यूक्रेन युद्ध से भारत के लिए सबक, विदेशी सैटेलाइट इंटरनेट पर निर्भरता क्यों है जोखिम?
यूक्रेन युद्ध में स्टारलिंक पर निर्भरता को लेकर उठे सवाल भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अहम हैं. जानिए सैटेलाइट इंटरनेट, किल स्विच और स्वदेशी तकनीक की भूमिका.
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न्यूज़ हाइलाइट्स
यूक्रेन के युद्धक्षेत्र में सैटेलाइट इंटरनेट की भूमिका
विदेशी नेटवर्क पर नियंत्रण का सवाल
यूक्रेन के युद्ध क्षेत्र से आई नई रिपोर्ट्स ने पूरी दुनिया को एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया है.आधुनिक जंग अब सिर्फ बंदूक और गोले की नहीं, बल्कि इंटरनेट, सिग्नल और डेटा की भी है.और इस मामले में विदेशी कंपनियों पर बहुत ज्यादा भरोसा करना कितना जोखिम भरा हो सकता है, यह बात अब साफ हो गई है.
क्या हुआ यूक्रेन के मोर्चे पर?
पिछले दो साल से यूक्रेन की सेना सैटेलाइट इंटरनेट पर बहुत ज्यादा निर्भर रही है.तोपखाने की गोलीबारी ठीक से निशाना लगाने, जवानों से कमांड सेंटर तक बात करने और खासकर सस्ते FPV ड्रोन चलाने के लिए यही नेटवर्क काम आ रहा था, लेकिन हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब टर्मिनल या ड्रोन 160 किलोमीटर प्रति घंटे से तेज चलने लगते हैं, तो कनेक्शन अचानक कट जाता है.यानी स्पीड कैप लगा दी गई. इसका सीधा असर यह पड़ा: तेज उड़ने वाले हमलावर ड्रोन आसानी से दुश्मन की एयर डिफेंस से बच नहीं पाते. दुश्मन के तेज ड्रोन को हवा में मार गिराने वाले इंटरसेप्टर ड्रोन भी बेकार हो जाते हैं, क्योंकि उनकी रफ्तार 200-400 किमी प्रति घंटा होनी चाहिए.160 किमी पर सिग्नल चले गए तो ड्रोन दिशाहीन होकर गिर पड़ता है. बिना किसी बम या मिसाइल के, सिर्फ सॉफ्टवेयर के एक बदलाव ने सैन्य क्षमता को कमजोर कर दिया.
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तीन बड़े सबक
पहला: किल स्विच का खतरा.अगर तकनीक का पूरा नियंत्रण किसी विदेशी कंपनी के हाथ में है, तो जरूरत पड़ने पर वह सेवा बंद या सीमित कर सकती है.आपके पास मोलभाव करने का समय भी नहीं बचता.
दूसरा: साझेदार अलग, सहयोगी अलग.कारोबारी रिश्ते कभी स्थायी सैन्य गारंटी नहीं होते.राजनीति या व्यापार बदलते ही सप्लाई चेन पर दबाव आ जाता है.
तीसरा: कंपनी की प्राथमिकता.कोई भी बड़ी कंपनी अंत में अपने देश, अपने शेयरधारकों और अपने बड़े ग्राहकों के हित देखती है.दूसरे देश की सुरक्षा उसके लिए प्राथमिकता नहीं होती.
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भारत की नीति सही साबित हुई
जब कई लोग भारत पर दबाव डाल रहे थे कि विदेशी सैटेलाइट इंटरनेट कंपनियों को जल्दी एंट्री दे दो, तब भारत ने सुरक्षा को प्राथमिकता दी.साफ शर्तें रखीं, डेटा भारत की सीमा के अंदर ही रहे. आपातकाल में नेटवर्क पर नियंत्रण कैसे रहेगा, यह साफ हो. विदेशी कंपनियों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय इसरो और भारतीय स्पेस स्टार्टअप्स को बढ़ावा दिया जाए. आज यूक्रेन की घटना देखने के बाद लगता है कि भारत की यह सतर्कता संरक्षणवाद नहीं, बल्कि दूरदर्शिता थी.रक्षा और महत्वपूर्ण संचार व्यवस्था को बाहरी हाथों में सौंपना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जोखिम भरा हो सकता है.
21वीं सदी की जंग बैंडविड्थ, सिग्नल और डेटा सिक्योरिटी की भी है.यूक्रेन का यह अनुभव हर देश के लिए चेतावनी है.भारत का लक्ष्य यही होना चाहिए कि स्पेस-बेस्ड कम्युनिकेशन पूरी तरह अपने नियंत्रण में रहे, ताकि सेना को किसी विदेशी प्लेटफॉर्म की दया पर निर्भर न रहना पड़े.
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