जबलपुर हाईकोर्ट ने भोजशाला के मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इसके मूल स्वरूप को संस्कृत शिक्षा का केंद्र माना है. उच्च अदालत ने ASI सर्वे और वैज्ञानिक अध्ययन पर भरोसा जताते हुए कहा कि पुरातत्व एक विज्ञान है और कोर्ट वैज्ञानिक निष्कर्षों पर भरोसा कर सकती है. अदालत ने यह भी कहा कि श्रद्धालुओं के लिए बुनियादी सुविधाएं, कानून-व्यवस्था और संरक्षण सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है. वहीं मुस्लिम पक्ष को नमाज के लिए धार जिले में अलग जमीन के लिए सरकार से संपर्क करने की छूट दी गई है.
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कोर्ट ने केंद्र सरकार और ASI को भोजशाला परिसर के प्रबंधन और संस्कृत शिक्षा से जुड़े फैसले लेने को कहा है. अदालत के मुताबिक ASI परिसर का समग्र प्रशासन और प्रबंधन जारी रखेगा.हाईकोर्ट ने कहा कि हर सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह प्राचीन स्मारकों, ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व वाले मंदिरों और पवित्र स्थलों का संरक्षण और सुरक्षा सुनिश्चित करे. भोजशाला परिसर में हिंदू पूजा की परंपरा कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई. कोर्ट ने अपने निष्कर्ष में कहा कि ऐतिहासिक साहित्य और उपलब्ध रिकॉर्ड यह स्थापित करते हैं कि विवादित स्थल मूल रूप से परमार वंश के राजा भोज से जुड़ा संस्कृत शिक्षा केंद्र “भोजशाला” था.
भोजशाला का इतिहास
मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला का इतिहास परमार वंश के प्रतापी राजा भोज (1000-1055 ईस्वी) से जुड़ा है. राजा भोज मां सरस्वती के परम भक्त थे और उन्होंने वर्ष 1034 में यहां एक विशाल महाविद्यालय की स्थापना की थी, जिसे बाद में 'भोजशाला' के नाम से पहचान मिली. हिंदू मान्यताओं के अनुसार यह मूल रूप से वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर था.
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने इस संरचना को भारी क्षति पहुंचाई. बाद के वर्षों में, दिलावर खान गौरी (1401 ईस्वी) और महमूद शाह खिलजी (1514 ईस्वी) ने इसके अलग-अलग हिस्सों में मस्जिद का निर्माण करवाया. 1875 में हुई एक खुदाई के दौरान यहां से सरस्वती देवी की एक प्रतिमा प्राप्त हुई थी, जिसे तत्कालीन अंग्रेज अधिकारी मेजर किनकेड लंदन ले गए थे. वर्तमान में यह प्रतिमा लंदन संग्रहालय में है और इसे वापस भारत लाने के लिए कानूनी प्रयास जारी हैं.
विवाद की कहानी
भोजशाला को लेकर विवाद मुख्य रूप से इसकी धार्मिक पहचान पर केंद्रित है. हिंदू पक्ष का दावा है कि यह राजा भोज कालीन एक मंदिर है, जहां मध्यकाल में केवल कुछ समय के लिए नमाज की अनुमति दी गई थी. उनका तर्क है कि पूरी इमारत के स्तंभों और दीवारों पर हिंदू धर्म के प्रतीक चिह्न मौजूद हैं. दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष इसे 'भोजशाला-कमाल मौलाना मस्जिद' मानता है और उनका कहना है कि वे कई सदियों से यहां इबादत करते आ रहे हैं. इस विवाद के कारण यह स्थल लंबे समय से संवेदनशील बना हुआ है और वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की देखरेख में एक संरक्षित स्मारक है.
पूजा-नमाज के नियम और विवादों का सिलसिला
भोजशाला में पूजा और नमाज की व्यवस्था का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है. 1909 में इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया गया और 1935 में धार रियासत ने यहां सिर्फ शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति दी थी. 1995 में विवाद बढ़ने के बाद प्रशासन ने एक समझौता लागू किया, जिसके तहत हिंदुओं को मंगलवार को पूजा और मुस्लिमों को शुक्रवार को नमाज की अनुमति मिली. 1997 से 2003 के बीच सुरक्षा कारणों से कई बार यहां आम लोगों के प्रवेश और पूजा पर प्रतिबंध लगाए गए. तनाव का सबसे बड़ा कारण वह समय बनता है जब 'बसंत पंचमी' (पूजा का दिन) और 'शुक्रवार' (नमाज का दिन) एक ही तारीख पर पड़ते हैं. साल 2013 और 2016 में ऐसी स्थिति आने पर भारी तनाव पैदा हुआ था और पुलिस को स्थिति नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज तक करना पड़ा था.
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