बजट क्या है और आपकी जेब से इसका क्या लेना-देना? आसान भाषा में पूरी कहानी
1 फरवरी को Budget-2026 पेश होने वाला है. अब सवाल ये है कि बजट होता क्या है? Fiscal Deficit क्या होता है और Direct व Indirect Tax में क्या फर्क है? जानिए आसान भाषा में सरकार का बजट आपकी जेब, टैक्स, EMI और महंगाई को कैसे प्रभावित करता है. 'हिसाब-किताब' में समझें अर्थव्यवस्था की ABCD.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कल यानी 1 फरवरी 2026 को सुबह 11 बजे संसद में ये बजट पेश करेंगी. हर साल फरवरी का महीना आते ही एक शब्द अचानक चर्चा में आ जाता है बजट. टीवी डिबेट, अखबार की सुर्खियां और सोशल मीडिया पोस्ट, हर जगह बजट-बजट. लेकिन आम आदमी के मन में सवाल वही रहता है- इससे मुझे क्या फायदा या नुकसान?
ऐसे में इंडिया टुडे समूह के Tak चैनल्स के मैनेजिंग एडिटर मिलिंद खांडेकर ने बजट और अर्थव्यवस्था को बेहद आसान और आम बोलचाल की भाषा में समझाया है.
सरकार की सालाना प्लानिंग
मान लीजिए आपकी सैलरी हर महीने आती है. महीने की शुरुआत में ही आप तय कर लेते हैं कि किराया कितना जाएगा, बच्चों की फीस कितनी है, राशन-पानी में कितना खर्च होगा और कितनी बचत हो पाएगी. सरकार भी कुछ ऐसा ही करती है, बस फर्क इतना है कि सरकार एक साल का हिसाब एक साथ बनाती है.
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भारत में 1 अप्रैल से नया वित्त वर्ष शुरू होता है. इससे पहले सरकार यह तय करती है कि अगले पूरे साल में उसे कितनी आमदनी होगी, वह आमदनी कहाँ-कहाँ से आएगी और किस काम में कितना खर्च किया जाएगा. इसी पूरे प्लान को बजट कहा जाता है, जिसे हर साल 1 फरवरी को संसद में पेश किया जाता है.
सरकार की कमाई का सबसे बड़ा ज़रिया हम और आप हैं. हम टैक्स देते हैं-इनकम टैक्स, जीएसटी, पेट्रोल-डीज़ल पर टैक्स. टैक्स बढ़ा तो सीधा असर हमारी जेब पर. सरकार पैसा कहां खर्च करेगी, इस पर बाजार की भी नजर रहती है. अगर सरकार रेलवे, सड़क, एयरपोर्ट या टेक्नोलॉजी में ज़्यादा पैसा लगाए, तो उससे जुड़ी कंपनियों को फ़ायदा होता है. शेयर बाज़ार हिलता है और आपके म्यूचुअल फंड या शेयर निवेश पर असर पड़ता है.
Fiscal Deficit: सरकार का उधार
बजट के समय एक शब्द बार-बार सुनाई देता है-Fiscal Deficit, यानी सरकारी घाटा. इसे यूं समझिए कि कई बार आपकी सैलरी खर्चों से कम पड़ जाती है और आप क्रेडिट कार्ड से खर्च करते हैं. यही उधार आपका निजी घाटा है.
सरकार के साथ भी ऐसा ही होता है.
जब सरकार की आमदनी कम और खर्च ज्यादा हो जाता है, तो जो कमी बचती है वही Fiscal Deficit कहलाती है. इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार बाज़ार से कर्ज़ लेती है.
घाटे का असर आप पर क्यों पड़ता है?
सरकार जितना ज़्यादा कर्ज़ लेगी, बाज़ार में पैसों की मांग उतनी बढ़ेगी. नतीजा-ब्याज दरें ऊपर जाएंगी. इसका मतलब आपकी होम लोन या कार लोन की EMI बढ़ सकती है, महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है, रोज़मर्रा की चीज़ें महंगी हो सकती हैं. यानी सरकारी घाटा सीधा आपकी जेब से जुड़ा है.
Direct Tax और Indirect Tax का फर्क
सरकार टैक्स दो तरीकों से वसूलती है. डायरेक्ट टैक्स और इनडायरेक्ट टैक्स. डायरेक्ट टैक्स वह होता है जो सीधे आपकी कमाई पर लगता है, जैसे नौकरीपेशा लोगों की सैलरी से कटने वाला इनकम टैक्स या कंपनियों के मुनाफ़े पर लगने वाला कॉरपोरेट टैक्स.
वहीं इनडायरेक्ट टैक्स वह है जो आप खर्च करते समय चुकाते हैं, जैसे कोई सामान या सर्विस खरीदते वक्त लगने वाला जीएसटी, पेट्रोल-डीज़ल और शराब पर एक्साइज ड्यूटी या विदेश से आने वाले सामान पर कस्टम ड्यूटी. आज सरकार की टैक्स से होने वाली आमदनी में सबसे बड़ा योगदान इनकम टैक्स का है, यानी सरकारी खजाने को भरने में सबसे बड़ी भूमिका आम नौकरीपेशा लोगों की ही है.
Revenue और Capital Expenditure
घर के खर्च से इसे समझना आसान है. किराया, राशन, बिजली और दवाइयों पर जो पैसा जाता है, वह जरूरी तो है लेकिन उससे कोई संपत्ति नहीं बनती, ठीक वैसे ही सरकार का रोजमर्रा का खर्च Revenue Expenditure कहलाता है, जिसमें कर्मचारियों की सैलरी, पेंशन, सब्सिडी, मुफ्त राशन, नकद सहायता योजनाएं और कर्ज का ब्याज शामिल होता है.
इसके उलट Capital Expenditure वह खर्च है जिससे लंबे समय का फायदा मिलता है, जैसे सड़कें, रेलवे लाइन, एयरपोर्ट, स्कूल, कॉलेज और फैक्ट्रियां बनाना. यानी संपत्ति तैयार करना. आसान भाषा में कहें तो कार खरीदना कैपिटल खर्च है और उसी कार में पेट्रोल भरवाना रेवेन्यू खर्च. इसलिए अर्थशास्त्री मानते हैं कि सरकार को गैरज़रूरी रेवेन्यू खर्च पर लगाम लगानी चाहिए और कैपिटल खर्च बढ़ाना चाहिए. इसी तरह GDP को देश की एक बड़ी गुल्लक मानिए, जिसमें हम सबका रोज़मर्रा का खर्च, सरकार का खर्च और कंपनियों का निवेश- फैक्ट्री, मशीन और इमारतों पर लगाया गया पैसा. सब मिलकर जमा होता है; अगर पिछले साल गुल्लक में 100 रुपये थे और इस साल 107 हो गए, तो GDP ग्रोथ 7 प्रतिशत मानी जाती है और इसी तेज बढ़ोतरी की वजह से भारत आने वाले समय में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है.
फिर लोग गरीब क्यों?
यह सवाल सबसे अहम है. जापान और भारत की कुल GDP लगभग बराबर है, लेकिन जापान में वही गुल्लक सिर्फ करीब 12 करोड़ लोग भरते हैं, जबकि भारत में 150 करोड़ लोग.
नतीजा यह कि प्रति व्यक्ति हिस्से में भारत बहुत पीछे रह जाता है. इसलिए Per Capita Income के मामले में भारत की रैंकिंग करीब 140 के आसपास है. मतलब साफ है देश अमीर हो रहा है, लेकिन आम आदमी की आमदनी उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ पा रही.
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