कौन हैं स्कूटी वाले विधायक जिन्होंने कभी ठुकराया था मंत्री पद? अब सेकंड हैंड गाड़ी और सादगी से जीत रहे जनता का दिल

Alam Badi MLA: आजमगढ़ की निजामाबाद सीट से सपा विधायक आलम बदी अपनी सादगी भरी जिंदगी को लेकर चर्चा में हैं. यूपी विधानसभा के बजट सत्र में स्कूटी से पहुंचने वाले इस विधायक ने कभी मंत्री पद का प्रस्ताव भी ठुकरा दिया था. जानिए इंजीनियर से गांधीवादी नेता बने आलम बदी की पूरी कहानी और क्यों जनता के बीच उनकी अलग पहचान है.

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स्कूटी वाले विधायक आलम बदी(तस्वीर- न्यूज तक)
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उत्तर प्रदेश की राजनीति में जहां भौकाल, काफिले और सिक्योरिटी गार्ड्स का दबदबा रहता है, वहीं एक विधायक ऐसे भी हैं जो अपनी सादगी से सबको हैरान कर देते हैं. यूपी विधानसभा के बजट सत्र में जब विधायकों की लग्जरी गाड़ियों का काफिला पहुंच रहा था, तब एक बुजुर्ग विधायक स्कूटी पर सवार होकर पहुंचे. ये कोई और नहीं, आजमगढ़ की निजामाबाद सीट से सपा विधायक आलम बदी हैं. आलद बदी का यह अंदाज अब सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा हैं.

मंत्री पद को दिखा चुके हैं ठेंगा

आलम बदी की सादगी सिर्फ दिखावा नहीं, बल्कि उनका जीवन दर्शन है. साल 2012 में जब अखिलेश यादव की सरकार बनी, तब आलम बदी को मंत्री पद का ऑफर दिया गया था. लेकिन उन्होंने बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़ लिए और कहा कि वह मंत्री बनने के बजाय अपनी जनता की सेवा करना ज्यादा पसंद करेंगे. राजनीति के इस दौर में जहां पदों के लिए मारामारी मची रहती है, वहां आलम बदी का यह फैसला आज भी मिसाल के तौर पर याद किया जाता है.

इंची टेप लेकर खुद नापते हैं सड़क की चौड़ाई

आलम बदी अपने क्षेत्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ बेहद सख्त माने जाते हैं. वह केवल दफ्तर में बैठकर आदेश नहीं देते, बल्कि खुद इंची टेप लेकर सड़क की लंबाई और चौड़ाई नापने पहुंच जाते हैं. उनके इलाके के ठेकेदार भी उनसे खौफ खाते हैं क्योंकि विधायक जी खुद निर्माण कार्य की गुणवत्ता की जांच करते हैं और भ्रष्टाचार की रत्ती भर गुंजाइश नहीं छोड़ते.

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सादगी भरा जीवन: न गार्ड, न बड़ा मकान

आलम बदी आजमगढ़ के निजामाबाद की तंग गलियों में एक साधारण से घर में रहते हैं. उनके पास न तो कोई बड़ा मकान है और न ही लग्जरी गाड़ियां. वाहन के नाम पर पहले उनके पास एक पुरानी एंबेसडर थी, जिसे बेचकर उन्होंने एक सेकंड हैंड बोलेरो ली. लेकिन गली इतनी तंग है कि गाड़ी अंदर नहीं जा सकती, इसलिए वह अक्सर पैदल या स्कूटी से चलते हैं. साथ ही वह कोई सिक्योरिटी गार्ड नहीं रखते और आम जनता के बीच बिल्कुल आम आदमी की तरह घुल-मिलकर रहते हैं. चुनाव के वक्त दिए गए हलफनामे के मुताबिक, उनके बैंक खाते में महज 5000 रुपये थे.

इंजीनियर से गांधीवादी नेता तक का सफर

आलम बदी कोई साधारण पृष्ठभूमि से नहीं आते, वह अपने समय के बड़े इंजीनियर रहे हैं. उन्होंने गोरखपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, लेकिन नौकरी करने के बजाय महात्मा गांधी के आदर्शों को चुना और राजनीति में कदम रखा. वह 1993 में पहली बार विधायक बने और तब से लेकर अब तक (2007 को छोड़कर) लगातार जीतते आ रहे हैं.

सत्ता पक्ष भी करता है सम्मान

विधानसभा में जब आलम बदी बोलने के लिए खड़े होते हैं, तो सत्ता पक्ष के नेता, यहां तक कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उनका बेहद सम्मान करते हैं. उनकी ईमानदारी और सादगी ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है. आलम बदी का मानना है कि 'एमएलए बनना कोई तीर मारने जैसा काम नहीं है, बल्कि यह जनता की सेवा की एक बड़ी जिम्मेदारी है.' आज के दौर में जहां राजनीति का मतलब अक्सर सत्ता और पैसा बन गया है, वहां आलम बदी जैसे नेता यह याद दिलाते हैं कि सादगी और सेवा भाव ही असल जनसेवा है.

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