Charchit Chehra: पवन खेड़ा की 'अधूरी तपस्या' फिर चर्चा में, राज्यसभा की रेस में क्यों पीछे छूटे राहुल के सबसे मुखर सिपाही?
राज्यसभा चुनाव में एक बार फिर नाम न आने से कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की 'अधूरी तपस्या' वाली चर्चा सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. राहुल गांधी के प्रति अटूट वफादारी और पार्टी के लिए जेल जाने तक का जोखिम उठाने के बावजूद, चुनावी समीकरणों के चलते वह संसद की दहलीज तक नहीं पहुंच पाए हैं.

कांग्रेस के संकटमोचक और पार्टी की सबसे बुलंद आवाजों में से एक, पवन खेड़ा एक बार फिर सुर्खियों में हैं. कारण वही पुराना है राज्यसभा चुनाव और उनका संसद की दहलीज तक न पहुंच पाना. जैसे ही राज्यसभा के लिए कांग्रेस की ताजा लिस्ट सामने आई और उसमें पवन खेड़ा का नाम नदारद दिखा, सोशल मीडिया पर उनकी 'अधूरी तपस्या' वाली पोस्ट एक बार फिर वायरल होने लगी.
क्या है 'अधूरी तपस्या' का पूरा मामला?
पवन खेड़ा और 'तपस्या' शब्द का नाता साल 2022 से शुरू हुआ था. उस समय उम्मीद थी कि राहुल गांधी की विचारधारा को मजबूती से रखने के इनाम के तौर पर उन्हें राज्यसभा भेजा जाएगा, लेकिन जब टिकट नहीं मिला, तो उन्होंने एक भावुक ट्वीट किया था कि "शायद मेरी तपस्या में कुछ कमी रह गई."
हालांकि, बाद में उन्होंने राहुल गांधी के प्रति अपनी वफादारी जताते हुए कहा था कि राहुल की तपस्या के आगे उनकी तपस्या कुछ भी नहीं है. तब से वह पार्टी के लिए एक 'शार्प शूटर' की तरह डटे रहे, लेकिन संसद जाने का उनका इंतजार अब भी खत्म नहीं हुआ है.
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इस बार क्यों कटा पत्ता?
चर्चा थी कि इस बार पवन खेड़ा को तमिलनाडु से राज्यसभा भेजा जा सकता है. लेकिन जानकारों का मानना है कि डीएमके (DMK) के वीटो और एम.के. स्टालिन की उस शर्त के कारण बात नहीं बन पाई, जिसमें उन्होंने तमिलनाडु के ही किसी व्यक्ति को राज्यसभा भेजने की बात कही थी. इस चुनावी समीकरण के बीच कांग्रेस अपने इस दिग्गज चेहरे के लिए फाइट नहीं कर सकी.
राजनीति के 'शतरंज' में पवन खेड़ा का सफर
पवन खेड़ा का राजनीतिक सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है:
- उदयपुर से दिल्ली का सफर: 1968 में उदयपुर के एक साधारण परिवार में जन्मे खेड़ा 1989 में यूथ कांग्रेस से जुड़े.
- राजीव गांधी का प्रभाव: वह राजीव गांधी के व्यक्तित्व से बेहद प्रभावित थे. 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद वह इतने टूट गए थे कि उन्होंने राजनीति छोड़कर कॉर्पोरेट सेक्टर का रुख कर लिया था.
- शीला दीक्षित के सारथी: उनकी दूसरी पारी 1998 में शुरू हुई, जब वह शीला दीक्षित के राजनीतिक सचिव बने और 15 साल तक पर्दे के पीछे रहकर सरकार संभाली.
- राहुल के 'संकटमोचक': 2015 के बाद वह टीवी डिबेट्स में कांग्रेस की 'ढाल और तलवार' बन गए. पीएम मोदी के खिलाफ विवादित बयानों से लेकर एयरपोर्ट पर गिरफ्तारी के ड्रामे तक, उन्होंने हर बार राहुल गांधी के लिए 'सियासी गोलियां' झेली हैं.
अब क्या है पवन खेड़ा का मकसद?
हालिया इंटरव्यू में पवन खेड़ा ने साफ किया है कि अब उनका मकसद सिर्फ राज्यसभा जाना नहीं है. उन्होंने कहा, "मेरा सपना है कि नरेंद्र मोदी को विपक्ष में बैठे हुए देखूं. जब तक उन्हें हरा नहीं देता, मेरी तपस्या सफल नहीं होगी."
राजनीति के इस खेल में पवन खेड़ा एक वफादार सिपाही की तरह डटे हुए हैं, लेकिन सवाल अब भी वही है कि क्या कांग्रेस अपने इस 'शार्प शूटर' को वो सम्मान देगी, जिसके उनके समर्थक उन्हें हकदार मानते हैं?
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