राजिंदर कौर को जमानत दे HC ने कहा- चारदीवारी में जातिसूचक टिप्पणी अपराध नहीं! पूरा केस जानिए

अभिषेक गुप्ता

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SC/ST Act News: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC/ST) ऐक्ट को लेकर एक अहम फैसला दिया है. कोर्ट ने SC/ST एक्ट के आरोप वाले केस में एक महिला को जमानत दी है. कोर्ट ने कहा है कि चारदीवारी में या प्राइवेट प्लेस पर किसी व्यक्ति के अपमान या धमकी को SC/ST ऐक्ट के तहत अपराध नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने कहा कि जब तक अपमान की मंशा के साथ किसी सार्वजनिक स्थान पर कुछ नहीं किया जाता तब तक वह अपराध नहीं माना जाएगा. 2020 में सुप्रीम कोर्ट का एक जजमेंट हाई कोर्ट के इस हालिया फैसले के लिए नजीर बना है. आइए आपको ये पूरा केस बताते हैं.

क्या है पूरा मामला

राजिंदर कौर नाम की एक महिला ने पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल की थी. महिला के पति पर आरोप था कि उसने सेवक सिंह नाम के शख्स को कार से कुचलकर मार डाला. राजिंदर कौर पर आरोप था कि उन्होंने एक बैंक्वेट हॉल खरीदने को लेकर हुए इस विवाद में मृतक सेवक सिंह की औकात पर सवाल उठाते हुए जातिवादी टिप्पणी की थी. उनके ऊपर हत्या और SC/ST ऐक्ट के तहत मामला दर्ज था. राजिंदौर कौर ने अपनी याचिका में हाई कोर्ट से कहा कि उनके पति पर सेवक सिंह को कार से कुचलकर हत्या करने का आरोप है. सभी मामले उनके पति पर हैं. उसमें उनकी कोई भूमिका नहीं है. इसी मामले पर सुनवाई के दौरान पंजाब हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया.

हाई कोर्ट ने फैसले में क्या कहा

कोर्ट ने कहा कि, घटना बैंक्वेट हॉल में हुई थी जब केवल शिकायतकर्ता, याचिककर्ता और उसके परिवार के लोग मौजूद थे. ऐसे में यह मामला सार्वजनिक स्थान का नहीं है. अब बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसी सिचूऐशन में SC/ST ऐक्ट के तहत मामला बनता है की नहीं? इसी पर फैसला देते हुए कोर्ट ने कहा कि SC/ST ऐक्ट के तहत किसी व्यक्ति को दंड का भागी बनाने के लिए घटनास्थल का सार्वजनिक स्थान होना आवश्यक है. कोर्ट ने आगे कहा कि इस बात के भी कोई सबूत नहीं हैं कि याचिककर्ता ने किसी जाति विशेष का नाम लिया और उसे मृतक सेवक सिंह की जाति के बारे में पता था. कोर्ट ने ‘हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड सरकार’ के मामले में सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का जिक्र करते हुए फैसला सुनाया.

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हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड सरकार मामले में क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला

‘हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड सरकार’ मामले में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एल नागेश्वर राव, हेमंत गुप्ता और अजय रस्तोगी की पीठ ने 2020 में ये माना था कि, किसी चारदीवारी के भीतर अनुसूचित जाति और जनजाति के व्यक्ति का अपमान करना या डराना SC/ST ऐक्ट के तहत अपराध नहीं है. फैसले में पीठ ने साफ शब्दों में कहा था कि, इस ऐक्ट के तहत कोई भी मामला केवल इस बात से नहीं दर्ज किया जा सकता की अपीलकर्ता अनुसूचित जाति का है.

SC/ST एक्ट पर एक पुराने फैसले ने मचाया था बवाल

पिछले अनुभवों को देखें तो SC/ST एक्ट का मामला संवेदनशील नजर आता है. मार्च 2018 में एक फैसले के दौरान एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताई थी. तब सुप्रीम कोर्ट ने इसके मामलों में तुरंत गिरफ्तारी की बजाए शुरुआती जांच की बात कही थी. सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सात दिनों के भीतर जांच की बात कही थी. इसके बाद देशभर में बवाल मच गया. इस फैसले के बाद दलित संगठन और लोग सड़क पर उतर गए. भारत बंद बुलाया गया. बड़े पैमाने पर हिंसा हुई, लोगों की मौत भी हुई. बाद में अगस्त 2018 में केंद्र सरकार ने SC/ST एक्ट में संशोधन कर एक तरह से सुप्रीम कोर्ट का फैसला ही पलट दिया.

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