वोकल्स सीखते थे. वहीं, वेस्टर्न क्लासिकल की बारीकियां सीखने के लिए वे दिल्ली के 'दिल्ली स्कूल ऑफ म्यूजिक' (चाणक्यपुरी) का रुख करते थे.
2017 में मुंबई का रुख और 'गबरू गैंग' का पहला ब्रेक
मार्च 2017 में इंजीनियरिंग खत्म होते ही उन्होंने साफ कह दिया- "अब न कोई पढ़ाई, न नौकरी, अब सिर्फ मुंबई और म्यूजिक !"
जून 2017 में मुंबई पहुंचकर उन्होंने विज्ञापनों (Advertising) के लिए संगीत बनाना शुरू किया. शंकर महादेवन जैसे दिग्गजों के साथ काम करते हुए उन्होंने लगभग 250 से ज़्यादा विज्ञापनों में अपना हुनर दिखाया. आखिरकार साल 2018 में लोखंडवाला में फिल्म निर्देशक समीर खान से मुलाकात हुई, जहां उन्होंने अपने बनाए गाने सुनाए और उन्हें अपनी पहली फीचर फिल्म 'गबरू गैंग' में बतौर म्यूजिक कंपोजर पहला बड़ा ब्रेक मिल गया.
