पटना हॉस्टल कांड: सिस्टम के वो 5 चेहरे जिनकी लापरवाही ने इंसाफ को उलझाया, 'सुसाइड' की थ्योरी पर मेडिकल रिपोर्ट ने उठाए सवाल
Patna NEET Girl Case: पटना शंभू गर्ल्स हॉस्टल केस में थाना प्रभारी से लेकर एसएसपी तक की भूमिका पर उठे सवाल. जानें उन 5 चेहरों के बारे में जिन्होंने बिना पोस्टमार्टम रिपोर्ट के ही छात्रा की मौत को सुसाइड करार दे दिया.

बिहार की राजधानी पटना के शंभू गर्ल्स हॉस्टल में नीट (NEET) की तैयारी कर रही एक नाबालिग छात्रा की मौत ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है. 6 जनवरी को बेहोश मिली छात्रा ने 9 जनवरी को दम तोड़ दिया, लेकिन इस बीच पुलिसिया जांच में जो लापरवाही सामने आई, उसने इंसाफ की राह मुश्किल कर दी है. अब इस मामले में थाने से लेकर एसएसपी दफ्तर और अस्पताल तक पांच ऐसे प्रमुख चेहरे और स्तर हैं, जहां इस मामले को सुलझाने के बजाय उलझाने की कोशिश की गई.
थाना प्रभारी से एसएसपी तक की लापरवाही?
कहा जा रहा कि इस केस में सबसे पहली और बड़ी चूक जमीनी स्तर पर हुई. कानून कहता है कि संदिग्ध हालत में छात्रा के मिलने पर तुरंत कमरे को सील कर फॉरेंसिक जांच होनी चाहिए थी, लेकिन पटना पुलिस के आला अधिकारियों ने बिना सबूतों के ही 'सुसाइड' का निष्कर्ष निकाल लिया.
1. रोशनी कुमारी (थाना प्रभारी): सबसे पहली जिम्मेदारी स्थानीय थाना प्रभारी की थी. आरोप है कि 6 से 9 जनवरी तक पुलिस घटना स्थल पर पहुंची ही नहीं. हॉस्टल का कमरा खुला रहा और सबूतों के साथ छेड़छाड़ की संभावना बनी रही. उन्होंने बिना किसी फॉरेंसिक जांच के इसे सुसाइड मानकर रिपोर्ट आगे बढ़ा दी.
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2. अभिनव कुमार (ASP): एएसपी स्तर पर जिम्मेदारी थी कि वह थाना प्रभारी की रिपोर्ट को क्रॉस-चेक करते. उन्हें यह पूछना चाहिए था कि पुलिस 3 दिन तक मौके पर क्यों नहीं गई? लेकिन उन्होंने भी शुरुआती थ्योरी को ही सच मान लिया.
3. परिचय कुमार (SP): सबसे चौंकाने वाली भूमिका एसपी की रही. इन्होंने पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने से पहले ही सार्वजनिक तौर पर बयान दे दिया कि यह सुसाइड है और यौन शोषण जैसी कोई बात नहीं है. जबकि नियमों के मुताबिक, बिना रिपोर्ट के ऐसा दावा करना गलत है.
4. एसएसपी (पटना): जिले के सर्वोच्च पुलिस अधिकारी ने भी शुरुआती दौर में ही यौन शोषण की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया. बाद में जब मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट आई, तो पुलिस के इन दावों ने उनकी खुद की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए.
5. मेडिकल सिस्टम (प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल): अस्पताल के डॉक्टरों ने शुरुआती जांच में शरीर पर चोट के निशान तो बताए, लेकिन रेप से इनकार कर दिया. पुलिस ने इसी आधी-अधूरी राय को अपनी ढाल बना लिया. बाद में पोस्टमार्टम में जननांगों पर चोट और संघर्ष के निशान (Tissues Trauma) पाए गए.
SIT की जांच में खुलेगी पोल?
अब यह पूरा मामला एसआईटी (SIT) के पास है. एसआईटी सिर्फ मौत के कारणों की ही नहीं, बल्कि इस बात की भी जांच कर रही है कि सिस्टम के इन जिम्मेदार चेहरों ने अपनी ड्यूटी निभाने में इतनी बड़ी लापरवाही क्यों की? क्या यह सिर्फ एक चूक थी या किसी को बचाने की कोशिश?










