मुख्तार अंसारी जिसका पूर्वांचल में कभी चलता था हंटर, हार्ट अटैक से हुई मौत, जानिए उसकी कहानी

अभिषेक गुप्ता

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Mukhtar Ansari
Mukhtar Ansari (File Photo)
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Mukhtar Ansari: माफिया डॉन से राजनेता बने मुख्तार अंसारी (63 साल) की 28 मार्च यानी बीती रात को मौत हो गई. मुख्तार उत्तर प्रदेश के बांदा की जेल में बंद था. गुरुवार शाम उसकी तबीयत बिगड़ी और बेहोशी की हालत में हॉस्पिटल ले जाया गया. वहां नौ डाक्टरों की टीम ने उसका इलाज किया लेकिन जान नहीं बच सकी. डॉक्टर्स का कहना है कि, दिल का दौरा पड़ने से मुख्तार की मौत हुई है. वैसे आपको बता दें कि, गैंगस्टर मुख्तार अंसारी के खिलाफ 65 केस दर्ज हैं. इनमें हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण, धोखाधड़ी, गुंडा एक्ट, आर्म्स एक्ट, गैंगस्टर एक्ट, सीएलए एक्ट से लेकर NSA तक शामिल है. उस पर चल रहे 8 मामलों में सजा हो चुकी थी और 21 केस विचाराधीन थे. मुख्तार अंसारी पिछले 19 सालों से जेल में था, उसे अलग-अलग मामलों के तहत 2 बार उम्रकैद की सजा भी हो चुकी थी. आइए आपको विस्तार से बताते हैं पूर्वांचल के माफिया मुख्तार के जरायम की कहानी. 

मुख्तार अंसारी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के मोहम्मदाबाद तहसील का रहने वाला था. वो पांच बार विधायक तो रहा लेकिन उसने अपने गृह विधानसभा सीट मोहम्मदाबाद से कभी चुनाव नहीं लड़ा. वो गाजीपुर सदर और मऊ सदर सीट पर ही अपना भाग्य आजमाता रहा. खैर गाजीपुर में तो उसकी नहीं चल पाई लेकिन बगल का जिला मऊ मुस्लिम बाहुल्य होने की वजह से उसने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया. यही से वो दो बार निर्दलीय और तीन बार जेल में रहते हुए चुनाव जीता और साल 2022 तक विधायक रहा. फिर ये सीट उसने अपने बड़े बेटे अब्बास अंसारी को सौंप दी जो वर्तमान में वहां से विधायक है. हालांकि आर्म्स ऐक्ट के तहत दर्ज मुकदमे में अभी वो भी सलाखों के पीछे है. 

मुख्तार पर साल 2005 में दर्ज हुआ था पहला केस

मुख्तार साल 2005 में पहली बार तब जेल गया, जब उस पर मऊ दंगे भड़काने का आरोप लगा. उसके ठीक एक महीने बाद 29 नवंबर 2005 को बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय समेत लोगों को गोलियों से भून दिया गया था. आरोप मुख्तार और उसके भाई अफजाल अंसारी पर लगा. इन दोनों घटनाओं के बाद से मुख्तार कभी जेल से बाहर नहीं आ सका. यहां तक कि, वो इस बीच पांच बार विधायक भी रहा. लेकिन, जेल में ही जनता दरबार से लगाकर अपनी 'सरकार' चलाता रहा.

साल 2005 में यूपी में दो बड़ी वारदात हुई थीं, जिनमें मुख्तार अंसारी का नाम सामने आया और इन घटनाओं ने हर किसी को हिलाकर रख दिया. पहला मामला मऊ दंगों से जुड़ा है. वहां भरत मिलाप के दौरान दंगे भड़क गए थे. दरअसल, मुख्तार का एक कथित वीडियो सामने आया था, जिसमें वो जिप्सी में अपने हथियारबंद गुर्गों के साथ दंगा प्रभावित इलाके में घूमते दिखाई दिया था. मऊ दंगे के वक्त ही मुख्तार की एके-47 के साथ खुली जीप में तस्वीर वायरल हुई थी. हालांकि उसका कहना था कि वो लोगों को समझा रहे थे. मऊ सदर सीट से मुख्तार निर्दलीय विधायक चुना गया था लेकिन तत्कालीन सपा सरकार में उसे संरक्षण प्राप्त था. इस मामले में मुख्तार ने 25 अक्टूबर 2005 को गाजीपुर में सरेंडर कर दिया था, जिसके बाद से वो जेल में बंद है. 

