30 जनवरी, वह दिन जब नाथुराम गोडसे ने की थी महात्मा गांधी की हत्या, क्या-क्या हुआ था उस रोज

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Mahatma Gandhi Death Anniversary: आज 30 जनवरी है. आज ही के दिन साल 1948 को राष्ट्रपिता और देश की आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले, पूरी दुनिया में सत्य और अहिंसा के लिए मशहूर महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई थी. नाथुराम गोडसे ने गोली मारकर महात्मा गांधी की हत्या की थी. आइए आपको बताते हैं जिस दिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या हुई उस दिन क्या-क्या हुआ.

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक गांधी की हत्या का प्लान काफी पहले से चल रहा था. पहले हत्या का प्लान 20 जनवरी को था जिसके तहत उस दिन बिरला हाउस में ग्रेनेड से हमला भी हुआ लेकिन उसमें गांधी जी बच गए. इसी के बाद से ही गांधी जी को अपनी मृत्यु का अंदाजा हो गया था. इस प्लान के फेल होने के बाद एकबार फिर से प्लान बना और 30 जनवरी को अंजाम दिया गया.

बुर्का में जाने का था प्लान, फिर अंतिम समय में गोडसे ने बदला मन

डॉमिनिक लैपिएर और लैरी कॉलिंस की किताब ‘फ्रीडम ऐट मिडनाइट’ में लिखा है कि, ‘किसी ने ये सुझाव दिया था कि नाथूराम बुर्का पहन कर गांधीजी की प्रार्थना सभा में जाए. इसपर अमल करते हुए एक बुर्का लाया गया लेकिन जब नाथूराम ने उसे पहन कर देखा, तो उसे महसूस हुआ कि, ये तरीका काम नहीं करेगा क्योंकि उसके हाथ बुर्के के ढीले-ढाले तहों में फंस रहे थे.’

गोडसे ने कहा कि, बुर्का पहन कर तो मैं अपनी पिस्तौल ही नहीं निकाल पाऊंगा. उसने दूसरी बात ये कही कि, हत्या के बाद वह औरतों के कपड़ों में पकड़ा जाएगा जिससे उसकी बदनामी होगी. फिर बुर्का का प्लान कैंसिल हो गया. बाद में नाथूराम के फौजियों की तरह स्लेटी सूट पहनने का प्लान बना, जिसका उन दिनों बहुत चलन था.

गोली लगने से पहले सरदार पटेल से मिले थे महात्मा गांधी

जिस दिन गांधी जी की हत्या हुई उस दिन वो कई लोगों से मिले थे. 30 जनवरी को डरबन से महात्मा गांधी के साथी रुस्तम सोराबजी सपरिवार गांधी से मिलने आए थे. गांधी जी से मिलने दोपहर के बाद कुछ शरणार्थी, कांग्रेस के नेता और भारत में श्रीलंका के एक राजनयिक अपनी बेटी के साथ आए. मशहूर इतिहासकार राधा कुमुद मुखर्जी भी उस दिन गांधी जी से मिली थीं. अपने मृत्यु वाले दिन गांधी से मिलने वालों में सबसे खास शख्स थे सरदार पटेल जो उनकी मृत्यु से कराब 1 घंटे पहले मिलने पहुंचे थे. माना ये जाता है कि, गांधी जी और पटेल के बीच पटेल और नेहरू के बीच के बढ़ते मतभेदों पर चर्चा हो रही थी. ये चर्चा इतनी गहरी और गंभीर थी कि गांधी को अपनी प्रार्थना सभा में जाने के लिए देर हो गई.

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प्रार्थना सभा पहुंचने से पहले ही गोडसे ने झोंक दिया फायर

पटेल से बात ठीक 5 बजकर 15 मिनट पर वो बिरला हाउस से निकलकर प्रार्थना सभा की ओर जाने लगे. वो अपनी भतीजियों आभा और मनु के कंधों पर बाह टिकाये हुए सभा स्थल की ओर बढ़ रहे थे. राम चंद्र गुहा की किताब ‘गांधी द इयर्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड’ के मुताबिक, ‘गांधी प्रार्थनास्थल के लिए बने चबूतरे की सीढ़ियों के पास पहुंचे ही थे कि खाकी कपड़े पहने हुए नाथूराम गोडसे उनकी तरफ बढ़ा. गोडसे के हावभाव से ऐसा लग रहा था जैसे वो गांधी के पैर छूना चाह रहा हो, लेकिन उसके इरादे कुछ और ही थे. गुहा लिखते हैं, आभा ने गोडसे को रोकने की कोशिश की, लेकिन उसने आभा को धक्का दे दिया, तभी गोडसे ने 5 बज कर 17 मिनट पर अपनी पिस्तौल निकाल कर गांधी पर पॉइंट ब्लैंक रेंज से लगातार तीन फायर किए. गांधी जी को एक गोली सीने में और दो गोली पेट में लगी. गोली लगते ही गांधी जमीन पर गिर गए. उनके मुंह से अंतिम शब्द निकले ‘हे राम’.

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वह स्थान जहां गांधी जी की हत्या की गई.

गोडसे का क्या हुआ?

गोडसे एक हिंदुत्ववादी एक्टिविस्ट था. वह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को भारत-पाकिस्तान के विभाजन की वजह और मुस्लिमों की राजनीतिक मांग का समर्थक मानता था. इसी वजह से उसने नारायण आप्टे और 6 लोगों के साथ मिलकर उनकी हत्या की साजिश रची. महात्मा गांधी की हत्या के बाद करीब एक साल तक मुकदमा चला. 8 नवंबर 1949 को गोडसे को फांसी की सजा सुनाई गई. गोडसे को 15 नवंबर 1949 को अंबाला सेंट्रल जेल में फांसी दी गई.

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