400 सीटें जीत क्या संविधान बदल देगी भाजपा? विपक्ष के आरोपों के बीच समझिए क्या ऐसा होना मुमकिन

अभिषेक गुप्ता

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Change in the Constitution: लोकसभा चुनावों का प्रचार जैसे-जैसे तेज हो रहा है एक चर्चा संविधान को लेकर भी खूब हो रही है. विपक्ष आरोप लगा रहा है कि बीजेपी 400 सीटें पार का नारा संविधान बदलने का संख्याबल हासिल करने के लिए लगा रही है. इस चर्चा को धार दे रहे हैं बीजेपी के कुछ नेता जिन्होंने संविधान को लेकर अलग-अलग बयानबाजियां की हैं. ऐसे ही एक नेता हैं उत्तर प्रदेश की मेरठ सीट से चुनाव लड़ रहे रामायण सीरियल में राम की भूमिका निभाने वाले अरुण गोविल. उन्होंने पिछले दिनों कह दिया कि अगर बीजेपी फिर से सत्ता में आती है तो संविधान में बड़े स्तर पर बदलाव किए जाएंगे या एक नया संविधान लाया जाएगा. 

वैसे पीएम मोदी ने जरूर सफाई दी कि अब तो अगर संविधान निर्माता डॉ. अंबेडकर भी आ जाएं तो भी संविधान खत्म नहीं हो सकता. पर बहस यह जरूर शुरू हो गई कि क्या संविधान बदला जा सकता है? क्या नया संविधान लाया जा सकता है? अगर कोई संविधान बदलना चाहे तो क्या नियम है? 

पहले जानिए क्या संविधान में बदलाव संभव है?

इसका जवाब हां है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 में संविधान और इसकी प्रक्रिया में संशोधन का जिक्र किया गया है. इसमें संसद की शक्तियों के बारे में विस्तार से बताया गया है. अनुच्छेद 368 के मुताबिक, संसद को संविधान के किसी भी प्रावधान में संशोधन करने का अधिकार है. इसके लिए अलग-अलग अनुच्छेदों के आधार पर तीन प्रकार के नियम बनाए गए हैं. 

संविधान में संशोधन तीन तरह से हो सकते है-

1. ऐसे विधेयक जो संसद यानी लोकसभा और राज्यसभा से साधारण बहुमत(कुल संख्या के 50%+1) से पारित किए जाते हैx.

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2. ऐसे विधेयक जो संविधान के अनुच्छेद 368 (2) के तहत विशेष बहुमत (दो तिहाई) से पास किए जाते है. 

3. ऐसे विधेयक जो संसद से विशेष बहुमत से पारित किये जाते है और इसके साथ ही कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों का साधारण बहुमत से समर्थन प्राप्त होता है. 

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इसके बाद संसद से पारित विधेयक को राष्ट्रपति के सामने अनुमोदन के लिए रखा जाता है. राष्ट्रपति के संशोधन पर अनुमति देने के बाद यह कानून बन जाता है या संशोधन प्रभावी हो जाता है. 

क्या संसद की संविधान में संशोधन शक्ति पर कोई प्रतिबंध भी है?

ऐसा नहीं है कि संसद संविधान में किसी भी प्रकार का संशोधन कर दे. संविधान में संशोधन की एक प्रक्रिया है जिसके तहत ऐसा किया जाता है. हालांकि संविधान में कोई संशोधन के बाद भी सुप्रीम कोर्ट के पास उसे निरस्त करने की शक्ति है. साल 1973 के ऐतिहासिक केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि, संसद के पास संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की शक्ति तो है लेकिन वह 'संविधान की मूल संरचना'(बुनियादी संरचना) को नहीं बदल सकती. दिलचस्प बात तो ये है कि, कोर्ट ने 'मूल संरचना' में कुछ तत्व जैसे- धर्मनिरपेक्षता, समानता, संघवाद, शक्ति का पृथक्करण, स्वतंत्रता न्यायपालिका और कानून का शासन जैसी बातें शामिल किए हुए है. इसके साथ ही कोर्ट को ये अधिकार है कि, वो कभी भी किसी भी तत्व को मूल संरचना मान सकती है.

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यानी बीजेपी नेताओं के ये बयान कि, 400 सीटें आने के बाद संविधान बदल देंगे, ये कर देंगे, वो कर देंगे ये सभी बातें निराधार हैं. इसके लिए एक निर्धारित प्रक्रिया है जिसे फॉलो करते हुए संविधान में बदलाव किया जा सकता है. मान लें कि सरकार के पास बहुमत रहता है तो वो संसद से तो आसानी से कोई भी विधेयक पारित करा ले लेकिन अगर किसी संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठाए जाते हैं तो उसे सुप्रीम कोर्ट(SC) की कसौटी पर भी खरा उतरना होता है अन्यथा कोर्ट उसे निरस्त कर सकता है. इसके उदाहरण ये है कि, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में आरक्षण की 50 फीसदी की सीमा को ताक पर रखते हुए राज्य सरकारों ने 75 फीसदी तक आरक्षण लागू कर दिए जिसे बाद में SC ने 50 फीसदी की सीमा को मूल ढांचा बताते हुए निरस्त कर दिया था.

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