बिना इंटरनेट के भी भेज सकते हैं मैसेज, जानिए क्या है ब्लूटूथ टेक्नोलॉजी
न्यूज तक डेस्क
• 12:15 PM • 25 Jul 2026
बिना इंटरनेट या मोबाइल नेटवर्क के 'ब्लूटूथ मेश' तकनीक आसपास के स्मार्टफोन्स को आपस में जोड़कर मैसेज भेजने में मदद करती है. हाल ही में दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान इंटरनेट बंद होने पर भी प्रदर्शनकारियों द्वारा इस ऑफलाइन तकनीक के इस्तेमाल की आशंका जताई गई है.
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जरा कल्पना कीजिए न आपके फोन में सिग्नल हैं, न मोबाइल डेटा चल रहा है और न ही आसपास कोई Wi-Fi नेटवर्क मौजूद है. इसके बावजूद आपका भेजा हुआ मैसेज पलक झपकते ही सामने वाले तक पहुंच जाए! पहली बार में यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म का जादू लग सकता है, लेकिन आज के दौर में यह बिल्कुल सच है. स्मार्टफोन में मौजूद 'ब्लूटूथ मेश मैसेजिंग' (Bluetooth Mesh Messaging) तकनीक के जरिए बिना किसी इंटरनेट कनेक्टिविटी के भी आपस में बातचीत की जा सकती है.


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यह अनोखी तकनीक अचानक तब चर्चा में आई, जब 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' की एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली पुलिस की जांच में इसका नाम सामने आया. दरअसल, दिल्ली पुलिस इस बात की तहकीकात कर रही है कि क्या 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के समर्थकों ने सेंट्रल दिल्ली में हुए प्रदर्शन के दौरान ऐसे ही किसी ऐप का सहारा लिया था? सेंट्रल दिल्ली के कुछ इलाकों में सुरक्षा कारणों से इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई थीं, फिर भी प्रदर्शनकारी आपस में कैसे कनेक्टेड थे, इसी बात की गुत्थी पुलिस सुलझाने में लगी है.
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रिपोर्ट्स के अनुसार, 'संसद चलो' मार्च के दौरान कनॉट प्लेस और जंतर-मंतर जैसे बेहद संवेदनशील और भीड़भाड़ वाले इलाकों में जब 4G और 5G नेटवर्क पूरी तरह ठप थे, तब भी कुछ लोग डिजिटल रूप से एक-दूसरे के संपर्क में थे. हालांकि पुलिस ने अभी तक आधिकारिक तौर पर किसी खास ऐप का नाम उजागर नहीं किया है, लेकिन इस घटना के बाद से आम लोगों में यह जानने की उत्सुकता बढ़ गई है कि आखिर बिना नेटवर्क के मैसेजिंग का यह 'ऑफलाइन खेल' चलता कैसे है?


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सामान्य तौर पर हम जिन मैसेजिंग ऐप्स जैसे व्हाट्सएप, टेलीग्राम या सिग्नल का रोजाना इस्तेमाल करते हैं, उन्हें चलने के लिए मोबाइल टावर या Wi-Fi की सख्त जरूरत होती है. लेकिन ब्लूटूथ मेश ऐप्स का काम करने का तरीका एकदम अलग है. यह तकनीक आपके फोन में पहले से मौजूद 'ब्लूटूथ लो एनर्जी' (BLE) नाम के फीचर का इस्तेमाल करती है. यानी इसके लिए किसी बाहरी सर्वर या टेलीकॉम कंपनी की सर्विस पर निर्भर नहीं रहना पड़ता.
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इसका काम करने का तरीका बेहद दिलचस्प और इंसानी चेन जैसा है. सबसे पहले जब आप ऐप पर मैसेज टाइप करते हैं, तो आपका फोन किसी दूर के टावर पर सिग्नल भेजने के बजाय अपने आसपास मौजूद उस दूसरे फोन को ढूंढता है जिसमें वही ऐप इंस्टॉल हो. ब्लूटूथ के जरिए मैसेज तुरंत उस पास वाले डिवाइस पर ट्रांसफर हो जाता है. इस तरह एक-एक करके जुड़े स्मार्टफोन्स आपस में मिलकर एक खुद का 'लोकल नेटवर्क' तैयार कर लेते हैं, जिसे मेश नेटवर्क कहते हैं.


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इसे आप ऐसे समझ सकते हैं: मान लीजिए फोन A से मैसेज भेजा गया, जो पास खड़े फोन B तक पहुंचा. इसके बाद फोन B ने बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के उस मैसेज को फोन C की तरफ बढ़ा दिया और फोन C से होता हुआ वह मैसेज अपने असली ठिकाने यानी फोन D तक पहुंच गया. इस चेन में जितने ज्यादा स्मार्टफोन बीच में शामिल होंगे, मैसेज उतनी ही लंबी दूरी तक सफर कर सकता है. भीड़भाड़ वाली जगहों पर यह तकनीक कमाल का काम करती है.
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हालांकि, यह सुनने में जितना शानदार लगता है, इसकी अपनी कुछ जमीनी सीमाएं (Limitations) भी हैं. सबसे पहली बात यह कि इसे काम करने के लिए आसपास उस ऐप का इस्तेमाल करने वाले बहुत सारे लोगों की मौजूदगी जरूरी है. इसके अलावा, ब्लूटूथ की रेंज सीमित होने के कारण मैसेज पहुंचने की रफ्तार थोड़ी धीमी हो सकती है. साथ ही, लगातार बैकग्राउंड में ब्लूटूथ एक्टिव रहने और डेटा रिले (आगे भेजने) करने की वजह से फोन की बैटरी भी काफी तेजी से खत्म होती है.











