Indore: 'वो हमारे लीडर हैं, घंटा बोलेंगे...' पत्रकार के सवाल पर भड़के पार्षद की हुई घनघोर बेइज्जती, जानें कौन हैं वो
Indore Kailash Vijayvargiya News: इंदौर के भगीरथपुरा में दूषित पानी से 10 मौतों के बाद पार्षद कमल वाघेला का संवेदनहीन चेहरा सामने आया. पत्रकार के सवाल पर बदतमीजी करने वाले पार्षद की सरेआम फजीहत हुई.

मध्य प्रदेश के इंदौर शहर का भगीरथपुरा इलाका इस वक्त दर्द और आक्रोश से भरा हुआ है. यहां दूषित पानी पीने से अब तक 10 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है. जबकि करीब 200 लोग अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती हैं। पूरे इलाके में मातम पसरा है लेकिन इस बीच सत्तापक्ष के कुछ नेताओं का रवैया लोगों को और ज्यादा नाराज़ कर रहा है.
जब मंत्री के शब्दों पर भड़क उठा मामला
घटना उस वक्त तूल पकड़ गई जब वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से एक पत्रकार ने मौतों को लेकर तीखा सवाल पूछ लिया. जवाब में मंत्री ने बेहद हल्के और आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल कर दिया. पत्रकार ने तुरंत उनके शब्दों पर आपत्ति जताई.
इतने में पीछे चल रहे पार्षद कमल वाघेला बीच में कूद पड़े. उन्होंने पत्रकार से बदतमीजी करते हुए कहा कि 'वो हमारे नेता हैं, जो चाहें बोलेंगे.'
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यहीं पत्रकार ने पलटकर ऐसा सवाल दागा कि पार्षद की बोलती बंद हो गई. पत्रकार ने पूछा- 'आपके ही इलाके में 10 लोग मर गए, क्या आपको इसका कोई दुख नहीं है?' इस सीधे सवाल के बाद पार्षद बिना कुछ कहे वहां से खिसकते नजर आए.
मौतें हो रही थीं, पार्षद झूला झूल रहे थे
पार्षद कमल वाघेला की संवेदनहीनता यहीं खत्म नहीं हुई. सोशल मीडिया पर 28 दिसंबर का एक और वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वे बेफिक्र होकर झूला झूलते दिखाई दे रहे हैं. आरोप है कि उसी दौरान उनके वार्ड के लोग दूषित पानी पीकर अस्पतालों में भर्ती हो रहे थे और कई परिवार अपनों को खो रहे थे.
स्थानीय लोगों का कहना है कि बीते चार महीनों से इलाके में गंदे पानी की शिकायतें की जा रही थीं, लेकिन पार्षद ने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया. नतीजा ये हुआ कि हालात इतने बिगड़ गए कि पूरे इलाके को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा.
मुआवजा देने पहुंचे तो करना पड़ा सामना
आज जब मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और पार्षद कमल वाघेला पीड़ित परिवारों को मुआवजा बांटने पहुंचे, तो वहां माहौल बिल्कुल अलग था. गुस्साए लोगों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया और जमकर खरी-खोटी सुनाई. हालात इतने बिगड़ गए कि दोनों नेताओं को वहां से वापस लौटना पड़ा.
इस पूरे मामले ने एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं कि जब जनता मुसीबत में होती है तब जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी सिर्फ बयान देने तक ही क्यों सिमट जाती है? इंदौर की यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की संवेदनहीनता की दर्दनाक तस्वीर बन चुकी है.
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