CAA रहेगा या जाएगा? सुप्रीम कोर्ट में इस दिन से शुरू होगी मामले की महासुनवाई
देश की नजरें अब सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं जहां नागरिकता संशोधन कानून की संवैधानिक वैधता तय होगी. छह साल पुरानी कानूनी जंग निर्णायक मोड़ पर है. सरकार इसे मानवीय बताती है जबकि विरोधी भेदभावपूर्ण कहते हैं. फैसला आया तो नागरिकता और राजनीति दोनों की दिशा बदल सकती है पूरे देश में.

CAA Supreme Court hearing: इंतजार की घड़ियां खत्म होने जा रही है. 6 साल की कानूनी जंग, 250 से ज्यादा याचिकाएं और करोड़ों लोगों की उम्मीदें! क्या 5 मई 2026 की तारीख भारत के इतिहास को बदल देगी? क्या CAA संविधान की कसौटी पर खरा उतरेगा? या फिर पलटेगा नागरिकता का पूरा कानून? आज हम दिखाएंगे CAA के उस चक्रव्यूह की पूरी कहानी, जिससे साफ बचना निकला मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता संशोधन कानूनन (CAA), 2019 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली 250 से अधिक याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई के लिए 5 मई की तारीख मुकर्रर कर दी है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच मेंजस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस उज्जल भुइयां विवादित कानून पर आर-पार की सुनवाई करेगी.
सुनवाई के लिए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने पूरी स्ट्रैटजी बनाई है. 5 और 6 मई को दोपहर तक याचिकाकर्ताओं को मौका मिलेगा सरकार पर सुपर अटैक करने का. कपिल सिब्बल और इंदिरा जयसिंह जैसे दिग्गज वकील बताएंगे कि क्यों कानून भेदभावपूर्ण है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अब किसी नई याचिका पर सुनवाई नहीं होगी. खेल अब पुराने खिलाड़ियों के बीच ही खेला जाएगा. 6 मई को दोपहर बाद से और 7 मई को सरकार का 'काउंटर अटैक होगा. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता सरकार का बचाव करेंगे और बताएंगे कि ये कानून मानवीय क्यों है. 12 मई को फाइनल बहस के बाद बेंच चाहे तो जजमेंट रिजर्व करे या फाइनल जजमेंट सुना दे.
CAA की पृष्ठभूमि और देशभर में विरोध
सीएए की कहानी शुरू हुई 11 दिसंबर 2019 को, जब संसद ने नागरिकता कानून (CAA) पास किया. इसके बाद देश की सड़कों पर जो हुआ, वो इतिहास बन गया. शाहीन बाग से लेकर दिल्ली के दंगों तक, CAA के नाम पर देश सुलग उठा. विपक्ष ने इसे संविधान पर हमला बताया. मुसलमानों को डर सताने लगाने लगा कि कहीं उन्हें भारत से बाहर निकालने की साजिश तो नहीं? सीएए के खिलाफ आवाज उठाने वाली कांग्रेस पार्टी भी है. राहुल गांधी भी और सामाजिक, धार्मिक संगठन और गैर-बीजेपी पार्टियां भी हैं. उमर खालिद, शरजील इमाम जैसे लोग उसी विरोध प्रदर्शन के कारण आज तक जेल में है.
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अनुच्छेद 14 और सेक्युलरिज्म पर सबसे बड़ा सवाल
सीएए विवाद में तीन सवालों से आग लगी हुई है. एक सवाल जुड़ा धर्म के कांटे और अनुच्छेद 14 की दुहाई से. विरोधियों के विरोध का आधार ये है कि अगर भारत सेक्युलर है तो नागरिकता की लिस्ट से मुसलमान बाहर क्यों? क्या ये समानता के अधिकार की हत्या नहीं है? विवाद तब और गहरा गया जब इसे NRC से जोड़ दिया गया. डर फैला कि दस्तावेज न होने पर मुसलमान भारत से निकाल दिए जाएंगे.
सरकार का पक्ष: मानवीय आधार या संवैधानिक विवाद?
