कौन हैं एसएस अहलूवालिया जिन्हें बीजेपी ने शत्रुघन सिन्हा के खिलाफ आसनसोल से उतारा चुनावी मैदान में
बीजेपी एसएस अहहूवालिया की दूसरी पार्टी है. पहली पार्टी कांग्रेस थी जहां उन्होंने करीब 20 साल निकाले. राज्यसभा टिकट पाने में नेताओं की उम्र निकल जाती है, 1986 में अहलूवालिया की राजनीति ही राज्यसभा से शुरू हुई थी. वो
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Asansol Lok Sabha seat: एसएस अहलूवालिया 25 साल से बीजेपी में हैं लेकिन उनकी राजनीति में दिलचस्प मोड़ तब आए जब वो कांग्रेस में हुआ करते थे. राजीव गांधी के जमाने के नेता एस एस अहलूवालिया को बीजेपी ने बंगाल की आसनसोल लोकसभा सीट पर शत्रुघन सिन्हा के खिलाफ उम्मीदवार बनाया है. शत्रुघन सिन्हा ने जब से बीजेपी से राजनीति शुरू की थी तब अहलूवालिया कांग्रेस में आए थे.
आसनसोल सीट को लेकर बीजेपी बहुत कन्फ्यूज्ड रही. पहले पवन सिंह को टिकट दिया था लेकिन पवन सिंह ने टिकट लौटाकर बीजेपी की भरपूर किरकिरी कराई. पूरा मार्च महीना कन्फ्यूजन और उम्मीदवार ढूंढने में निकल गया. करीब 40 दिन बाद बीजेपी को आसनसोल से उम्मीदवार मिला- सुरेंद्रजीत सिंह अहलूवालिया जिनका पापुलर नाम है एसएस अहलूवालिया. आसनसोल से अहलूवालिया को टिकट देने से बीजेपी की लिस्ट में सिख उम्मीदवार की कमी भी पूरी हो गई है.
पहले जानिए क्या रही है एसएस अहलूवालिया की सियासत
72 साल की उम्र में एसएस अहलूवालिया पहली बार उस आसनसोल से चुनाव लड़ने जा रहे हैं जहां उनका 1951 में उनका जन्म हुआ था. 60 साल के हुए तो पहली बार लोकसभा चुनाव लड़कर जीते. जिस पार्टी में करीब 20 साल रहे उससे कोई लोकसभा या विधानसभा चुनाव नहीं लड़े. 1999 में बीजेपी में आने के बाद पहली बार 2014 में लोकसभा चुनाव लड़े थे. वैसे कुल मिलाकर 32 साल संसद में गुजार चुके हैं. अबकी बार जीतकर आए तो 37 की गारंटी रहेगी.
बीजेपी एसएस अहहूवालिया की दूसरी पार्टी है. पहली पार्टी कांग्रेस थी जहां उन्होंने करीब 20 साल निकाले. राज्यसभा टिकट पाने में नेताओं की उम्र निकल जाती है, 1986 में अहलूवालिया की राजनीति ही राज्यसभा से शुरू हुई थी. वो दौर कांग्रेस में राजीव गांधी का हुआ करता था. अहलूवालिया राजीव की टीम के सदस्य माने जाते थे. राजीव गांधी के जाने के बाद भी अहलूवालिया नरसिम्हा राव वाली कांग्रेस में एडजस्ट हो गए. नरसिम्हा राव की सरकार में मंत्री भी बने. 1986 से लगातार बिना ब्रेक राज्यसभा के रास्ते संसद पहुंचे रहे.
समय बदलना शुरू हुआ नरसिम्हा राव का दौर खत्म होने के बाद. सीताराम केसरी और सोनिया गांधी के के दौर में एसएस अहलूवालिया की पूछ नहीं के बराबर नहीं रही. न संसद में रहे, न कांग्रेस पार्टी में कोई अहमियत थी. 1997 में इंडिया टुडे में छपे आर्टिकल में वरिष्ठ पत्रकार जफर आगा ने लिखा था कि कांग्रेस में साइडलाइन होने के बाद नरसिम्हा राव से नियमित रूप से जो चार-पांच नेता मिलने-जुलने आते रहे, एसएस अहलूवालिया उनमें एक से थे. अंत तक अहलूवालिया के लिए नरसिम्हा राव राव साहब रहे.
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1999 आते-आते कांग्रेस में सब कुछ सोनिया गांधी का था. उसी समय अहलूवालिया ने राजनीतिक निष्ठा बदलकर बीजेपी वाली कर ली. अटल-आडवाणी वाले दौर में अहलूवालिया फिर से राज्यसभा भेजे गए. राज्यसभा एक्सपर्ट के माने जाते थे. 2004 से 2009 तक बीजेपी के चीफ व्हिप, डिप्टी लीडर रहे.
मोदी सरकार आते ही अहलूवालिया की सियासत में आया यूटर्न
एसएस अहलूवालिया की राजनीति में बड़ा यूटर्न आया जब मोदी बीजेपी की केंद्रीय राजनीति में पावरफुल हुए. 2014 में पहली बार अहलूवालिया को लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए कहा गया. सीट मिली दार्जिलिंग. अहलूवालिया जीत के आए तो मोदी सरकार में मंत्री पद मिला. 2019 में अहलूवालिया फिर बंगाल की बर्धमान दुर्गापुर से लड़ाए गए. दूसरा चुनाव भी जीत गए लेकिन मोदी 2.0 में अहलूवालिया को मंत्री बनने का मौका नहीं मिला.
अहलूवालिया को अब बीजेपी से तीसरी बार लोकसभा चुनाव का टिकट मिला है. सीट फिर बदल गई है. बर्धमान दुर्गापुर सीट बंगाल बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष की होती थी जो 2019 में अहलूवालिया को दी गई थी. दिलीप घोष अब मेदिनीपुर से लड़ेंगे. आसनसोल सीट पर अहलूवालिया उतारे गए हैं. वैसे बीजेपी आसनसोल सीट का गढ़ बन चुकी है. 2014 और 2019 में बीजेपी ने आसनसोल सीट पर जीत हासिल की थी। तब पार्टी के नेता बाबुल सुप्रियो जीते थे, लेकिन उनके तृणमूल में चले जाने के बाद उप चुनाव में ममता ने अचानक शत्रुघन सिन्हा को चुनाव लड़ाकर सांसद का चुनाव जिताया था.
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