टाटा ग्रुप में एक बड़ा प्रशासनिक बदलाव (Power Shift) देखने को मिल रहा है. टाटा संस (Tata Sons) के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन ने अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा की है. हालांकि, वे फरवरी में अपना कार्यकाल पूरा होने तक पद पर बने रहेंगे ताकि बोर्ड इस दौरान नया उत्तराधिकारी चुन सके. इस पूरे मामले को समझने के लिए सबसे पहले टाटा ग्रुप के मालिकाना ढांचे (Ownership Structure) और इस्तीफे की मुख्य वजहों को समझना जरूरी है.
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1. टाटा ग्रुप का अनोखा ढांचा (Tata Sons Shareholding Structure)
- टाटा ग्रुप का ढांचा रिलायंस या अडानी जैसी कंपनियों से काफी अलग है, जहां परिवार सबसे बड़ा शेयरहोल्डर होता है.
- टाटा ग्रुप की प्रमोटर कंपनी टाटा संस (Tata Sons) है.
- टाटा संस में टाटा परिवार के पास केवल 3% शेयर हैं.
- सबसे बड़ी 66% हिस्सेदारी 'टाटा ट्रस्ट' (Tata Trusts) के पास है.
- टाटा ट्रस्ट इस हिस्सेदारी से होने वाली आमदनी को शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के कामों में लगाता है.
2. इस्तीफे की मुख्य वजह: नोएल टाटा का विरोध
जब फरवरी में एन चंद्रशेखरन के कार्यकाल विस्तार (Extension Resolution) की बात बोर्ड के सामने आई, तो टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा (रतन टाटा के सौतेले भाई) ने इसका विरोध किया.
चंद्रशेखरन ने लगभग 6 महीने तक इंतजार किया कि उनकी पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव दोबारा आता है या नहीं, लेकिन सहमति न बनते देख उन्होंने आखिरकार ऐलान कर दिया कि वे पद छोड़ रहे हैं.
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मतभेद के मुख्य कारण
नोएल टाटा और एन चंद्रशेखरन के बीच मुख्य रूप से दो बातों पर गंभीर मतभेद थे-
टाटा संस को IPO में लाना या प्राइवेट रखना
रिजर्व बैंक (RBI) के नए नियमों के तहत टाटा संस 'अपर लेयर NBFC' की श्रेणी में आ गई है, जिसके चलते इसका IPO लाना जरूरी हो गया था. चंद्रशेखरन का झुकाव कंपनी का IPO लाने और इसे पब्लिक कंपनी बनाने की तरफ था. वहीं नोएल टाटा का मानना था कि 150 साल से भी अधिक पुरानी होल्डिंग कंपनी टाटा संस को हमेशा की तरह प्राइवेटली हेल्ड कंपनी ही रहना चाहिए. ध्यान देने वाली बात यह है कि टाटा ग्रुप की 26 कंपनियां (जैसे TCS, Tata Motors, Titan, Tisco) पब्लिकली लिस्टेड हैं, लेकिन होल्डिंग कंपनी टाटा संस कभी लिस्टेड नहीं रही.
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एग्रेशिव फैसले और घाटे वाले निवेश
टाटा ग्रुप पारंपरिक रूप से काफी कंजर्वेटिव (रूढ़िवादी) बिजनेस मॉडल के लिए जाना जाता है. लेकिन चंद्रशेखरन के 10 साल के कार्यकाल में कई आक्रामक निवेश किए गए, जैसे Air India की खरीद, BigBasket में निवेश और Tata Digital का विस्तार. चूंकि एन चंद्रशेखरन ने जो एग्रेसिवली इनवेस्टमेंट किया था उसपर रिटर्न नहीं आ रहा था. ऐसे में इन दांवों और नुकसान झेल रहे बिजनेस को लेकर नोएल टाटा लगातार सवाल उठा रहे थे कि इनसे प्रॉफिट कब मिलेगा.
4. एन चंद्रशेखरन का ऐतिहासिक कार्यकाल
करीब 160 साल पुराने टाटा ग्रुप के इतिहास में एन चंद्रशेखरन पहले ऐसे व्यक्ति थे जो गैर-पारसी (Non-Parsi) थे. इससे पहले साइरस मिस्त्री आखिरी पारसी चेयरमैन थे, जिन्हें रतन टाटा ने हटा दिया था. संकट के समय TCS के पूर्व प्रमुख चंद्रशेखरन को यह कमान सौंपी गई थी. चंद्रशेखरन की एंट्री साल 1987 में टीसीएस में प्रोजेक्ट इंटर्न के तौर पर हुई थी. फिर COO, CEO और एमडी तक का सफर तय किया.इसके बाद ये चेयरमैन बनाए गए.
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चंद्रशेखरन के 10 साल के कार्यकाल में टाटा ग्रुप का ओवरऑल मार्केट कैप और मुनाफा दोनों काफी बढ़ा, लेकिन रतन टाटा के निधन के बाद जब नोएल टाटा 'टाटा ट्रस्ट' के चेयरमैन बने और बोर्ड में आए, तो दोनों के बीच वैचारिक पटरी नहीं बैठी.
5. अब आगे क्या? क्या परिवार के पास लौटेगी कमान?
चंद्रशेखरन के जाने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगला चेयरमैन कौन होगा ?
स्ट्रक्चर में बदलाव संभव: हो सकता है कि नोएल टाटा खुद नॉन-एग्जीक्यूटिव चेयरमैन बनें और कंपनी चलाने के लिए किसी नए CEO या डिप्टी CEO की नियुक्ति की जाए.
नेविल टाटा को तैयार करने की चर्चा: 'फाइनेंशियल टाइम्स' की रिपोर्ट के अनुसार, नोएल टाटा अपने बेटे नेविल टाटा को उत्तराधिकारी के तौर पर ग्रूम (तैयार) करना चाहते हैं.
पारिवारिक बनाम प्रोफेशनल कमान: इतिहास देखें तो करीब 130-135 सालों तक टाटा ग्रुप की कमान हमेशा परिवार के पास ही रही. 2012 में साइरस मिस्त्री और फिर एन चंद्रशेखरन के आने से यह परंपरा टूटी थी. अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि टाटा संस की जिम्मेदारी फिर से किसी बाहरी प्रोफेशनल को दी जाती है या फिर कमान दोबारा टाटा परिवार के हाथ में लौटती है.
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