बिहार शराबबंदी: क्या हटने वाला है नीतीश कुमार का 'ड्रीम प्रोजेक्ट'? जानिए हटाने के पक्ष में सॉलिड तर्क और क्यों अड़ी है सरकार
Bihar liquor ban update: बिहार में 2016 से लागू शराबबंदी कानून को लेकर सियासत गरमा गई है. एनडीए के भीतर से समीक्षा की मांग तेज हो रही है, जबकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसे सामाजिक सुधार और अपना ड्रीम प्रोजेक्ट मानते हैं. जानिए बिहार शराबबंदी पर पूरी बहस, सॉलिड तर्क और आगे का संभावित रास्ता.

बिहार में पिछले 9 वर्षों से लागू शराबबंदी कानून एक बार फिर सियासी गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गया है. एनडीए (NDA) के भीतर से ही इस कानून की समीक्षा की मांग अब जोर-शोर से उठने लगी है, जिसने इस बहस को हवा दे दी है कि क्या वाकई बिहार में शराबबंदी खत्म होने जा रही है. जहां कुछ नेता इस कानून को धरातल पर पूरी तरह विफल बता रहे हैं, वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसे अपने इमोशन और एक बड़े सामाजिक सुधार के रूप में देख रहे हैं. सदन से लेकर सड़क तक अब यह सवाल गूंज रहा है कि क्या सरकार अपने इस फैसले पर टस से मस होगी या बीच का कोई रास्ता तलाशेगी? समझिए पूरी बात.
राजस्व का भारी नुकसान और आर्थिक बोझ
शराबबंदी हटाने के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क राज्य को होने वाली आर्थिक क्षति का दिया जा रहा है. 2016 में जब यह कानून लागू किया गया था, तब बिहार सरकार को शराब से सालाना करीब ₹3,142 करोड़ की आय होती थी. विशेषज्ञों का मानना है कि आज की तारीख में बिहार सरकार का बजट ₹3 लाख करोड़ से ऊपर पहुंच चुका है, इस लिहाज से राज्य को हर साल लगभग ₹40,000 करोड़ का रेवेन्यू लॉस हो रहा है.
इसके अलावा, इस कानून को सख्ती से लागू कराने और निगरानी तंत्र को मजबूत बनाए रखने के लिए सरकार को सालाना ₹800 से ₹1,000 करोड़ अलग से खर्च करने पड़ रहे हैं, जिसे आलोचना करने वाले फिजूलखर्ची बता रहे हैं.
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अदालतों में लंबित मामले और जेलों की स्थिति
इस कानून का एक दूसरा गंभीर पहलू न्यायिक व्यवस्था पर बढ़ता दबाव है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, शराबबंदी कानून से जुड़े 8 लाख से अधिक मामले बिहार की विभिन्न अदालतों में लंबित पड़े हैं. 2016 से अब तक लगभग 13 लाख लोगों की गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, जिनमें से 6 लाख से अधिक लोगों को दोषी भी ठहराया जा चुका है.
इतनी बड़ी संख्या में मुकदमों और गिरफ्तारियों के कारण बिहार की जेलों में कैदियों की संख्या क्षमता से अधिक हो गई है. पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी सहित कई नेता सवाल उठा चुके हैं कि मामूली शराब पीने वालों को जेल भेजने से अदालतों और पुलिस पर बोझ बढ़ रहा है.
होम डिलीवरी और अवैध तस्करी की चुनौती
समीक्षा की मांग करने वाले नेताओं का एक ठोस तर्क यह भी है कि शराबबंदी के बावजूद बिहार में शराब आसानी से उपलब्ध है. विपक्षी और एनडीए के ही कुछ नेताओं का आरोप है कि राज्य में अब शराब की होम डिलीवरी का एक नया सिस्टम विकसित हो गया है. महंगी शराब पड़ोसी राज्यों से तस्करी कर लाई जा रही है, जिससे बिहार की जनता का पैसा बाहर जा रहा है. नेताओं का दावा है कि निचले स्तर पर प्रशासन और माफिया की मिलीभगत के कारण बड़े तस्कर छूट रहे हैं और गरीब तबके के लोग पुलिसिया कार्रवाई का शिकार हो रहे हैं.
घरेलू हिंसा में कमी और सामाजिक सुधार का दावा
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जेडीयू का पक्ष पूरी तरह सामाजिक और नैतिक आधार पर टिका है. सरकार का दावा है कि शराबबंदी के बाद बिहार में महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा (Domestic Violence) में भारी गिरावट दर्ज की गई है. नीतीश कुमार इसे गांधीवादी विचारधारा का हिस्सा मानते हैं और उनका कहना है कि जो पैसा पहले शराब में बर्बाद होता था, अब वह गरीब परिवारों के पोषण और बच्चों की शिक्षा पर खर्च हो रहा है. जेडीयू का सॉलिड तर्क यह है कि यदि कोई कानून पूरी तरह लागू नहीं हो पा रहा है, तो उसे खत्म करने के बजाय प्रशासन को और अधिक सख्त बनाना चाहिए.
समीक्षा की मांग और भविष्य का रास्ता
वर्तमान में एनडीए के भीतर से जो 'समीक्षा' की मांग उठी है, उसका मतलब केवल कानून को हटाना नहीं, बल्कि इसमें व्यावहारिक बदलाव करना भी हो सकता है. चर्चा है कि क्या पहली बार शराब पीते पकड़े जाने पर जुर्माने की राशि में कोई रियायत दी जाएगी या फिर पर्यटन और औद्योगिक क्षेत्रों में कुछ ढील दी जा सकती है.
हालांकि, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब भी अपनी हर जनसभा में शराबबंदी को अपनी बड़ी सफलता के रूप में पेश करते हैं. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे अपने इस ड्रीम प्रोजेक्ट में किसी भी तरह के बदलाव के लिए तैयार होते हैं या नहीं.










