पूर्व रेल मंत्री मुकुल रॉय का 71 वर्ष की उम्र में निधन, कभी ममता बनर्जी के थे सबसे करीबी, कोलकाता में ली आखिरी सांस

Former Railway Minister Mukul Roy Died: पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री और तृणमूल कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में रहे मुकुल रॉय का 71 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से कोलकाता में निधन हो गया.

मुकुल रॉय
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Former Railway Minister Mukul Died: पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री और पश्चिम बंगाल की राजनीति के चर्चित चेहरे मुकुल रॉय का सोमवार यानी 23 फरवरी की देर रात दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. वह 71 साल के थे और कोलकाता के सॉल्ट लेक स्थित अपोलो अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था जहां तड़के करीब 1:30 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली. उनके बेटे सुभ्रांशु रॉय ने निधन की पुष्टि करते हुए कहा कि कार्डियक अरेस्ट की वजह से उनकी मौत हुई. उन्होंने बताया कि रॉय पिछले करीब 600 दिनों से अस्पताल में भर्ती थे. परिवार के लिए यह अपूरणीय क्षति है.

ट्रड यूनियन से सियासत तक का सफर

मुकुल रॉय का जन्म 14 मई 1954 को उत्तर 24 परगना के कांचरापाड़ा में हुआ था. राजनीति में कदम रखने से पहले उन्होंने ट्रेड यूनियन की गतिविधियों में एक्टिव भूमिका निभाई थी. उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ कलकता से विज्ञान में ग्रेजुएशन की पढ़ाई की और बाद में साल 2006 में मादुरै कामराज यूनिवर्सिटी से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में एमए किया.

ममता बनर्जी के भरोसेमंद सहयोगी

जनवरी 1998 में बनी ऑल इंडिया त्रिणमूल कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में मुकुल रॉय शामिल थे. वह लंबे समय तक पार्टी सुप्रीमो ममत बनर्जी के करीबी सहयोगी माने जाते रहे. एक दौर में उन्हें पार्टी में ममता बनर्जी के बाद नंबर दो नेता कहा जाता था. 

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उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत यूथ कांग्रेस से की थी. तृणमूल कांग्रेस बनने के बाद वह पार्टी के महासचिव बने और दिल्ली की राजनीति में पार्टी का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे. साल 2006 में वह राज्यसभा के लिए चुने गए और 2009 से 2012 तक राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के नेता रहे.

रेल मंत्रालय की कमान

यूपीए-II सरकार में मुकुल रॉय ने पहले शिपिंग मंत्रालय में राज्य मंत्री के तौर पर काम किया. मार्च 2012 में उन्होंने रेल मंत्री पद संभाला. इस दौरान उन्होंने दिनेश त्रिवेदी की जगह ली थी. रेल मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालते वक्त वह राष्ट्रीय राजनीति में काफी प्रभावशाली माने जाते थे.

साल 2011 में जब तृणमूल कांग्रेस ने 34 साल पुराने वाम शासन को खत्म कर पश्चिम बंगाल की सत्ता संभाली, तब पार्टी को मजबूत करने में मुकुल रॉय की रणनीतिक भूमिका अहम रही. उनके कार्यकाल में वाम दलों और कांग्रेस के कई नेता तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए.

बीजेपी में गए फिर लौटे 

नवंबर 2017 में मुकुल रॉय ने तृणमूल कांग्रेस से अलग होकर  भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया. भारतीय जनता पार्टी में रहते हुए उन्होंने पश्चिम बंगाल में संगठन को मजबूत करने में एक्टिव भूमिका निभाई. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने राज्य में 18 सीटें जीतकर बड़ा प्रदर्शन किया, जिसमें रॉय की रणनीति को भी अहम माना गया.

2021 के विधानसभा चुनाव में वह कृष्णानगर उत्तर सीट से भाजपा विधायक चुने गए. हालांकि कुछ ही समय बाद जून 2021 में वह फिर तृणमूल कांग्रेस में लौट आए.

दलबदल कानून के तहत अयोग्यता

तृणमूल कांग्रेस में वापसी के बाद उनकी सक्रियता पहले जैसी नहीं रही. वह डिमेंशिया सहित कई बीमारियों से जूझ रहे थे. 13 नवंबर 2025 को कलकत्ता हाई कोर्ट ने दलबदल कानून के तहत उन्हें विधायक पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था क्योंकि वह बीजेपी के टिकट पर जीतने के बाद सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे.

एक रणनीतिकार की विदाई

मुकुल रॉय का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा.  वह कभी तृणमूल कांग्रेस के मजबूत स्तंभ रहे, तो कभी भाजपा के अहम रणनीतिकार. बंगाल की राजनीति में उनकी भूमिका लंबे समय तक याद की जाएगी. उनके निधन के साथ ही राज्य की सियासत का एक अहम अध्याय खत्म हो गया.

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