कटिहार की बर्मा कॉलोनी में बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों का दर्द, बोले- ‘या तो भारत बुलाओ, या वहां सुरक्षा पक्की कराओ'
Bangladeshi Hindu refugees: बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रही हिंसा की खबरों से कटिहार की बर्मा कॉलोनी में बसे शरणार्थी परिवारों का पुराना दर्द फिर उभर आया है. उन्होंने भारत सरकार से मांग की है कि या तो वहां फंसे हिंदुओं को भारत लाया जाए या फिर उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी सुरक्षा दिलाई जाए.

पड़ोसी देश बांग्लादेश से आ रही हिंदुओं पर हिंसा और अत्याचार की खबरों ने कटिहार की बर्मा कॉलोनी में रहने वाले सैकड़ों परिवारों को अंदर तक झकझोर कर रख दिया है. ये वही लोग हैं, जिनके पूर्वज कभी जान बचाकर बांग्लादेश छोड़कर भारत आए थे. आज टीवी और मोबाइल पर वहां के हालात देखकर उनकी पुरानी यादें फिर से ताजा हो गई हैं.
हमने जो देखा था, वही फिर दोहराया जा रहा है
कॉलोनी में रहने वाले सुब्रत चक्रवर्ती बताते हैं कि उनके परिवार ने बंटवारे के वक्त जो जुल्म झेले थे, उन्हें शब्दों में बयान करना मुश्किल है. “हमारी मां-बहनों के साथ बर्बरता हुई थी. उसी डर ने हमें शरणार्थी बना दिया. आज बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ जो हो रहा है, उसे देखकर लगता है जैसे वही दौर वापस आ गया हो,” उन्होंने भर्राए गले से कहा.
मौजूदा हालात को लेकर गुस्सा
स्थानीय लोगों का आरोप है कि वहां की मौजूदा यूनुस सरकार हिंदुओं को हाशिए पर धकेलने की कोशिश कर रही है. उनका कहना है कि शरीयत कानून थोपने की बात हो रही है और अल्पसंख्यकों को खत्म करने की साजिश चल रही है. कॉलोनी के लोग मानते हैं कि अगर वक्त रहते कदम नहीं उठाए गए तो वहां हालात और बदतर हो सकते हैं.
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भारत सरकार से तीन बड़ी मांगें
बर्मा कॉलोनी के लोगों ने एक सुर में केंद्र सरकार से ठोस कार्रवाई की मांग की है. उनकी प्रमुख मांगें हैं-
- बांग्लादेश में फंसे सभी हिंदू परिवारों को सुरक्षित तरीके से भारत लाया जाए.
- जो लोग वहीं रहना चाहते हैं, उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी सुरक्षा और संरक्षण दिलाया जाए.
- बांग्लादेश सरकार पर कूटनीतिक दबाव बनाया जाए ताकि हिंदुओं पर हो रही हिंसा तुरंत रोकी जा सके.
1964 से भारत में बसा है दर्द का इतिहास
सूरज दास जो 1964 में बांग्लादेश छोड़कर भारत आए थे, बताते हैं कि यहां उन्हें सरकार की ओर से जमीन और घर मिला, जिससे वे सम्मान के साथ जिंदगी जी रहे हैं, लेकिन आज जब वे टीवी पर वहां की तस्वीरें देखते हैं तो मन बेचैन हो उठता है.
“वहां हिंदुओं को इंसान नहीं समझा जा रहा. घर जलाए जा रहे हैं, महिलाओं की इज्जत लूटी जा रही है. लगता है जैसे हमारे पुराने घाव फिर से हरे हो गए हों,” उन्होंने कहा.
उम्मीद अब भी बाकी है
कटिहार की इस बर्मा कॉलोनी में रहने वाले लोग आज सुरक्षित हैं लेकिन उनका दिल अब भी बांग्लादेश में बसे अपने रिश्तेदारों और समुदाय के लोगों के लिए धड़कता है. वे चाहते हैं कि भारत सरकार उनकी आवाज सुने और ऐसा कदम उठाए, जिससे किसी और परिवार को अपना सबकुछ छोड़कर शरणार्थी न बनना पड़े.
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