इसके ठीक एक महीने बाद 29 नवंबर को बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय की हत्या कर दी गई. उनके साथ 6 लोग और मारे गए. हमलावरों ने 400 राउंड फायरिंग की. इस हत्याकांड में भी मुख्तार को मुख्य आरोपी बनाया गया और कहा गया कि मुख्तार ने जेल में बैठे-बैठे कृष्णानंद की हत्या कर पुरानी दुश्मनी का बदला लिया है. हालांकि, सीबीआई ने मामले की जांच की और स्पेशल कोर्ट से मुख्तार बरी हो गया. कोर्ट ने गैंगस्टर मामले में दोषी पाया और 10 साल की सजा और जुर्माना सुनाया.

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2001 में बाल-बाल बचा था मुख्तार 

मुख्तार अंसारी पहली बार 1996 में मऊ सीट से बसपा विधायक चुना गया. बात 15 जुलाई 2001 की है. मुख्तार का काफिला मऊ से गाजीपुर स्थित अपने पैतृक घर मुहम्मदाबाद के लिए निकला. रास्ते में उसरी चट्टी के पास ट्रक में सवार हमलावरों ने मुख्तार को टारगेट बनाया और गोलियों की बरसात कर दी. घटना में मुख्तार के सरकारी गनर और प्राइवेट गनर समेत 3 लोग मारे गए. कहा जाता है कि मुख्तार के वाहन से भी गोली चलाई गई और हमलावरों में से एक मनोज राय मौके पर ढेर हो गया. इस मामले में मुख्तार के जानी दुश्मन ब्रजेश सिंह और त्रिभुवन सिंह के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई गई. ब्रजेश की मुख्तार से दुश्मनी इसलिए थी, क्योंकि मुख्तार उसके दुश्मन साधू सिंह का करीबी थी. साधू सिंह के परिवार की दुश्मनी एक जमीन के टुकड़े को लेकर ब्रजेश सिंह के परिवार से हो गई थी. यह अदावत समय के साथ हत्याएं होने से बढ़ती गई. 

दूसरी वजह यह थी कि, 1990 में गाजीपुर के सरकारी ठेकों पर ब्रजेश सिंह गैंग ने कब्जा करना शुरू कर दिया था, लेकिन मुख्तार अंसारी के गिरोह ये ठेके छीनने शुरू कर दिए थे. कहा जाता है कि मुख्तार पर अटैक के बाद ही ब्रजेश सिंह ने इलाका छोड़ दिया और फिर मुंबई पहुंचा. वहां सुभाष ठाकुर और इसके बाद दाऊद से मिला. दाऊद के जीजा की हत्या का बदला लेने के लिए जेजे हत्याकांड हुआ, जिसमें ब्रजेश का नाम आया. ब्रजेश सिंह को 2008 में ओडिशा से गिरफ्तार किया गया.

कृष्णानंद ने ढहा दिया था अंसारी परिवार का किला

मुख्तार का राजनीतिक प्रभाव बढ़ता जा रहा था और ब्रजेश सिंह उसे कमजोर करने के प्लान पर काम कर रहा था. इस बीच, गाजीपुर में एक नया लड़का अपनी जगह बना रहा था. नाम था कृष्णानंद राय. ब्रजेश अमूमन भूमिगत रहकर काम करता था. ब्रजेश को जिस एक चेहरे की जरूरत थी, वो कमी कृष्णानंद राय ने पूरी कर दी. चूंकि मुख्तार के भाई अफजाल गाजीपुर की मुहम्मदाबाद सीट से चुनाव जीत रहे थे और मुख्तार का मुस्लिम बहुल मऊ सीट पर प्रभाव था. ऐसे में कृष्णानंद के लिए मऊ सीट सेफ नहीं थी. लेकिन मुहम्मदाबाद से लगातार चुने जाते रहे उनके भाई अफजाल को घेरना आसान था. क्योंकि वहां मुस्लिम आबादी 10 फीसदी ही थी. कृष्णानंद राय ने यहीं से मुख्तार के परिवार को चुनौती दे दी. 2002 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अफजाल अंसारी को हरा दिया और बीजेपी विधायक चुने गए.

