Kerala Congress: कौन हैं जोस मणि जिन्हें वापस लाने सोनिया गांधी ने फोन किया? क्या कांग्रेस में होगी एंट्री
केरल में लगातार मिल रही चुनावी जीतों के बाद यूडीएफ मजबूत स्थिति में है और लेफ्ट के लिए सत्ता में वापसी की राह मुश्किल होती दिख रही है. केरल कांग्रेस (मणि) को लेकर कांग्रेस और एलडीएफ के बीच खींचतान तेज है, जिसमें जोस मणि की भूमिका सियासी संतुलन तय कर सकती है.

केरल की राजनीति आमतौर पर काफी स्थिर मानी जाती है. यहां मतदाता ज्यादातर विचारधारा के आधार पर बंटे हुए हैं, लेफ्ट सोच रखने वाले एलडीएफ के साथ और कांग्रेस समर्थक यूडीएफ के साथ रहते हैं. इसी वजह से गठबंधनों में बड़े उलटफेर कम ही देखने को मिलते हैं. इस सियासी स्थिरता का सबसे बड़ा नुकसान बीजेपी और एनडीए को हुआ है जो तमाम कोशिशों के बावजूद केरल में अपनी पकड़ मज़बूत नहीं कर पाए.
लेकिन हाल के स्थानीय निकाय चुनावों के बाद केरल की राजनीति में हलचल तेज़ हो गई है. लोकसभा चुनाव 2024, उसके बाद उपचुनाव और अब स्थानीय चुनाव. इन सभी में यूडीएफ लगातार जीत दर्ज कर रही है. इसके चलते माना जा रहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव में लेफ्ट के लिए लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी आसान नहीं होगी. माहौल फिलहाल कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ के पक्ष में दिख रहा है.
केरल कांग्रेस (मणि) बन गई है सियासी कुंजी
इसी बीच केरल कांग्रेस (मणि) यानी KCM को लेकर बड़ा राजनीतिक घमासान शुरू हो गया है. कांग्रेस चाहती है कि जोस के. मणि के नेतृत्व वाली यह पार्टी एक बार फिर यूडीएफ में लौट आए. दिलचस्प बात यह है कि केरल कांग्रेस (मणि) लंबे समय तक कांग्रेस के साथ रही है, लेकिन 2020 में उसने गठबंधन तोड़कर लेफ्ट का दामन थाम लिया था.
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फिलहाल केरल कांग्रेस (मणि) एलडीएफ सरकार में शामिल है और उसके विधायक मंत्री भी हैं. जोस के. मणि राज्यसभा सांसद हैं और कोट्टायम से लोकसभा सांसद रह चुके हैं. उनके पिता के. एम. मणि केरल की राजनीति के बड़े नाम थे, वे 13 बार राज्य का बजट पेश कर चुके थे और 1979 में कांग्रेस से अलग होकर केरल कांग्रेस (मणि) की स्थापना की थी.
कांग्रेस हाईकमान की सीधी एंट्री
इस बार जो बात अलग है वह है कांग्रेस हाईकमान की सक्रियता. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, गांधी परिवार खुद जोस मणि को यूडीएफ में लाने में दिलचस्पी दिखा रहा है. बताया जा रहा है कि सोनिया गांधी ने व्यक्तिगत तौर पर जोस मणि से फोन पर बात की और यूडीएफ में शामिल होने का न्योता दिया. केसी वेणुगोपाल ने इस बातचीत में सेतु की भूमिका निभाई.
हालांकि, केरल कांग्रेस (मणि) की ओर से अभी तक कोई साफ संकेत नहीं मिला है. पार्टी के वरिष्ठ नेता और मंत्री रोशी ऑगस्टीन बार-बार कह चुके हैं कि वे एलडीएफ में ही बने रहेंगे. इसके बावजूद लेफ्ट खेमे में बेचैनी साफ दिखाई दे रही है.
जमीन अलॉटमेंट और बढ़ता शक
लेफ्ट सरकार ने हाल ही में के. एम. मणि की याद में एक मेमोरियल बनाने के लिए केरल कांग्रेस (मणि) फाउंडेशन को बड़ी ज़मीन अलॉट की है. इसे राजनीतिक गलियारों में ‘गिफ्ट पॉलिटिक्स’ के तौर पर देखा जा रहा है, ताकि जोस मणि एलडीएफ से दूर न जाएं.
इस बीच यह भी चर्चा में है कि जोस मणि हाल की एक अहम एलडीएफ बैठक में शामिल नहीं हुए और सरकार की एक फंड ब्लॉक से जुड़ी मुहिम से भी दूरी बनाए रखी. इन संकेतों ने अटकलों को और हवा दे दी है.
क्रिश्चियन वोट बैंक की अहमियत
केरल की राजनीति में क्रिश्चियन वोट बैंक की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है. पथानामथिट्टा, कोट्टायम, इडुक्की, एर्नाकुलम और त्रिशूर जैसे जिलों में करीब 46 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां क्रिश्चियन मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. माना जाता है कि केरल कांग्रेस (मणि) इन वोटों तक पहुंच का सबसे मजबूत माध्यम है.
यूडीएफ के भीतर समीकरण कुछ इस तरह हैं- कांग्रेस हिंदू वोटों को साधती है, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग मुस्लिम वोटों को संभालती है, लेकिन क्रिश्चियन वोटों के लिए केरल कांग्रेस (मणि) की जरूरत पड़ती है. यही वजह है कि मुस्लिम लीग ने भी KCM की यूडीएफ में वापसी को लेकर सकारात्मक रुख दिखाया है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कैथोलिक चर्च भी चाहता है कि केरल कांग्रेस (मणि) यूडीएफ के साथ आए. हाल के स्थानीय चुनावों में भी क्रिश्चियन वोटरों का झुकाव यूडीएफ की ओर देखा गया था.
राहुल गांधी की केरल यात्रा पर टिकी निगाहें
19 जनवरी को राहुल गांधी की केरल यात्रा को इस पूरे घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है. कोच्चि के मरीन ड्राइव पर होने वाली उनकी बड़ी रैली को कांग्रेस के चुनावी अभियान की शुरुआत माना जा रहा है. इसी दौरान स्थानीय निकाय चुनाव जीतने वाले यूडीएफ उम्मीदवारों का सम्मान भी किया जाएगा, जिसे राहुल गांधी खुद संबोधित करेंगे.
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जोस मणि आखिर कौन सा रास्ता चुनते हैं-लेफ्ट के साथ बने रहना या पुराने साथी कांग्रेस के साथ घर वापसी करना. अगर यह राजनीतिक दांव चला तो केरल की चुनावी तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है.
राजनीति के बीच एक यादगार किस्सा
इसी रिपोर्ट के आखिर में एक दिलचस्प राजनीतिक किस्सा भी सामने आया है. आरजेडी से जुड़ी प्रियंका भारती ने लालू प्रसाद यादव से जुड़ी एक याद साझा की, जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे पहली मुलाकात में सिर्फ 10 सेकंड बात होने के बावजूद लालू यादव को उनका नाम और पहचान याद रही. यहां तक कि उनके गांव की एक दलित महिला का नाम और हालचाल भी लालू जी को याद था.
प्रियंका भारती के मुताबिक, लालू यादव की याददाश्त और आम लोगों से जुड़ाव उन्हें आज भी हैरान करता है. उनका कहना है कि इतने बड़े पदों पर रहने के बावजूद ज़मीन से जुड़ी ऐसी स्मृतियां रखना आज के दौर में दुर्लभ है.
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