सुप्रीम कोर्ट की बेंच के सामने सीएए कानून को लेकर 5 सुलगते सवाल हैं. सुप्रीम कोर्ट ने जवाब दिया तो या तो सरकार की हार-जीत होगी या विरोधियों की. पहला सवाल ये कि ये समानता के अधिकार अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है? कोर्ट ये जांच करेगा कि क्या सरकार का बनाया हुआ क्राइटेरिया उचित है या नहीं जिसमें माइनस मुसलमान 6 धर्म और 3 देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान ही शामिल हैं याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि कानून धर्म के आधार पर भेदभाव करता है और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है क्योंकि इसमें मुस्लिमों को शामिल नहीं किया गया है. बड़ा सवाल ये भी कि ये संविधान के मूल ढांचे और धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है? कोर्ट को तय करना है कि क्या नागरिकता को धर्म से जोड़ना भारत के सेक्युलर कैरेक्टर पर चोट करता है या नहीं. याचिकाओं में दावा किया गया है कि CAA धार्मिक पहचान के आधार पर लाभ देता है. पहली बार है नागरिकता के लिए धार्मिक आधार हो रहा है.
CAA के तहत किन लोगों को नागरिकता और कौन बाहर?
सीएए को लेकर मोदी सरकार न पीछे हटी है, न हटने के लिए मानेगी. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे में क्लियर कर दिया कि ये नागरिकता लेने नहीं, देने का कानून है. पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश इस्लामिक देश हैं, वहां मुस्लिम अल्पसंख्यक नहीं हो सकते. विदेशी नीति और नागरिकता पर कानून बनाना संसद का 'संप्रभु अधिकार' (Sovereign Right) है, इसमें कोर्ट को दखल नहीं देना चाहिए. CAA किसी भी भारतीय नागरिक के अधिकारों को रत्ती भर भी कम नहीं करता. केंद्र की दलील है कि सीएए मानवीय कानून है जो केवल उन लोगों के आंसू पोंछने के लिए बना है जो पड़ोसी देशों में ज़ुल्म सह रहे थे. सीएए कानून से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक प्रताड़ना के कारण 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई अल्पसंख्यकों को नागरिकता मिलेगी, मुसलमानों को नहीं.
NRC का डर और विरोधियों की सबसे बड़ी आशंका
2019 से लगातार सीएए कानून खत्म कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट में फरियाद लगी. दिसंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने कानून पर रोक लगाने से इनकार किया था. मार्च 2024 में मोदी सरकार ने चुनाव से ठीक पहले CAA कानून कर दिया. अचानक दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि CAA के तहत नागरिकता मिलना पूरी तरह से जांच और कोर्ट के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगा. CAA और NRC एक दूसरे से कनेक्टेड माने जाते हैं जिसे विरोधी खतरनाक मेल मानते हैं. सबसे बड़ा डर NRC (National Register of Citizens) के साथ इसके जुड़ाव को लेकर है. विरोधियों ने कोर्ट में ये डर भी जताया है कि CAA अकेला नहीं है. NRC के साथ मिलकर एक ऐसा जाल बुनेगा जिसमें मुसलमान भारत के लिए पराए हो जाएंगे. अगर कोई मुसलमान नागरिकता के दस्तावेज नहीं दिखा पाएगा तो वो अवैध घोषित हो जाएगा.
5 मई की सुनवाई तय करेगी CAA की किस्मत
एक तरफ संविधान की दुहाई, दूसरी तरफ मानवीय आधार पर नागरिकता का दावा! सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है-CAA के तहत मिलने वाली नागरिकता कोर्ट के अंतिम फैसले के अधीन होगी. सीएए से दी गई नागरिकता अभी कच्ची है. सुप्रीम कोर्ट का आदेश ही सुप्रीम होगा. यानी, सीएए विरोधियों के लिए बाजी अभी पलटी नहीं है. 5 मई से शुरू होने वाले इस कानूनी महामुकाबला से सीएए पर सरकार की हार या जीत या विरोधियों की हार या जीत का फैसला करेगी.