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मऊ हिंसा के बाद मुख्तार ने किया था सरेंडर

इधर, उसी साल यानी 2002 में ही मुख्तार मऊ से विधायक चुने गए. उसने ब्रजेश सिंह और कृष्णानंद को बर्बाद करने की तमाम कोशिशें शुरू कर दीं. मुख्तार ने सबसे पहले उस शख्स की पहचान की, जिसने उस पर गोली चलाई थी. मुख्तार गैंग ने गाजीपुर के सैदपुर में सरेबाजार अनिल समेत तीन लोगों की हत्या कर दी. इस बीच, मऊ दंगों में मुख्तार पर शिकंजा कसा गया और उसने 25 अक्टूबर 2005 को सरेंडर कर दिया. उस पर हिंसा भड़काने का आरोप था. उसे गाजीपुर जेल भेजा गया. वहां जेल में बैठे-बैठे उसने कृष्णानंद राय की हत्या की प्लानिंग बनाना शुरू किया. इसमें उसका साथ मुन्ना बजरंगी और उसके साथियों ने दिया.  

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जिस अफसर ने कसा शिकंजा, उसे देना पड़ा इस्तीफा?

कृष्णानंद राय बुलेट प्रूफ गाड़ी से चला करते थे. उन्हें ब्रजेश सिंह का बैकअप था. इस बीच, आरोप लगा कि मुख्तार आर्मी के एक भगोड़े से एलएमजी खरीदने की कोशिश में लगा है. उस पर पोटा के तहत केस दर्ज करने वाले एसटीएफ में डिप्टी एसपी शैलेंद्र सिंह ने दावा किया कि, उन्होंने मुख्तार को यह कहते हुए सुना था कि कृष्णानंद राय की बुलेट प्रूफ गाड़ी सामान्य राइफल से नहीं भेदी जा सकती, इसलिए एलएमजी का इंतजाम करना है. इसके लिए 1 करोड़ में सौदा तय हो रहा था. शैलेंद्र सिंह ने केस तो दर्ज कर एलएमजी भी बरामद कर ली लेकिन मुख्तार को गिरफ्तार करने की उनकी हसरत अधूरी रह गई. साथ ही उन पर इतना दबाव पड़ा कि उन्हें इस्तीफा देना पड़ा और उन पर मुकदमे भी लाद दिए गए. 

पांच बार विधायक रहा मुख्तार 

मुख्तार अंसारी ने 1995 में पहली बार गाजीपुर सदर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था. यह चुनाव उसने जेल में रहते हुए कम्युनिस्ट पार्टी के चुनाव चिह्न पर लड़ा था. हालांकि वो यह चुनाव हार गया था. उसके बाद मुख्तार 1996 में बीएसपी में शामिल हो गया. वो गाजीपुर का बीएसपी का जिला अध्यक्ष बनाया गया फिर उसी साल मऊ सदर सीट से उसे चुनाव टिकट दे दिया गया जहां वो पहली बार चुनाव जीता. फिर 2002 और 2007 में उसने निर्दलीय चुनाव जीता था. वो 2017 तक लगातार चुनाव जीता. मुख्तार ने अपने आखिरी तीन चुनाव जेल में रहते हुए जीते थे. 2022 में मुख्तार ने अपनी राजनीतिक विरासत बड़े बेटे अब्बास अंसारी को सौंप दी थी.

परिवार पर दर्ज हैं 100 से ज्यादा केस

मुख्तार अंसारी समेत उसके परिवार पर 101 केस दर्ज हैं. अकेले मुख्तार अंसारी पर कई जिलों में हत्या के 8 मुकदमे समेत 65 मामले दर्ज हैं और वो बांदा जेल में बंद था. भाई अफजाल अंसारी पर 7 मामले, भाई सिगबतुल्लाह अंसारी पर 3 केस, मुख्तार अंसारी की पत्नी अफसा अंसारी पर 11 मुकदमे, बेटे अब्बास अंसारी पर 8 तो छोटे बेटे उमर अंसारी पर 6 केस दर्ज हैं. मुख्तार अंसारी की बहू निखत पर 1 मुकदमा दर्ज है.

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